प्रकाशित 30/04/2020
ईश्वर न ही ठगता और न ही ठगा जा सकता है क्योंकि वह सत्य है और वह अनादि काल से सत्य के मार्ग में पूर्णता के साथ गतिशील है। हालांकि संसार प्रभु की सृष्टि है, जहां असत्य और उसकी तमाम विद्या (छल प्रपंच ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ घमंड क्रोध चापलूसी........) भरपूरी से व्याप्त है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उत्तर दिया, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता है, तो मेरे अनुयायी लड़ते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परंतु मेरा राज्य इस संसार का नहीं है।" योहन 18 : 36
क्या कोई औरत कचरे के ढेर के बीच अपना बच्चा उत्पन्न करना पसंद करेगी? न, नहीं, बिल्कुल नहीं! तो फिर विचारने वाली बात यह है कि क्यों ईश्वर मनुष्यों को अपने सदृश सत्य से परिपूर्ण नवाज कर, इस संसार में असत्य के राज्य में उत्पन्न करते हैं!? इस सवाल का एक ही जवाब है कि ईश्वर चाहते हैं कि मनुष्य अपने प्रभु ईश्वर को विषम परिस्थिति में भी प्यार करें और असत्य से लबालब इस संसार में जीवन भर अपनी आत्मा में भरे सत्य की सेवा करता रहे; और अपने जीवन के अंत में सत्य में परिपूर्ण, पवित्र पाया जाए। लेकिन ईश्वर की ख्वाहिश के विपरीत मनुष्य में व्याप्त सत्य उसकी जवानी के होश के साथ ही नष्ट होना शुरू हो जाती है क्योंकि संसार का असत्य उसे अपनी ओर निरंतर आकर्षित कर अपना निवाला बना, निगलने के प्रयास में लग जाता है। मनुष्यों को इस तरह संसार रूपी असत्य के मांद में परास्त होता देख, ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र ईसा मसीह को इस संसार में सत्य की शिक्षा देने, ईश्वर का सामर्थ्य दिखलाने, उनमें और उनके वचनों में विश्वास करने और यह सिखलाने के लिए भेजे कि असत्य की मांद में असत्य को कैसे मात दिया जाता है। ईसा मसीह ने संसार के असत्य के मांद में ईश्वर की इच्छा पूरी कर उनके सुपुत्र होने का प्रमाण दिए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
जो कार्य तूने मुझे करने को दिया था, वह मैंने पूरा किया है। इस तरह मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा प्रकट की है। योहन 17 : 4
अर्थात
सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा इसी में है कि मनुष्य संसार रूपी असत्य के मांद में असत्य को पराजित करता रहे जैसे कि ईसा मसीह ने किया। यही कारण है कि ईसा मसीह लोगों को छल प्रपंच ईष्र्या द्वेष लोभ-लालच स्वार्थ घमंड क्रोध वासना व्यभिचार........... को पूरी तरह त्याग कर अपना अनुसरण करने का न्योता दिया करते। ईसा मसीह का अनुसरण करना, उनकी सत्य की शिक्षा का पालन है। इस तरह लोगों ने ईसा मसीह को संसार के अंधकार में ज्योति के रूप में पाया, असत्य के बीच सत्य के रूप में पाया, निराशा के बीच आशा के रूप में पाया, पाप के कारण आत्मा की जर्जरता के बीच नवजीवन के रूप में पाया, दुख दर्द हरने वाला पाया; और उनके शिष्य बने; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मैं ज्योति बन कर संसार में आया हूं, जिससे जो मुझ में विश्वास करता है, वह अंधकार में नहीं रहे। योहन 12 : 46
इसलिए
ईसा मसीह सत्य को समर्पित जीवन व्यतीत कर ईश्वर में निवास करते रहे और ईश्वर उन में निवास करते रहे; इस प्रकार वे दोनों एक दूसरे में संगठित रहें। उन्होंने अपने मानव जीवन के अंतिम क्षणों में अपने अनुसरण करने वाले लोगों के लिए और भविष्य में उनका अनुसरण करने वालों के लिए पिता परमेश्वर से प्रार्थना किए, जो उनके मानव जीवन के मकसद का साक्ष्य देता है; एक ऐसे मानव जीवन का साक्ष्य देता है जो आनंद से परिपूर्ण है, पवित्रता से परिपूर्ण है, सत्य की सेवा में समर्पित है। उस प्रार्थना को बाईबल में योहन के अध्याय 17 : 1-26 में पूरा पढ़ सकते हैं, जिसका एक भाग इस प्रकार है-
अब मैं तेरे पास आ रहा हूं। जब तक संसार में हूं, यह सब कह रहा हूं, जिससे उन्हें मेरा आनंद पूर्ण रूप से प्राप्त हो। मैंने उन्हें तेरी शिक्षा प्रदान की है। संसार ने उनसे बैर किया, क्योंकि जिस तरह मैं संसार का नहीं हूं, उसी तरह वे भी संसार के नहीं हैं। मैं यह नहीं मांगता कि तू उन्हें संसार से उठा ले, बल्कि यह कि तू उन्हें बुराई से बचा। वे संसार के नहीं हैं, जिस तरह मैं संसार का नहीं हूं।
तू सत्य की सेवा में उन्हें समर्पित कर। तेरी शिक्षा ही सत्य है। जिस तरह तूने मुझे संसार में भेजा है, उसी तरह मैंने भी उन्हें संसार में भेजा है। मैं उनके लिए अपने को समर्पित करता हूं, जिससे वह भी सत्य की सेवा में समर्पित हो जाएं।
मैं न केवल उनके लिए विनती करता हूं, बल्कि उनके लिए भी जो, उनकी शिक्षा सुनकर मुझ में विश्वास करेंगे। सब-के-सब एक हो जाएं। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह से वे भी हम में एक हो जाएं, जिससे संसार यह विश्वास करें कि तूने मुझे भेजा। योहन 17 : 13-21
ईसा मसीह की यह प्रार्थना इस बात का द्योतक है कि ईश्वर जितना प्रेम ईसा मसीह से करते हैं उतना ही प्रेम मनुष्यों से करते हैं और चाहते हैं कि जिस प्रकार ईसा मसीह सत्य को समर्पित अपना जीवन व्यतीत कर ईश्वर में निवास करते हैं, वैसे ही मनुष्य भी सत्य में पूर्णता समर्पित जीवन व्यतीत कर ईश्वर में निवास करें। इस प्रकार से ईश्वर को ईसा मसीह के साथ-साथ हम सब के रूप में बहुत सारे बेटे बेटियां मिल जाएंगे, जिन्हें उन्होंने माता के गर्भ में रखने से पहले प्यार किया है, जान लिया है। इस प्रकार से ईश्वर की यह मंशा प्रकट होती है कि ईश्वर को एकमात्र नहीं, बहुत सारे बेटे बेटियां चाहिए क्योंकि ईश्वर ने ईसा मसीह से जितना प्यार किया है, उतना ही प्यार संपूर्ण मानव जाति से किया है और चाहते हैं कि संपूर्ण मानवजाति संसार के वासनाओं को त्याग कर, अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्यार करें। ईश्वर यह भी चाहते हैं कि जिस तरह ईसा मसीह सत्य में समर्पित होकर अपने हृदय रूपी मंदिर के आत्मा रूपी बेदी पर निरंतर सत्य को सुसज्जित एवं शोभायमान कर सत्य में समर्पित होने की शिक्षा देते रहे, वैसे ही हम सब लोग भी सत्य को समर्पित जीवन जी कर अपने शरीर रूपी मंदिर के आत्मा रूपी बेदी पर सत्य को सुसज्जित एवं शोभायमान कर दूसरों को सत्य में समर्पित होने की शिक्षा दें। आप ही सोचिए कि बिना सत्य में पूरी तरह से समर्पित हुए, कोई कैसे दूसरों को सत्य में समर्पित होने की शिक्षा दे सकता है!? सोचिए कि एक चोर के द्वारा, चोरी नहीं करने की शिक्षा कितना उचित है!? एक झूठे के द्वारा सत्य बोलने की शिक्षा कितना उचित है!?.......... जिस प्रकार से ईश्वर ने ईसा मसीह को उनके पवित्र जीवन के कारण उनका अभिषेक कर उन्हें महिमान्वित किए हैं उसी प्रकार से ईसा मसीह, उनका अनुसरण कर पवित्र जीवन जीने वालों का अभिषेक कर उन्हें महिमान्वित करते हैं। यही वास्तव में सत्यमय जीवन जीने के अनूठे आनन्द की परिकाष्ठा और वांछनीय अनुभव है।
आईए,
हम सब-के-सब, चाहे कितने भी बड़े पद पर क्यों ना हो, संसार के असत्य के मांद में ईसा मसीह में विश्वास कर उनकी सत्य की शिक्षा ग्रहण कर सत्य को समर्पित पवित्र जीवन जी कर ईसा मसीह की तरह इसी संसार में जीते हुए ईश्वर में एक हो जाए, संगठित हो जाएं; तभी हम वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को भी इस संसार में सत्य में समर्पित हो कर पवित्र जीवन जीने और सत्य में संगठित होने की शिक्षा देने पाएंगे जैसा कि ईसा मसीह आगे प्रार्थना करते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
तूने मुझे जो महिमा प्रदान की, वह मैंने उन्हें दे दी है, जिससे वे हमारी ही तरह एक हो जाएं-- मैं उन में रहूं और तू मुझ में, जिससे वे पूर्ण रूप से एक हो जाएं और संसार यह जान ले कि तूने मुझे भेजा और जिस प्रकार तूने मुझे प्यार किया, उसी प्रकार मैंने भी उन्हें भी प्यार किया। योहन 17 : 22-23
जितना प्रेम ईश्वर ने ईसा मसीह से किए हैं, उतना ही प्रेम वे सारे मानव जाति से करते हैं; इसलिए जितना प्रेम ईसा मसीह ने सत्य में समर्पित पवित्र जीवन जी कर ईश्वर से किया है, हमें भी चाहिए कि उतना ही प्रेम हम भी सत्य में समर्पित पवित्र जीवन जी कर ईश्वर से, ईसा मसीह से, सत्य से परिपूर्ण अपनी आत्मा से और जन-जन से करें। स्मरण रहे कि ईश्वर ने हमें अपने सदृश रचने के लिए अपनी पवित्रता के समान सत्य से परिपूर्ण आत्मा प्रदान किए हैं, जो उन्हें वापस चाहिए; जैसा कि ईसा मसीह ने अपने शरीर की मृत्यु से ठीक पहले सत्य से परिपूर्ण अपनी पवित्र आत्मा पिता ईश्वर को वापस किए हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने ऊंचे स्वर से पुकार कर कहा, "पिता! मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंपता हूं", और यह कहकर उन्होंने प्राण त्याग दिए। लूकस 23 : 46
इस प्रकार ईसा मसीह सत्य के अप्रत्यक्ष संगठन (ऐसा संगठन जिसमें ईश्वर, ईसा मसीह और ईश्वर के तमाम अभिषिक्त बेटे बेटियां सत्य में एक होते हैं) का कार्य करते हुए ईश्वर की नजर में उस अप्रत्यक्ष संगठन के कोने के पत्थर (स्तंभ) साबित हुए; जिसकी चट्टान उनकी सत्य की शिक्षा का पालन कर उनका अनुसरण करने वाले उनके तमाम शिष्य होंगे जैसा कि ईसा मसीह अपने अभिषिक्त एवं प्रिय शिष्य पेत्रुस से कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मैं तुमसे कहता हूं कि तुम पेत्रुस अर्थात चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊंगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पाएंगे। मती 16 : 18
आईये, हम भी ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार सत्य को समर्पित पवित्र जीवन जी कर अपनी आत्मा को शरीर की मृत्यु से पहले सत्य से परिपूर्ण कर पवित्र आत्मा की तरह पवित्र करने का प्रयास करें और ईसा मसीह की सत्य की शिक्षा के पालन का नमूना पेश कर ईश्वर के सत्य के अप्रत्यक्ष संगठन का दूसरा तीसरा चौथा................... चट्टान बन जाएं जो अपने अगल-बगल के दूसरे चट्टानों से सिर्फ और सिर्फ सत्य के सीमेंट से जुड़ा हुआ है। यह एक ऐसा संगठन है जिसको ईश्वर की छत्रछाया प्राप्त है और जिसका शैतान (असत्य) कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। मृत्यु तो चोर के समान आएगी; इसलिए सत्य में पूर्णतः समर्पित होने में कोताही ना बरतें और ईश्वर का अभिषेक पाने के लिए सत्य का पालन कर, तड़प दिखाएं और अदृश्य संगठन, स्वर्ग का टिकट पाएं।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!