प्रकाशित 29/04/2020
क्या आप बतला सकते हैं कि ईश्वर मनुष्य से कितनी दूर हैं? ईश्वर स्वर्ग में रहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:
प्रभु अपने मंदिर में विराजमान है, प्रभु का सिंहासन स्वर्ग में है। वह संसार को देखता रहता और मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ता है। स्त्रोत 11: 4
इसलिए कहा जा सकता है कि ईश्वर और मनुष्यों के बीच की दूरी स्वर्ग और पृथ्वी की दूरी जितनी है। क्या कोई ऐसा पैमाना है जिसके द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी की दूरी माप कर ईश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी का पता लगाया जा सके? शायद हां, शायद नहीं!
हां! जरूर है। ईश्वर तो मनुष्यों से बिल्कुल दूर नहीं है, लेकिन मनुष्य जरुर ईश्वर से दूर है। प्रत्येक मनुष्य की ईश्वर से दूरी अलग-अलग है जिसे सिर्फ ईश्वर ही नाप सकते हैं, जबकि प्रत्येक मनुष्य चाहे तो वह ईश्वर से अपनी दूरी का अंदाजा लगा सकता है। हर मनुष्य के लिए यह आकलन करना, अंदाज लगाना जरूरी है क्योंकि ईश्वर, मनुष्यों की सत्य में वापसी की बेसबरी से इंतजार करते हैं। बड़ा सवाल यह है कि ईश्वर सर्वत्र व्यापी होने के कारण मनुष्य के पास ही है, तो फिर मनुष्य ईश्वर से दूर क्यों है? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:
मैं कहां जाकर तुझसे अपने को छुपाओ?
मैं कहां भाग कर तेरी आंखों से ओझल हो जाऊं?
यदि मैं अकाश में चढ़ूं, तो तू वहां है।
यदि मैं अधोलोक में लेटूं, तो तू वहां है।
यदि मैं उषा के पंखों पर चढ़कर समुद्र के उस पार बस जाऊं,
तो वहां भी तेरा हाथ मुझे ले चलता,
वहां भी तेरा दाहिना हाथ मुझे संभालता है। स्तोत्र ग्रंथ 139 : 7-10
ईश्वर तो सत्य है, सर्वत्र व्यापी हैं और प्रत्येक मनुष्य के पवित्र जीवन का मार्ग हैं; जिस पर चलकर कोई भी स्वर्ग में विराजमान पिता परमेश्वर के दर्शन कर सकता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:
ईसा ने उनसे कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूं। मुझ से होकर गए बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता। योहन 14 : 6
कोई भी व्यक्ति, ईश्वर की पैनी नजरों से बच नहीं सकता, छिप नहीं सकता है। फिर भी मनुष्य असत्य करने के लिए सत्य से दूर भागता है, एकांत खोजता है, अंधेरा होने का इंतजार करता है। सोचता है, डरता है कि कोई उसे देख तो नहीं रहा!!! धर्म ग्रंथ में लिख है:
ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं होगा और ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो नहीं फैलेगा और प्रकाश में नहीं आएगा। लूकस 8 : 17
अर्थात
मनुष्य असत्य करने के लिए चाहे कितना भी एकांत में चले जाए और रात की काली चादर के पीछे क्यों न छिप जाए, सत्य की पैनी नजर निरंतर उसके असत्य पर बनी हुई है; जो प्रत्येक मनुष्य के हर कुकर्म को उचित समय पर प्रकट कर देगी। क्या सौ दिन का चोर एक दिन नहीं पकड़ा जाता!!!??? जो जितना ज्यादा असत्य में, वह उतना ही ज्यादा ईश्वर से दूर। इसके विपरीत जो जितना ज्यादा सत्य में, वह उतना ज्यादा ईश्वर के नजदीक। मनुष्य, ईश्वर से अपनी निकटता का सिर्फ अंदाजा ही लगा सकता है और लगाना भी चाहिए; ऐसा न हो कि आत्मा में सत्य के अभाव में शरीर रूपी मंदिर खंडहर में धीरे-धीरे परिवर्तित हो जाएं और पता भी न चले। प्रत्येक मनुष्य की ईश्वर से सटीक दूरी तो सिर्फ ईश्वर को ही पता होता है क्योंकि मनुष्य अपने कुछ-कुछ या बहुत सारे कर्मों और विचारों को बुरा नहीं मानता, जबकि वे ईश्वर की नजर में बुरे होते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
प्रभु यह कहता है - तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। जिस तरह आकाश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊंचा है। उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊंची हैं। नबी इसायाह 55 : 8-9
इसलिए
अब हममें से प्रत्येक जन को यह सोचना जरूरी है कि हमारे विचार ईश्वर के विचारों से कैसे कब और कहां भिन्न हैं और उनके सत्य के मार्ग से कितनी दूर भटक गए है। हमें यह अंदाजा लगाना निहायत ही जरूरी है, ताकि हम वापस सत्य में असत्य से लौटे पाएं, पाप से पुण्य में लौटने पाएं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
पापी अपना मार्ग छोड़ दें और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दें। वह प्रभु के पास लौट आए और वह उस पर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है। नबी इसायाह 55 : 7
आईए,
इससे पहले कि हमारी हठधर्मिता को देखकर ईश्वर हमारे गुप्त कार्यों को अंधकार से प्रकाश में प्रकट करे और हमें शर्मिंदा होना पड़े; अच्छा होगा कि हम खुद ही दयासागर ईश्वर के अति पवित्र चरणों में अपने तमाम गुप्त कर्मों के साथ साष्टांग हो जाएं और विलाप करते हुए भलाई के कार्य और दान-पुण्य शुरू करें जैसे कि पद दलितों की सहायता करना, अनाथों को न्याय दिलाना, विधवाओं की रक्षा करना....... इत्यादि इत्यादि; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
प्रभु कहता है :
आओ, हम एक साथ विचार करें।
तुम्हारे पाप सिंदूर की तरह लाल क्यों न हो,
वे हिम की तरह उज्जवल हो जाएंगे;
वे किरमिज की तरह मटमैले क्यों न हों, वे ऊन की तरह श्वेत हो जाएंगे। नबी इसायाह 1 : 18
क्या कोई प्यासा पानी के निकट होकर भी प्यासा रहता है? फिर सत्य रुपी संजीव जल के बिल्कुल समीप होकर भी सत्य से दूर रहना हमारे लिए कितना उचित है। चलिए हम सब सत्य को अपने शरीर रूपी मंदिर के आत्मा रूपी बेदी पर सर्वशक्तिमान सर्वश्रेष्ठ सर्वगुण संपन्न सर्वव्यापी सतप्रतिज्ञा महामहिम (और दूसरा कोई नहीं) एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की असीम कृपा पाकर सुसज्जित एवं शोभायमान कर लें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मती 11 : 28
कहावत है कि नर हिरण अपने नाभि से आने वाली कस्तूरी की महक पाकर पूरे जंगल में दर-दर भटक कर भी कस्तूरी नहीं ढूंढ पाता है; ऐसा ना हो कि हम भी सतप्रतिज्ञा ईश्वर की सत्य की खुशबू पा कर भी सत्य का मार्ग न ढूंढ पाएं। तब कितने बदनसीब होंगे हम!!!
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!