प्रकाशित 28/04/2020
क्या समुद्र में हवा के अभाव में नाव का पाल, काम करता है? क्या पानी के अभाव में मछली जीवन पाएगी? क्या गर्भवती होने में नाकाम औरत बांझ नहीं कहलाती? तो क्या सत्य के अभाव में शरीर रूपी मंदिर खंडहर नहीं कहलाएगी? क्या कोई अपने शरीर रूपी मंदिर में सत्य के अभाव में ईश्वर की आराधना कर सकता है? क्या शरीर रूपी मंदिर में सत्य के अभाव मे की गई सत्य की आराधना, ईश्वर को ग्राहय होंगे?
नहीं! जिस प्रकार से हवा के अभाव में नाव का पाल बेकार साबित होता है; जल के बाहर मछली, जीवन से हार जाती है और सर्वोत्तम उपचार के अभाव में बांझ औरत गर्भवती नहीं हो सकती है। ठीक उसी प्रकार, शरीर रूपी मंदिर में सत्य के अभाव में ईश्वर की आराधना उपासना व्यर्थ है, निरर्थक है।
फिर भी समुद्र में फंसा नाविक पाल लगाकर हवा के झोंके का बेसबरी से इंतजार करता है! फिर भी पानी से बाहर छटपटाती मछली, पानी में पहुंचने की तड़प दिखाती है! फिर भी बांझ औरत जीवन भर गर्भवती होने का प्रयास करती है! तो फिर मनुष्यों को जीवन भर अपने शरीर रूपी मंदिर में असत्य की मूर्तियों (स्वार्थ की मूरत, घमंड की मूरत, पाखंड की मूरत, दिखावे की मूरत, ईर्ष्या द्वेष की मूरत, लालच की मूरत, वासना व्यभिचार की मूरत, क्रोध की मूरत, ............ इत्यादि इत्यादि मूरतों) को चुन-चुन कर धवस्त कर सत्य की स्थापना का निरंतर प्रयास नहीं करना चाहिए?
क्या समुद्र में फंसा नाविक, हवा से बैर कर सकता है? क्या पानी के बाहर मछली, पानी से बैर कर सकती है? क्या कोई बांझ, गर्भवती होने से बैर कर सकती है? तो फिर असत्य में फंसे मनुष्य को सत्य से इतना बैर क्यों? अपने शरीर रूपी मंदिर में असत्य की मूरत बनाकर उपासना करने वाले मनुष्य को सत्य से, अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर से इतना बैर क्यों? हम अपने बहुमूल्य एवं अद्भुत जीवन के बदले अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर को दे ही क्या सकते हैं? क्या हमें अपने बहुमूल्य एवं अद्भुत जीवन के बदले अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्यार नहीं करना चाहिए? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
जो मुझसे बैर करता हैं, वह मेरे पिता से बैर करता है। योहन 15 : 23
अर्थात
सत्य से बैर करने वाला मनुष्य, किसी और से नहीं, बल्कि अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर से बैर करता है!!! क्या पाल वाले नाव का नाविक, हवा से बैर करेगा? क्या जल से बाहर मछली, जल से बैर करती है? क्या बांझ औरत उपचार एवं औषधि से बैर करती है? नहीं! तो फिर क्यों असत्य की उपासना में फंसा मनुष्य, सत्य से, अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर से बैर करता है? क्या असत्य को पहचानने वाला मनुष्य, सत्य को नहीं पहचानता? जरूर! पहचानता भी है और जानता भी है; तभी तो वह असत्य को चुनता है और सत्य से बैर करता है। सत्य से बैर किए बिना, असत्य नहीं किया जा सकता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मैंने तुम से जो बात कही, उसे याद रखो- सेवक अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता। यदि उन्होंने मुझे सताया, तो वे तुम्हें भी सताएंगे। यदि उन्होंने मेरी शिक्षा का पालन किया, तो वे तुम्हारी शिक्षा का भी पालन करेंगे। योहन 15 : 20
क्या मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर से बड़ा है? नहीं! नहीं! मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर से बड़ा नहीं है; वह तो अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के समान निरंतर सत्य में गतिशील होने के लिए रचा गया। तो फिर असत्य में चलकर, सत्य को सताना कहां तक उचित है?
इसलिए
मनुष्य को अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर को छोड़ किसी और की आराधना उपासना इबादत महिमा नहीं करनी चाहिए; और असत्य की मूरत अपने मन मंदिर में बना कर तो कतई नहीं। यही तो सत्य की शिक्षा है- असत्य की मूरत बनाकर उसकी उपासना मत करो। यही तो ईसा मसीह की शिक्षा है; जिसे ग्रहण करने वाले अपने शरीर रूपी मंदिर की बेदी पर सत्य को सुसज्जित कर ईश्वर की आराधना करते हैं; और जो ऐसा करते हैं, वे ईसा मसीह की शिक्षा दूसरों तक सत्य की सेवा में पहुंचाते हैं ताकि सिर्फ और सिर्फ सर्वत्र सत्य की आराधना हो, सत्य की उपासना हो, सत्य की महिमा हो और सत्य की इबादत हो। सत्य शांत और सुशील है, उसकी उपासना शांतिमय और आरामदायक जीवन प्रदान करती है। धर्म ग्रंथ में लिखा है :
वे नावों को किनारे लगा कर और सब कुछ छोड़कर ईसा के पीछे हो लिए। लूकस 5 : 11
मछुआरे असत्य (लोभ लालच ईर्ष्या द्वेष कलह...........) को त्याग कर सत्य (प्रेम दया क्षमा शांति करूणा सहनशीलता धैर्य और न्याय) का दामन थाम लिए क्योंकि असत्य को अपने मन मंदिर से विस्थापित किए बिना, सत्य, जो अत्यंत ही पवित्रता से परिपूर्ण हैं, को शरीर रूपी मंदिर की बेदी पर सुसज्जित नहीं किया जा सकता है। मछुआरों ने अपने शरीर रूपी मंदिर में आत्मा रूपी बेदी पर सत्य को सुसज्जित करने के लिए असत्य को त्याग दिया; फिर भी अपने शरीर की जीविका के लिए मछुआरे ही बने रहे और उनके जीविका के प्रयासों को ईश्वर का साथ मिलता रहा क्योंकि उन्होंने असत्य को छोड़ सत्य को निवास दिया।
आईए,
हम सब असत्य के भंवर से निकलकर, सत्य की सेवा में आजीवन लीन हो जाएं और अपने एकमात्र स्वामी, सर्वशक्तिमान सर्वत्र व्यापी सर्वगुण संपन्न सर्वश्रेष्ठ महामहिम (और दूसरा कोई नहीं) सृष्टिकर्ता ईश्वर की अभिषिक्त संतान बन कर उनके विरासत का अभिन्न हिस्सा बन जाए। स्मरण रहे, वह अपने अभिषिक्त को नहीं त्यागता, बल्कि सत्य में गतिशील रहने के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
प्रभु अपनी प्रजा को बल प्रदान करता और अपने अभिषिक्त की रक्षा करता है। अपनी प्रजा की रक्षा कर, अपनी विरासत को आशीर्वाद दें। उसका चरवाहा बन कर उसे सदा संभाल। स्तोत्र ग्रंथ 28 : 8-9
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!