TRUTH

ईश्वर सत्य है

प्रकाशित 27/04/2020


ईश्वर सत्य है जैसा कि ईसा मसीह कहते हैं:


ईसा ने उससे कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूं। मुझसे होकर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।" संत योहन 14 : 6


सत्य ही एकमात्र ईश्वर है। सत्य स्वभाव से बेहद ही शांत और सुशील है। अपने स्वभाव के कारण सत्य अत्यंत ही दयावान क्षमाशील धैर्यवान सहनशील न्यायी और अपनी सृष्टि से भरपुरी से प्रेम करने वाला है। सत्य शांति में जीवन जीने की ख्वाहिश रखने वाले के जीवन को शांतिमय बनाकर सार्थक कर देता है। सत्य के शस्त्र हैं - प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय। यही कारण है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता; हां, थोड़ी देर परेशान जरूर हो सकता है। ऐसे सार्थक जीवन देने वाले ईश्वर के सिवा, सत्य के सिवा और कौन दूसरा ईश्वर हो सकता है!!!??? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं ही प्रभु हूं, कोई दूसरा नहीं है; मेरे सिवा कोई अन्य ईश्वर नहीं। यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते, तो भी मैंने तुम्हें शस्त्र प्रदान किए। जिससे पूर्व से पश्चिम तक सभी लोग यह जान जाएं कि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं। मैं ही प्रभु हूं, कोई दूसरा नहीं। मैं प्रकाश और अंधकार, दोनों की सृष्टि करता हूं। मैं सुख भी देता और दुख भी भेजता हूं। मैं, प्रभु यह सब करता हूं। नबी इसायाह 45 : 5 - 7


अर्थात


मानव जीवन को सजाने वाले एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर, पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सब मनुष्यों को सत्य की आत्मा प्रदान करते हैं जिसमें सत्य के शस्त्र, प्रेम दया क्षमा शांती करुणा सहनशीलता धर्य और न्याय कूट-कूट कर भरी होती है ताकि मनुष्य असत्य के अंधकार से दूर सत्य के प्रकाश में एक सार्थक जीवन व्यतीत करें। इसके लिए जरूरी है कि मनुष्य अपने शरीर रुपी मंदिर के हृदय रूपी बेदी में सत्य को प्रार्थना के द्वारा सुसज्जित कर सत्य के प्रकाश में गतिशील हो और असत्य के अंधकार से दूर रहें। प्रकाश और अंधकार दोनों की सृष्टि ईश्वर ने की है; प्रकाश सत्य है और अंधकार असत्य है। हम मनुष्यों को यह तय करना है कि हम सत्य के प्रकाश में जीवन जीना चाहते हैं या असत्य के अंधकार में जीवन जीना चाहते हैं क्योंकि मनुष्य एक साथ अंधकार और प्रकाश दोनों में जीवन नहीं गुजार सकता है जैसे कोई दो नावों पर एक साथ सवार नहीं हो सकता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने फिर लोगों से कहा, "संसार की ज्योति मैं हूं। जो मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी। योहन 8 : 12


इसलिए


जो प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है, वह निश्चय ही अपने मन मंदिर में सत्य को सुसज्जित कर उसकी आराधना करता है। ऐसे व्यक्ति को सुख ईश्वर की ओर से प्राप्त होता है और दुख के वक्त वह विचलित नहीं होता क्योंकि उसने सुख दुख दोनों के मालिक ईश्वर को अपने मन मंदिर में बसाया है; इसलिए कठिन परिस्थिति में ईश्वर की कृपा निरंतर उस पर बनी रहती है।


जो अंधकार में भटकता है वह निश्चय ही अपने मन मंदिर में असत्य की मूरत (स्वार्थ की मूरति, घमंड की मूरति, ईर्ष्या-द्वेष की मूरति, क्रोध की मूरति, लालच की मूरति, वासना व्यभिचार की मूरति, दोषारोपण की मूरत ..................) को सुसज्जित कर उसकी आराधना करता है। ऐसे व्यक्ति को सांसारिक सुख जरूर नसीब होता है; लेकिन दुख के वक्त ईश्वर की छत्रछाया से वह स्वयं दूर रहकर स्वयं को हानि पहुंचाता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं प्रभु हूं, यही मेरा नाम है। मैं ना तो दूसरों को अपनी महिमा दूंगा और ना मूर्तियों को अपना स्तुतिगान। नबी इसायाह 42: 8


इससे स्पष्ट है कि मनुष्य द्वारा सिर्फ और सिर्फ सत्य की उपासना होनी चाहिए। यदि मनुष्य किसी प्रकार का असत्य की मूरत अपने शरीर रूपी मंदिर की हृदय रूपी बेदी में स्थापित करें और उसकी उपासना करें यानी असत्य करने में लीन हो जाए, तो यह ईश्वर के बर्दाश्त के बाहर है। हम मनुष्यों को यह स्मरण रखना होगा कि हम सब के सब जीवन भर सिर्फ और सिर्फ सत्य की सेवा करने, सत्य की महिमा करने और सत्य में गतिशील रहने के लिए ही ईश्वर के द्वारा रचे गए हैं। स्मरण रहे, सत्य ही एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर है।


आईए,


हम चाहे जो भी हो, कितने भी ऊंचे पद में क्यों ना आसीन हों; हमें अपने मन मंदिर में बसे तमाम अनावश्यक असत्य की मूर्तियों जैसे स्वार्थ की मूरत, घमंड की मूरत, क्रोध की मूरत, ईर्ष्या द्वेष की मूरत, लालच की मूरत, वासना व्यभिचार की मूरत दोषारोपण की मूरत ......... इत्यादि इत्यादि मूरतों को चुन-चुन कर नष्ट कर जीवंत सत्य को अपने शरीर रूपी मंदिर की हृदय रूपी वेदी पर स्थापित कर हमें निरंतर सत्य की उपासना में लीन हो जना चाहिए जैसा कि हमारे सर्वशक्तिमान सर्वश्रेष्ठ सर्वत्र व्यापी सर्वगुणसंपन्न एकमात्र महामहिम और दूसरा कोई नहीं, ईश्वर की पवित्र इच्छा है। सत्य की सेवा हेतु ऐसा आत्मिक परिवर्तन हम सब के लिए निहायत ही जरूरी है, ताकि असत्य की अंधकार से, सत्य की प्रकाश में हम गतिशील होने पाएं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


देखो, पुरानी बातें पूरी हो चुकी हैं;
अब नयी बातों की घोषणा करता हूं।
घटित होने के पूर्व मैं उन्हें सुनाता हूं। नबी इसायाह 42 : 9


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!