THE CROSS

बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला।

प्रकाशित 11/04/2023


तीसरे दिन ही अर्थात मृत्यु के मात्र 36-37 घंटे बाद पुनर्जीवित ईसा मसीह दर्शन दे दे कर यह जताने लगे कि वचन अनुसार वे जी उठे हैं; और यह साबित करने लगे कि प्रेम की परमानेंट मृत्यु असंभव है। इसी क्रम में वे येरुसालेम से एम्माउस जा रहे उनके दो शिष्यों के बीच तीसरे राहगीर के रुप में हो कर उनके साथ साथ चलने लगे; लेकिन उनके उनके ये शिष्य अपने गुरु ईसा मसीह को नहीं पहचान पाये। ताज्जुब की बात यह है 36-40 घंटे पहले जिन्हें, इन्होने दफनाया और जिनके बिषय में ये राह चलते आपस में बातचीत करते हुए जा रहे हैं, उन्हें ये कैसे नहीं पहचान सके!!!


कि ईसा स्वयं आकर उनके साथ हो लिए, परंतु शिष्यों की आंखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं। संत लूकस 24 : 15-16


येरुसालेम से एम्माउस की दूरी चार कोस है। चार कोस, लगभग आठ मील की दूरी वे ईसा मसीह के साथ तय कर रहे हैं। आज का आधुनिक युग तो है नहीं। इसलिए रास्ता भी उबड़-खाबड़ है, जंगल-झाड से भरा है; सबेरे से चलते चलते-चलते शाम हो गई; लेकिन ताज्जुब कि शिष्य तकरीबन आठ मील अथवा आठ घंटे में भी अपने प्रभु और गुरु, ईसा मसीह को नहीं पहचान सके; और जब ईसा मसीह ने तीसरे राहगीर के रुप में उनके बातचीत के बारे में उनसे पूछा, तो उन्होंने उनका मखौल उड़ा दिया -


ईसा ने उनसे कहा, 'आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?" वे रुक गए। उनके मुख मलिन थे। उनमें से एक- क्लेओपस ने उत्तर दिया, "यरूशलेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहां इन दिनों क्या-क्या हुआ है"। संत लूकस 24 : 17-18


अव्वल तो शिष्यों ने ईसा मसीह को नहीं पहचाना और दूसरा कि वे उन्हें (तीसरे राहगीर को) बुद्धु कह रहें‌ हैं कि पूरा यरूशलेम में आप‌ ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें नहीं पता कि वहां ईसा मसीह के साथ क्या हुआ है!!!


जानते हैं शिष्यों की आंखों ने ईसा को मात्र 36 से 40 घंटे बाद क्यों नहीं पहचाना?


क्योंकि


उनके मुख मलिन थे। संत लूकस 24 : 17 वचनआंश


बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला। अफसोस की बात यह हुई कि शिष्यों की नजर मात्र 36 से 40 घंटे में बुरी हो चूकी थीं; इसलिए उनके मुख मलिन थे- बुरा नजर के कारण उन्होंने तीसरे राहगीर के रुप में उपस्थित अपने प्रभु और गुरु, ईसा मसीह को नहीं पहचाना।


ईसा मसीह हमारे इस एम्माउस (जीवन) की सफर में तीसरे राहगीर के रुप में बार-बार आए और आते हैं; लेकिन हमारे मुख मलिन (नजर बुरा) होने अथवा अपने अपराधी प्रवृति के कारण, हम उन्हें नहीं पहचान सके हैं और कई बार तो उनसे उल्टी-पुल्टी, लट-पट बातें कर उनको दुखित (क्रूसित) कर दिए हैं।


एम्माउस पहुंचते पहुंचते उन्हें शाम हो गई। एम्माउस पहुंचने पर ईसा मसीह अपना कदम आगे बढ़ाने जैसा किए, तो उन शिष्यों के मन में उस तीसरे राहगीर के‌ प्रति दया की भावना भर आई इसलिए


शिष्यों ने यह कह कर उनसे आग्रह किया, "हमारे साथ रह जाइए। सांझ हो रही है अब दिन ढल चुका है" और वह उनके साथ रहने भीतर गये। ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आशीष की प्रार्थना पड़ी है और उसे तोड़कर उन्हें दे दिया। इस पर शिष्यों की आंखें खुल गई और उन्होंने ईसा को पहचान लिया.... किंतु इसे उनकी दृष्टि से ओझल हो गए। संत लूकस 24 : 29-31


जैसे ही शिष्यों का हृदय दया से भर आया, वे तीसरे राहगीर के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने लगे और कहने लगे, कहां जाएग? शाम हो चुकी है। आगे रास्ता गमगीन है, जंगल है, जंगली जानवर है। मत जाइए , हमारे साथ रह जाइए और उन्होंने तीसरे राहगीर में ईसा मसीह (प्रेम) का दर्शन किया। इस दर्शन से वे इतना आनंदित हुए कि उसी क्षण आठ मील या कहिए आठ घंटे का सफर वापस तय कर येरुसालेम लौट कर बाकी शिष्यों को ईसा के पुनर्जीवित होने की खुशी बांटने लगे।


एम्माउस जाने वाले शिष्यों को दर्शन - संत लूकस 24 : 13-35 पढ़ें।


इस एम्माउस की सफर अर्थात जीवन की सफर में जब-जब हमारा दिल आने-जाने वाले तीसरे राहगीरों के प्रति प्रेम, दया, क्षमा, करुणा, सहनशीलता, धैर्य, शांति से भरता है, हम भी निश्चित पुनर्जीवित ईसा के दर्शन करते हैं।


आज भी प्रभु जिंदा हैं और हमारे बीच माता-पिता, भाई-बहन अड़ोस पड़ोस, रिश्तेदार-नातेदारों, जाने-अनजानों अर्थात तीसरे राहगीर के रुप में दर्शन देते रहते हैं। आइए! हर रिश्ते में प्रेम का दर्शन करें।


आमीन।


ईश्वर की महिमा में जारी.....


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!