TEMPLE

जीवंत ईश्वर की उपासना

प्रकाशित 26/04/2020


सत्य ही ईश्वर है, जो अनादि काल से गतिशील है; और जीवंत है। उसमें सत्य से परिपूर्ण जीवन है। उसमें सत्य से परिपूर्ण आत्मा है। उसमें मनुष्यों को सत्यमय जीवन देकर बोलने की अद्भुत क्षमता है; क्योंकि वह जीवंत है, इसलिए वह बोल सकता है। वह आदिकाल से सत्य बोलता और सत्य करता है; और चाहता है कि मानवजाति भी मन वचन कर्म से सत्य बोलें सत्य विचारे, सत्य देखें, सत्य सुने और सत्य कर, ईश्वर के साथ सत्य में निरंतर गतिशील रहे।


निरंतरता के साथ सत्य में गतिशील रहना ही प्रार्थना है; जिसके फलस्वरूप जीवंत ईश्वर की उपासना होती है और वह मनुष्य के शरीर रूपी मंदिर में, उसकी आत्मा में निवास करता है। प्रार्थना असंभव नहीं, बल्कि कठिनाई से भरा व्यक्तिगत प्रयास है क्योंकि सत्य में निरंतरता के लिए मनुष्य को असत्य, जो उसके इर्द-गिर्द और उसके मानवीय प्रवृत्ति पर हावी होना चाहता है, को परास्त करने का चैलेंज है। सत्य तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार शांत और सुशील होता है जबकि असत्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार अशांत और बेचैन होता है; और निरंतर सत्य पर अपना अधिकार जताना और दबदबा बनाना चाहता है। गौर करने वाली बात है कि असत्य, ईश्वर के द्वारा ही उत्पन्न हुआ है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


प्रभु-ईश्वर ने धरती से सब प्रकार के वृक्ष उगाए, जो देखने में सुंदर थे और जिनके फल स्वादिष्ट थे। वाटिका के बीचों-बीच जीवन-वृक्ष था और भले-बुरे के ज्ञान का वृक्ष भी। उत्पत्ति ग्रंथ 2 : 9


ईश्वर ने असत्य इसलिए उत्पन्न किया ताकि सत्य और असत्य में भेद किया जा सके और बखूबी सत्य को पहचाना जा सके। असत्य ना होता, तो सत्य क्यों और कैसे पहचाना जाता है? सत्य की पहचान और उस पर हावी होने वाली असत्य की मात, उपवास और प्रार्थना है। हालांकि, असत्य कभी हार नहीं मानता क्योंकि वह जिद्दी और नोटी है; और संसार पर राज करना चाहता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने उत्तर दिया, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य संसार का होता, तो मेरे अनुयायी लड़ते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहां का नहीं है। योहन 18 : 36


इसका यह मतलब कतई नहीं है कि ईश्वर संसार का राजा नहीं है। वह संसार का भी राजा है; और असत्य का भी राजा है। उसने ही असत्य को बनाया है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, संसार और उसके निवासी - सब प्रभु का है। स्तोत्र ग्रंथ 24 : 1


संसार में व्याप्त असत्य भी ईश्वर का है और ईश्वर, असत्य का भी मालिक है। लेकिन संसार में जिस तरह से मनुष्यों के बीच असत्य (स्वार्थ घमंड क्रोध वासना व्यभिचार दुराचार भ्रष्टाचार अत्याचार हत्या गर्भपात जात-पात ऊंच-नीच अमीरी गरीबी छुआछूत चमचाई घूसखोरी कालाबाजारी मुनाफाखोरी अत्याचार भेदभाव.....) अपना शक्ति प्रदर्शन करता और हावी होकर राज करता है; उस प्रकार का राज्य ईश्वर का राज्य नहीं; क्योंकि वह तो सत्य है; शांत है; सुशील है; और उसका राज्य प्रेम दया क्षमा शांती करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय का है। वह चाहता है कि संसार में लोगों के बीच सत्य ही राज करे। वह चाहता है कि संसार में लोगों के हृदय में सत्य का बोलबाला हो; और लोगों के शरीर रूपी मंदिर में सत्य ही राज करे। वह तो पूरे संसार को सत्य के राज में गतिशील देखना चाहता है, जो प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रार्थना के द्वारा ही संभव है। व्यक्तिगत प्रार्थना द्वारा सत्य की निरंतरता में कोई भी व्यक्ति गतिशील हो सकता है; इसलिए बाईबल में ईश्वर की दस आज्ञाओं (Ten Commandments) में से पहली तीन आज्ञाएं इस प्रकार हैं:


1. मैं प्रभु तेरा परम ईश्वर हूँ। प्रभु अपने परमेश्वर की आराधना करना। उसको छोड़ और किसी की नहीं।


2. प्रभु अपने परमेश्वर का नाम व्यर्थ न लेना।


3. प्रभु का दिन पवित्र रखना।


अर्थात


ये तीनों आदेश - अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करने का बिषय है। इसलिए यह उचित है कि मैं एक एक कर इनका वर्णन करुं।


*पहले आदेश का वर्णन*


सिर्फ और सिर्फ सत्य की ही आराधना करने का आदेश है। आराधना करने का अर्थ है लीन हो जाना, पूरी तरह से समाहित हो जाना। इसलिए प्रार्थना, सत्य में जीवन भर लीन हो जाने का व्यक्तिगत प्रयास है। मानव स्वतंत्र है; इसलिए कोई किसी दूसरे को सत्य में लीन नहीं कर सकता है। हां! जरूर समझा सकता है, बतला सकता है और सत्य में लीन होने का मार्गदर्शन दे सकता है; जैसे कि मैं इस लेख के द्वारा प्रयास कर रहा हूं। हर इंसान को खुद ही असत्य को हराकर, सत्य में लीन होना चाहिए। प्रार्थना के द्वारा असत्य को पराजित किया जाता है ताकि सत्य में लीन हुआ जा सके। क्या कोई दो नावों पर एक साथ सवार हो सकता है!!!??? असत्य में रहकर सत्य नहीं किया जा सकता है। असत्य को छोड़ना और सत्य का दामन थामना ही प्रार्थना है, या कहिए असत्य से दूर रहना ही प्रार्थना है, या कहिए सत्य में बने रहना ही प्रार्थना है। ईश्वर नहीं चाहते हैं कि मनुष्य कतई भी असत्य की आराधना करें। असत्य की आराधना, असत्य में लीन हो जाना है। ईश्वर तो चाहते हैं कि मनुष्य प्रार्थना के द्वारा असत्य को पराजित कर सत्य की आराधना करें। ईश्वर को यह कतई बर्दाश्त नहीं कि जिनको उन्होंने सत्य में बिल्कुल अपने सदृश, पवित्र नवाजा है, वे उनके बेटी बेटियां असत्य (शैतान) की आराधना करें।


*दूसरे आदेश का वर्णन*


हर मनुष्य सत्य और असत्य के बीच ठीक-ठाक भेद करने में सक्षम है; क्योंकि मनुष्य को ईश्वर की ओर से ऐसा करने का ज्ञान बुद्धि प्रज्ञा और क्षमता प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। फिर भी यदि कोई असत्य कर सत्य का दिखावा करें, तो सत्य जो ईश्वर है उसको यह कतई पसंद नहीं होता। ऐसा करना निश्चय ही अपने सृष्टिकर्ता एकमात्र महामहिम ईश्वर को चिढ़ाने-खिझाने जैसा है; इसलिए दूसरी आज्ञा में प्रभु-परमेश्वर का नाम यानी सत् नाम अपने सांसारिक फायदे और दिखावे के लिए व्यर्थ लेने की मनाही है। जरा सोचिए, कौन ऐसा अफसर होगा, जो उसके नाम की आड़ में किसी कर्मचारी के द्वारा घूस लेने की जानकारी पाकर चुप बैठ सकता है!!!??? क्या वह अपने कर्मचारी से नहीं कहेगा कि तुमने मेरे नाम के आड़ में ऐसा कुकर्म क्यों किया!!!??? क्या वह ऐसे कुकर्म के लिए अपने उस कर्मचारी को दंडित नहीं करेगा, ताकि भविष्य में कोई भी उस अफसर का नाम भुना कर घूसखोरी ना करें!!???? सत्य नाम का दुरुपयोग निश्चय ही असत्य का महिमा मंडन है, जो हमारे सृष्टिकर्ता ईश्वर को बेहद नाराज़ करता है। यह चोरी और सीनाजोरी की तरह है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


शास्त्रियों! धिक्कार तुम लोगों को भी भी! क्योंकि तुम मनुष्य पर बहुत से भारी बोझ लादते हो और स्वयं उन्हें उठाने के लिए अपनी एक उंगली भी नहीं लगाते। लूकस 11 : 46


मतलब साफ है कि यह अच्छा नहीं कि कोई चाहे कितना भी बड़ी उपाधी या पद में क्यों ना हो, दूसरों से सत्य की उम्मीद करे और खुद असत्य करें। दूसरे से पहले हमें स्वयं ईश्वर की उम्मीद के मुताबिक सत्य में खरा उतरना चाहिए; तब हम नहीं, हममें उपस्थित सत्य अपने आप दूसरे में अपना कार्य कर लेगा। हम प्रत्येक जन को सचमुच में सत्य का नाम नहीं भुनाना चाहिए।


*तीसरे आदेश का वर्णन*


सोमवार से इतवार सातों दिन प्रभु का है। ईश्वर चाहते हैं कि मनुष्य सातो दिन निरंतरता के साथ अपने शरीर रूपी मंदिर में सत्य की आराधना करें। यह तभी संभव है जब मन मंदिर में सिर्फ और सिर्फ सत्य वास करें; जिसके परिणाम स्वरूप हर कार्य में सत्य की महिमा, सत्य की प्रशंसा, सत्य की बढ़ाई, सत्य का गुणगान बहुतायत में संभव हो। जिस प्रकार से ईश्वर ने पवित्रता के साथ सातो दिन की रचना की है, मनुष्य भी सत्य में गतिशील रह कर ईश्वर द्वारा प्रदत्त सातो दिन को पवित्र बनाए रखने में कामयाब होना चाहिए; इसलिए ईश्वर का तीसरा आदेश प्रभु का दिन पवित्र रखने का है। कौन ऐसा पिता होगा, जो चाहेगा कि उसका बेटा एक दिन चोरी करे और बाकी दिन ऑफिस जाए!!!??? ईश्वर जो हम सबके स्वर्गीय पिता हैं, कतई नहीं चाहते कि हम एक दिन पवित्र रखें और दूसरा दिन अपवित्र!!! उनकी एक ही ख्वाहिश है कि मनुष्य अपने शरीर रूपी मंदिर में हर दिन हर पल हर क्षण सत्य की आराधना करें, सत्य में लीन हो जाए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने उस से कहा, "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। यह सबसे बड़ी और पहली आज्ञा है। मती 22 :37


इसलिए


ईश्वर की उपरोक्त तीनों आज्ञाओं का पालन सिर्फ और सिर्फ प्रार्थना के द्वारा ही किया जा सकता है, जो प्रत्येक जन का व्यक्तिगत मामला है। यानी सत्य, सत्य और सिर्फ सत्य; जीवन भर सत्य में लीन। हम जो सत्य के द्वारा, सत्य के लिए, सत्य में सृजित है, सिर्फ और सिर्फ सत्य में बने रह कर ही अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की उपासना करने में कामयाब होंगे; जिसके लिए असत्य को प्रार्थना के द्वारा निरंतर मात देकर सत्य को अपने शरीर रूपी मंदिर में निरंतर बसाना होगा और यह भी ध्यान रखना होगा कि हम अपने प्रभु ईश्वर का नाम कतई व्यर्थ ना लेते हुए निरंतरता के साथ हर दिन हर पल हर क्षण सत्य की उपासना में लीन हो जाए।


हम प्रार्थना के द्वारा ईश्वर को और दूसरों को भी प्रसन्न करें क्योंकि जैसा मुझे और आपको सत्य पसंद है, वैसे ही ईश्वर और दूसरों को भी सत्य और सत कार्य प्रिय है। यहां तक कि असत्य करने वाला इंसान भी नहीं चाहता है कि उसके साथ कोई असत्य करें, कोई उसे धोखा दे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुंह से बाहर आता है। अच्छा मनुष्य अपने अच्छे भंडार से अच्छी चीज में निकालता है और बुरा मनुष्य अपने बुरे भंडार से बुरी चीज है। मती 12 : 34-35


आइए,


निरंतर प्रार्थना के द्वारा असत्य को पराजित कर अपने शरीर रूपी मंदिर के बीचों-बीच हृदय रुपी बेदी में सत्य को बसा कर सिंगार लें ताकि सिर्फ और सिर्फ सत्य ही देखें, सत्य ही सोचे, सत्य ही बोले, और सत्य ही सुने और सत्य ही करें।


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!