TEMPLE

ईश्वर का मंदिर मनुष्य का प्रार्थना स्थल है।

प्रकाशित 25/04/2020


प्रार्थना क्या है? लोग प्रार्थना क्यों करते हैं? लोग प्रार्थना में क्या मांगते हैं? आगे पढ़ने से पहले आपसे निवेदन है कि आप थोड़ा मनन चिंतन स्वयं करें क्योंकि प्रार्थना निहायत ही व्यक्तिगत मामला है जिसकी चर्चा मैं विस्तार से आगे करने वाला हूं।


प्रार्थना आत्मा और परमात्मा के बीच संवाद है जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर की आराधना उपासना इबादत महिमा करता है। क्या आप किसी ऐसे मनुष्य को जानते हैं जो बिना आत्मा के उत्पन्न हुआ हो? नहीं, ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो बिना आत्मा के उत्पन्न हुआ हो। ईश्वर सब मनुष्यों को समान रूप से प्यार करते हैं इसलिए माता के गर्भ में मानव शरीर का निर्माण करने से पहले, मानव आत्मा का निर्माण करते है, जो ईश्वर की पवित्रता से परिपूर्ण सत्य की आत्मा के सामान बिल्कुल ही पवित्र होता है। इस प्रकार ईश्वर अपनी ही पवित्रता के अनुरूप मनुष्य की आत्मा गढ़ कर, मनुष्य को अपने सदृश्य रचते हैं। यह इस बात का द्योतक है कि मनुष्य की आत्मा में सत्य निवास करती हैं और मनुष्य का शरीर, ईश्वर का चलता फिरता पवित्र मंदिर बन जाता है; जहां मनुष्य की आत्मा परमात्मा से संवाद करेगी, अपने जीवंत ईश्वर से संवाद करेगी।


क्या कोई सोने का गहना खोने के लिए खरीदता है? नहीं! कोई सोने का गहना, खोने के लिए नहीं खरीदता, बल्कि उसे बड़ी हिफाजत से संभाल कर रखता है; और उसका रख-रखाव कर उसे चमका कर रखता है कि प्रतिदिन व्यवहार के अलावा कठिन परिस्थिति में भी काम आए। सत्य ईश्वर है; और ईश्वर प्रेम है। प्रेम धन से बड़ा कोई दूसरा धन नहीं; बाकी सब धन तो ईश्वर की सृष्टि है। मनुष्य जो सोने चांदी और सांसारिक धन संपदा की इतनी हिफाजत और रख-रखाव कर संजोता है; क्या उसे ईश्वर से खैरात में अपनी आत्मा में प्राप्त प्रेम धन की हिफाजत रख-रखाव नहीं करनी चाहिए? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईश्वर प्रेम है। स्त्रोत 103


जो मनुष्य प्रेम को अपनी आत्मा में संजोता है, वह अपनी आत्मा में अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर को संजोता है; और जिसने अपनी आत्मा में सृष्टिकर्ता ईश्वर को संजो लिया, उसे अपने जीवन में क्यों और कैसे किसी प्रकार की धन की कमी होगी!!!??? न प्रेम धन की कमी होगी और न ही संसार में शांतिमय और आरामदायक जीवन जीने के लिए जरूरी संसारिक धन की ही कमी होगी।


कोई अपनी आत्मा में निरंतर ईश्वर को संजो कर ही, निरंतर ईश्वर को प्रसन्न कर सकता है। प्रार्थना, अपने एक मात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है; इसलिए अपनी आत्मा में ईश्वर को निरंतर संजोए रखना ही प्रार्थना है, जो बिल्कुल ही व्यक्तिगत कार्य है। क्या कोई दूसरों की आत्मा में ईश्वर को संजो सकता है? नहीं, कोई किसी दूसरे की आत्मा में ईश्वर को संजो नहीं सकता। हां! दूसरों को ईश्वर संजोने की सलाह और ज्ञान जरूर दे सकता है। ईश्वर को अपनी आत्मा में संजोने के लिए प्रत्येक व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार है। इसलिए ईश्वर को अपनी आत्मा में संजोना बिल्कुल ही व्यक्तिगत कार्य है। यही कारण है कि प्रार्थना बिल्कुल व्यक्तिगत कार्य है और सब जन प्रार्थना करने के लिए गढ़े गए हैं, जिसके द्वारा कोई भी अपनी आत्मा में ईश्वर को निरंतर संजो कर अपने शरीर को ईश्वर का चलता फिरता मंदिर बनाए रखने में कामयाब हो सकता है। समरण रहे, जिसके पास ईश्वर है, उसके पास सब कुछ है। ईश्वर के बिना हम कुछ भी नहीं हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं दाखलता हूं और तुम डालियां हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिस में रहता हूं, वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझसे अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। योहन 15 : 5


ईश्वर (सत्य) को अपनी आत्मा में संजोना निहायत ही जरूरी है। असत्य (झूठ फरेब.....) से संसार की सुख वैभव हासिल हो सकता है; लेकिन इसके लिए मनुष्य को सत्य से परिपूर्ण अपनी आत्मा को दांव पे लगाना पड़ेगा, जो मनुष्य के लिए बड़ी दुर्भाग्य की बात है। हमें याद रखना चाहिए कि सत्य ही सर्वसामर्थय ईश्वर है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है? मती 16 : 26


क्या स्त्री अपने बच्चे को जन्म देने के पहले उसके स्वागत में- नैपकिन, बिस्तर, कपड़ा-लता इत्यादि जैसे जरूरी सामानों का इंतजाम नहीं करती है? जब स्त्री ऐसा कर सकती है, तो क्या हमारे सृष्टिकर्ता ईश्वर बिना तैयारी के, बिना हवा पानी के, बिना संसाधनों के मनुष्य को उत्पन्न कर सकते हैं? क्या उन्हें मनुष्यों की जरूरतों की चिंता नहीं है? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, संसार और उसके निवासी - सब प्रभु का है। स्तोत्र ग्रंथ 24 : 1


यदि हम समझते हैं कि ईश्वर को हमारे शरीर और आत्मा दोनों की चिंता है तो हमें चाहिए कि हम अपनी आत्मा में ईश्वर को संजोए रखने की चिंता करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है, तो चाहे जो मांगो, वह तुम्हें दिया जाएगा। योहन 15 : 7


अर्थात


सारी सृष्टि के मालिक, ईश्वर हमारी जरूरतों को जानते हैं। हमें उनकी महिमा पूरी करने के लिए उन्हें अपने अंतरतम में निरंतर बसाए रखना जरूरी है जैसे कि दिन, दिन में ईश्वर की महिमा बखानता है; और रात, रात में। यही प्रार्थना है, जो बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है जैसे कि दिन का निरंतर दिन बने रहना, दिन का पर्सनल मामला है; और रात का निरंतर रात बने रहना, रात का पर्सनल मामला है। एक साथ पृथ्वी में कहीं दिन है तो कहीं रात; फिर भी दिन का दिन होना और रात का रात होना, दोनों का पर्सनल मामला है। ठीक वैसे ही जब दो से अधिक लोग मिलकर सामूहिक प्रार्थना कर रहे होते हैं, तो भी यह जरूरी है प्रत्येक प्रार्थना करने वाले की आत्मा में सत्य की आत्मा का वास हो ताकि मनुष्य की आत्मा (एक जन) और सत्य की आत्मा (दूसरा जन) की मिली-जुली प्रार्थना ईश्वर को ग्राहय हो। यही कारण है कि जब कोई अकेला प्रार्थना करता है और यदि उसकी आत्मा में सत्य की आत्मा का वास होता है, तो उसकी प्रार्थना या कहिए दो जन की प्रार्थना ईश्वर को ग्राहय होगी।


इसलिए


मानव जीवन का दूसरा नाम प्रार्थना है, जिसके लिए हम प्रत्येक जन सृष्ट किए गए हैं। मनुष्य के जीवन भर का निरंतर प्रयास के कारण ही मनुष्य का ईश्वर के साथ संबंध बना रहता है। जब किसी भी मनुष्य का ईश्वर के साथ संबंध विच्छेद हो जाता है, तब उसकी प्रार्थना को सुनकर ईश्वर ठुकराते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जब तुम अपने हाथ फैलाते हो, तो मैं तुम्हारी ओर से आंखे फेर लेता हूं। मैं तुम्हारी असंख्य प्रार्थनाओं को अनसुना कर देता हूं। तुम्हारे हाथ रक्त से रंगे हुए हैं। स्नान करो, शुद्ध हो जाओ। अपने कुकर्म मेरी आंखों के सामने से दूर करो। पाप करना छोड़ दो, भलाई करना सीखो। न्याय के अनुसार आचरण करो, पददलितों को सहायता दो, अनाथो को न्याय दिलाओ और विधवाओं की रक्षा करो। नबी इसायह 1 : 15-17


मनुष्य को ईश्वर ने सिर्फ प्रेम करने का आदेश दिया है। प्रार्थना, मनुष्य के शरीर रूपी मंदिर में प्रेम को निरंतर स्थापित रखने की एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है; जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य ईश्वर से और दूसरों से प्रेम कर सकता है, जैसा कि ईश्वर का आदेश है। खेद है कि मनुष्यों के द्वारा प्रेम की हत्या की प्रयास के कारण ईश्वर से उसका संधि विच्छेद हो जाता है। पाप करना, प्रेम की हत्या करने का प्रयास है या कहिए ईश्वर की हत्या करने का प्रयास है; अपनी आत्मा से ईश्वर को बाहर निकालने का प्रयास है; और अपने शरीर रूपी मंदिर को खंडहर बनाने का प्रयास है। पाप के कारण ईश्वर में मनुष्य की निरंतरता समाप्त होती जाती है। जब मनुष्य पाप की अवस्था में होता है, तो ईश्वर पश्चताप को छोड़ किसी प्रकार की प्रार्थना सुनने के मूड में नहीं होते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि मनुष्य सच्चा पश्चाताप कर अपने शरीर रूपी मंदिर में सत्य को पुनर्स्थापित करें, ताकि प्रार्थना की निरंतरता बरकरार रहे।


आईए,


हम अपने जीवन को प्रार्थना का नाम दे कर अपने शरीर रूपी मंदिर में निरंतर ईश्वर की महिमा में लीन हो जाए और ईश्वर से इस जीवन को जीने के लिए सत्य के तमाम प्रतीक, प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय के साथ-साथ जरूरी ज्ञान बुद्धि प्रज्ञा मेहनत मजदूरी प्राप्त करें और आरामदायक जीवन जीकर एक दिन इसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तिगत प्रार्थना के बल पर अमरत्व को प्राप्त करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


तब राजा अपने दाएं के लोगों से कहेंगे, "मेरे पिता के कृपापात्रों! आओ और उस राज्य के अधिकारी बनो, जो संसार के प्रारंभ से तुम लोगों के लिए तैयार किया गया है; क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे खिलाया; मैं प्यासा था और तुमने मुझे पिलाया; मैं परदेशी था और तुमने मुझको अपने यहां ठहराया; मैं नंगा था और तुमने मुझे पहनाया; मैं बीमार था और तुम मुझसे भेंट करने आए; मैं बंदी था और तुम मुझसे मिलने आए।" इसपर धर्मी उनसे कहेंगे, "प्रभु! हमने आपको कब भूखा देखा और खिलाया? कब प्यासा देखा और पिलाया? हमने कब आपको परदेशी देखा और अपने यहां ठहराया? कब नंगा देखा और पहनाया? कब आपको बीमार या बंदी देखा और आपसे मिलने आए?" राजा उन्हें उत्तर देंगे, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूं-तुमने मेरे इन भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों ना हो, जो कुछ किया, तुमने मेरे लिए ही किया।" मती 25 : 34-40


आईये, अपने शरीर रूपी मंदिर में ईश्वर को स्थापित कर, ईश्वर की आराधना उपासना स्तुति महिमा प्रशंसा बढ़ाई इबादत में निरंतर लीन होकर ईश्वर और सब जन की सेवा करें; हम सब की प्रार्थना ईश्वर को ग्राहय हो। बस इतना ही प्रार्थना तो ईश्वर को प्रसन्न करने और स्वयं के बहुमूल्य जीवन को शांतिपूर्ण, सफल और आरामदायक बनाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर करना है।


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!