प्रकाशित 24/04/2020
दिन होता है, तो हम कहते हैं, दिन हो गया। रात होता है, तो हम कहते हैं, रात है। दिन और रात का चक्र हम निरंतर देखते हैं। दिन अपना निश्चित समय गुजार कर मेरे लिए समाप्त होता है और रात भी अपना निश्चित समय गुजार कर मेरे लिए समाप्त होता है। दिन, दिन को ईश्वर की महिमा बखानता है और रात, रात को ईश्वर की महिमा बखानता है। जब रात होती है, तो हम कहते हैं, आज का दिन खत्म हुआ और जब दिन होता है, तो हम कहते हैं, रात बीत गया। लेकिन सच पूछिए, तो न ही दिन खत्म होता है और न रात; ये दोनों मेरे सामने ईश्वर की पवित्र इच्छा पूरी कर, कहीं और ईश्वर की पवित्र इच्छा पूरी करने चले जाते हैं, हालांकि दोनों में से एक हमेशा निर्धारित समय तक ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए मेरे सामने डटे रह कर एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा बखानता है। जब दिन मेरे सामने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा बखान रहा होता है, तो रात कहीं और दूसरों के सामने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा बखान रहा होता है और जब रात मेरे सामने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा बखान रहा होता है, तो दिन कहीं और दूसरों के सामने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा बखान रहा होता है।
ना तो मैंने दिन को और ना ही कभी रात को एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की महिमा करने में कभी थकते, अंसाते, अधाते या उबते देखा है। ये दोनों अनवरत एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर द्वारा इनके लिए निर्धारित संहिता / विधान /नियमावली के अनुसार आचरण कर ईश्वर को प्रसन्न कर रहे हैं। इस तरह दिन और रात दोनों, निर्धारित विधान का निरंतर पालन करते हुए अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की उपासना आराधना महिमा गुनगान में लीन हैं। ना मैंने कभी दिन को थकते, अंसाते, अधाते या उबते देखा और ना रात को। ईश्वर की इच्छा पूरी करना और आराधना करना तो, कोई दिन और रात सीखे!!!
दिन 24X7X365 के हिसाब से यानी दिन के 24 घंटे, सप्ताह के 7 दिन और बर्ष के 365 दिन ईश्वर की पवित्र इच्छा पूरी कर ईश्वर की आराधना करने में लीन हैं और रात भी 24X7X365 के हिसाब से यानी दिन के 24 घंटे, सप्ताह के 7 दिन और बर्ष के 365 दिन ईश्वर की पवित्र इच्छा पूरी कर ईश्वर की आराधना करने में लीन है। इससे यह भी उजागर होता है कि ईश्वर की पवित्र इच्छा पूरी करना दिन और रात का अपना-अपना पर्सनल मामला है और इस मामले में न ही कभी दिन खत्म होता और न रात। ये दोनों रात-दिन एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर की पवित्र इच्छा / आज्ञा / विधान / संहिता / नियमावली का पालन कर एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर के प्रति अपना आभार और प्रेम प्रकट करते हैं। अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्रेम करना कोई इन दोनों से सीखें!!!
हम मनुष्य तो ईश्वर के द्वारा, ईश्वर की पवित्रता के सदृश सृष्ट किए गए हैं ताकि हम जीवन भर सत्य में गतिशील रह कर ईश्वर की महिमा के लिए अपना जीवन व्यतीत करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
जो मुझे प्यार करते हैं और मेरी आज्ञाओं का पालन करते हैं, मैं हजार पीढ़ियों तक उन पर दया करता हूं। विधि-विवरण ग्रंथ 5 : 10
अर्थात
ईश्वर, स्वयं आदि काल से निरंतर सत्य में गतिशील हैं। यही कारण है कि वे बेहद पवित्र हैं। वे अपनी पवित्रता के अनुसार मनुष्यों को रचते हैं और चाहते हैं कि मनुष्य भी उनकी तरह निरंतर सत्य में गतिशील रहे जैसे दिन, दिन में और रात, रात में निरंतर गतिशील है। इसलिए सिर्फ सत्य करने का आदेश है या कहिए असत्य ना करने का आदेश है- जैसे हत्या मत करो; व्याभिचार मत करो; चोरी मत करो; झूठी गवाही मत दो; अपने माता-पिता का आदर करो; पराए धन पर लालच मत करो, पर स्त्री की कामना मत करो............ ताकि अनवरत ईश्वर (सत्य) की उपासना मानव शरीर रुपी मंदिर में होती रहे। जैसे दिन, दिन को ईश्वर की महिमा बखानता है और रात, रात को। ठीक उसी प्रकार मनुष्य सत्य में निरंतर गतिशील रहकर ही अपने चलते-फिरते मंदिर में सत्य से परिपूर्ण ईश्वर की महिमा बखान सकता है। सत्य को बखानने के लिए जरूरी है कि मनुष्य, ईश्वर (सत्य) को निरंतर प्यार करे जैसा कि दिन और रात 27X7X365 के हिसाब से निरंतर ईश्वर से प्यार करते हैं।
इसलिए
ईश्वर की आज्ञाओं को जाने, पहचाने, मनन करें और पालन कर ईश्वर की आराधना उपासना महिमा इबादत कर अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर के प्रति अपना आभार और प्रेम का इजहार करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उस से कहा, "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। यह सबसे बड़ी और पहली आज्ञा है। दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इन्हीं दो आज्ञाओं पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलंबित है। मती 22 :37-40
जो मनुष्य ईश्वर से प्यार करेगा, वही सत्य से परिपूर्ण ईश्वर के आज्ञाओं का पालन करेगा। वैसे ही मनुष्य का आचरण प्रभु ईश्वर को ग्राहय होगा जैसे कि दिन और रात के आचरण से, ना एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर उबते हैं और ना हम मनुष्य।
आईए,
हम सब भी दिन और रात की तरह आपने-अपने आचरण को व्यक्तिगत तौर पर सत्य आधारित आज्ञाओं का पालन कर अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर के प्रति अपना आभार और प्यार का इजहार कर ईश्वर (सत्य) को प्रसन्न करें और अपने शरीर रुपी चलते फिरते मंदिर में निरंतर सत्य की उपस्थिति कायम कर उनकी उपासना आराधना इबादत में अनवरत लीन हो जाएं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ़ बना रहता हूं। योहन 15 : 10
सत्य की महिमा हो, सत्य को धन्यवाद।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!