प्रकाशित 23/04/2020
ईश्वर ने मानव शरीर को अपने चलते-फिरते मंदिर के रुप में सृष्ट किए हैं ताकि मानव अपनी अंतरात्मा में ईश्वर की उपस्थिति के कारण जीवन भर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर के द्वारा संचालित रहे। ईश्वर सत्य हैं इसीलिए मनुष्यों को जीवन भर अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर की पवित्र इच्छा के अनुसार सिर्फ और सिर्फ सत्य के द्वारा संचालित रहना चाहिए। यही कारण है कि मैं मानव जीवन को कुछ इस प्रकार परिभाषित करता हूं, "मनुष्य, ईश्वर के द्वारा, ईश्वर में और ईश्वर के लिए सृष्ट किए जाते हैं।" जरा सोचिए कि हम अपने सृष्टिकर्ता एकमात्र महामहिम, दूसरा कोई नहीं, ईश्वर से अलग हो कर कुछ भी अच्छा नहीं कर सकते। सत्य से अलग होकर कोई सत्य कैसे कर सकता है!!!??? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मैं दाखलता हूं और तुम मेरी डालियां हो। जो मुझमें रहता है और जिसमें मैं रहता हूं, वह बहुत फलता है; क्योंकि मुझसे अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। योहन 15 : 5
जब कोई ईश्वर से अलग होता है, तो सत्य के अभाव में मानव शरीर रुपी मंदिर असत्य (शैतान) जैसे लूटेरों का अड्डा बनता जाता है और मनुष्य का शरीर रुपी ईश्वर का मंदिर खंडहर में बदलता जाता है; जिसका वर्णन मैंने विस्तार से कल के लेख में किया है। यदि नहीं पढ़े हैं, तो नम्र निवेदन है कि आप जरूर पढ़ें। जब तक मनुष्य अपने शरीर रुपी ईश्वर के मंदिर का रख-रखाव करता रहता है, उसके यहां ईश्वर निवास करते हैं और सत्य के तमाम प्रतीक, प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य न्याय, की मधुर धारा वहां से निकल कर दूसरों को भी शीतलता प्रदान कर तृप्त करती है। लेकिन जब मनुष्य अपने शरीर रुपी ईश्वर के मंदिर के रख-रखाव में ढिलाई या कंजूसी करता जाता है, उसके यहां ईश्वर का निवास खत्म सा होता जाता है; और असत्य (शैतान) के तमाम प्रतीक, स्वार्थ घमंड क्रोध लालच ईष्र्या द्वेष जलन हत्या गर्भपात लूट-खसोट चोरी डकैती आगजनी दबंगई कालाबजारी ब्लैकमेल चमचई कामचोरी लम्पटता झूठ-फरेब जुआ अहंकार जात-पात भेदभाव अमीरी-गरीबी छोटा-बड़ा अपना-पराया छूवाछूत रेप अन्याय.............. की कटुतापूर्ण धारा वहां से निकल कर दूसरों को परेशान हैरान कर अशांति फैलाती है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
पापी अपने मार्ग छोड़ दें और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दें। वह प्रभु के पास लौट आए और प्रभु उसपर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है। प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। नबी इसायह 55 : 7-8
अर्थात
सत्य के विचारों से परिपूर्ण ईश्वर आदि से सत्य के मार्ग में निरंतर गतिशील हैं लेकिन पाप की प्रवृति के कारण मानवजाति सत्य के पवित्र विचारों से अलग हट कर, सत्य के मार्ग से असत्य के कुमार्ग में भटक गए हैं, जैसे कि आज हमारी स्थिति है। पर्सनली ना लें, बल्कि मनन चिंतन करें। क्या ईश्वर ने हमें अपने सत्य के विचारों से भरकर सत्य के अपने मार्ग में गतिशील रहने के लिए नहीं रचे हैं!!!???
इसलिए
हम सब जो असत्य के मार्गों में भटक रहे हैं; असत्य के कुटील विचारों को त्याग कर अपने शरीर रुपी ईश्वर के मंदिर को सत्य के विचारों से भर कर सत्य के मार्ग में गतिशील हो जाएं, ताकि हम सब संसार में जहां भी हों, एक ही झुण्ड के हों यानी सत्य के झुण्ड के हों और हमारा एक ही ईश्वर हो, जो सत्य है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मेरी और भी भेड़ें है, जो इस भेड़शाला की नहीं हैं। मुझे उन्हें भी ले आना है। वे मेरी आवाज़ सुनेंगी। तब एक ही झुण्ड होगा और एक ही गड़ेरिया। योहन 10 : 16
आईये,
हम अपने-अपने शरीर रुपी मंदिर का, सत्य की खातिर पुनर्निर्माण करें जैसा कि ईश्वर की पवित्र इच्छा है और अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर जिनके द्वारा हम सब के सब उत्पन्न किए गए हैं, की आराधना उपासना इबादत में लीन हो जाएं जिसके परिणामस्वरूप सत्य के तमाम प्रतीक, प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय इस संसार में फले फुले और सर्वत्र फैल जाए।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!