TEMPLE

ईश्वर बिन मंदिर की परिकल्पना व्यर्थ

प्रकाशित 22/04/2020


पानी बिन नदी कैसा? शिखर बिन पर्वत कैसा? हरियाली बिन खेत कैसा? फूलों बिन बाग कैसा? ............ फिर भी, पानी बिन नदी, नदी ही कहलाती है। शिखर बिन पर्वत, पर्वत ही कहलाती है। हरियाली बिन खेत, खेत ही कहलाती है। फूलों बिन बाग, बाग ही कहलाती है। ............ लेकिन ईश्वर बिन मंदिर की परिकल्पना व्यर्थ और निरर्थक है। कल मैंने चर्चा किया है कि ईश्वर मनुष्य को अपना चलता-फिरता मंदिर बनाते हैं। पहले मनुष्य की आत्मा को सत्य से नवाजते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


माता के गर्भ में रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया है। यिरमियह 1 : 5


फिर सत्य से परिपूर्ण आत्मा को माता के गर्भ में रख कर शरीर रुपी मंदिर की रचना करते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


तूने मेरे शरीर की सृष्टि की, तूने माता के गर्भ में मुझे गढ़ा। स्तोत्र ग्रंथ 139 : 13


मतलब ईश्वर है, तो मंदिर है। ईश्वर की आत्मा या कहिए सत्य की आत्मा या कहिए पवित्र आत्मा एक ही बात हैं। ईशवर ने मनुष्य की आत्मा और शरीर रुपी अपने मंदिर, दोनों को ही अपने पवित्र आत्मा के समान पवित्र बनाते हैं क्योंकि ईश्वर अपने से कम पवित्र स्थान में क्यों और कैसे निवास कर सकते हैं? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईश्वर ने कहा, "हम मनुष्य को अपना प्रतिरुप बनायें, वह हमारे सदृश हो। उत्पत्ति ग्रंथ 1 : 26


मनुष्य रुपी ईश्वर के चलते-फिरते मंदिर को स्वयं ईश्वर बिल्कुल अपने सदृश पवित्र रचते हैं और रचने के बाद उस चलते-फिरते मंदिर के रख-रखाव का जिम्मा उस मनुष्य को ही सौंप देते हैं; और उम्मीद करते हैं कि मनुष्य स्वयं ईश्वर के चलते-फिरते मंदिर को बिल्कुल वैसा ही पवित्र रखें जैसा कि उसकी रचना के वक्त ईश्वर ने उसे पवित्रता दिया था। लेकिन क्या मनुष्य अपने ईश्वर के चलते-फिरते अपने शरीर रुपी मंदिर को ईश्वर की उपस्थिति के लायक पवित्र रख पाता है या उम्र के साथ अपने शरीर रुपी मंदिर को पापों में गिराकर खंडहर में बदलता जाता है!!!??? ऐसा खंडहर जहां जुआड़ी शराबी हिंसा लूटपाट, लड़ाई-झगड़ा ईष्र्या द्वेष वासना व्यभिचार स्वार्थ लोभ-लालच, घृणा हत्या गर्भपात घुसखोरी, मुनाफाखोरी, ............. अन्याय आकर अड्डा बाजी और राज करते हैं!!! ; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा मंदिर में प्रवेश कर बिक्री करने वालों को यह कहते हुए बाहर निकलने लगे, "लिखा है- मेरा घर प्रार्थना का घर होगा, परन्तु तुम लोगों ने उसे लुटेरों का अड्डा बनाया है।" लूकस 19 : 45-46


अर्थात


जब मनुष्य अपने शरीर रुपी मंदिर को अपने पापों के कारण असत्य (शैतान) का अड्डा बना कर खंडहर में बदलने लगता है, तो ऐसा, ईश्वर बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं। जिस दिन मनुष्य का शरीर रुपी ईश्वर का मंदिर बिल्कुल खंडहर में परिवर्तित हो जाता है; ईश्वर की नाराज़गी सीमा के पार होती है।


इसलिए


हम प्रत्येक जन, जो ईश्वर के चलते-फिरते मंदिर हैं, हमें ईश्वर की नाराज़गी से बचने के लिए


(1) हमें अपने संसारिक कमजोरियों की छानबीन और पहचान करनी है, जिसके कारण हमारा शरीर रुपी ईश्वर का मंदिर जल्दी-जल्दी खण्डहर में परिवर्तित होता जा रहा है।


(2) फिर उन तमाम पापों के लिए सच्चे हृदय से पश्चाताप में लीन हो जाना है।


(3) फिर अपने संसारिक वासनाओं और कमजोरियों से समय के साथ धीरे-धीरे निरंतर उपवास और प्रार्थना के द्वारा खंडहर हो रहे अपने शरीर रुपी ईश्वर के मंदिर को मुक्ति दिला कर पुनः उसी पवित्रता मे परिवर्तित करना है, जो ईश्वर के निवास के लायक हो और जैसा कि ईश्वर ने उसे अपने निवास के लायक अपने सदृश रचा था।


ऐसा करने पर निश्चित ईश्वर की कृपा बरसेगी; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करुंगा और तुम में जीवन आ जायेगा। एजेकिएल 37 : 14


ईश्वर मनुष्यों से ऐसे ही परिवर्तन (पाप से पुण्य की ओर या कहिए अधर्म से धर्म की ओर) की कामना करते हैं; और जो व्यक्ति ऐसे परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाता है, उसे निश्चय ही इस पवित्र कार्य यानी ईश्वर के लिए मानव शरीर रुपी मंदिर के पुनर्निर्माण में ईश्वर की महती दया, कृपा और साथ प्राप्त होता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


कुछ लोग मंदिर के बिषय में कह रहे थे कि वह सुन्दर पत्थरों और मनौती के उपहारों से सजा है। इस पर ईसा ने कहा, "वे दिन आ रहे हैं, जब जो कुछ तुम देख रहे हो, उसका एक पत्थर भी दूसरे पत्थर पर नहीं पड़ा रहेगा-सब ढह दिया जायेगा। लूकस 21 : 5-6


आईये, हम अपने शरीर रुपी पाप के खंडहर को ढह कर ईश्वर की सहायता प्राप्त कर अपने शरीर को ईश्वर का चलता-फिरता मंदिर में परिवर्तित करें।


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!