हकीकत

जंग और पड़ोसियों पर दो लाइनें पढ़ता हूं.....

प्रकाशि 17/08/2025


उनके अरबपति पड़ोसी अरबों का ढेर है, पर उनके रुह से मोहब्बत महरुम हैं।

जरा सी इन्हें इंसानियत की ख्यालात होती, ये अपने टेबलों की बची रोटियों गाजा भेज देतीं।

कैसी पचती हैं इनके पेट की रोटियां, जब भूख से सूख रहे बगल-ए-गाजा में मासूमों की अंतड़ियां।

दूनियां देख कराहती है उनकी छातियों से झांकती हड्डियां, कैसे बेपरवाह हैं तेरे पड़ोसियों की आंखों की पुतलियां।

खजाना नहीं बांटों, लेकिन पड़ोसी को अपना दिल तो बांट लो, गर दिल छोटा है, तो उसे अपने खजाने में तलाश लो ।

समझ नहीं आता, तुम कैसे समझोगे, उन भूखों पर हो रहे जुल्म से तुम कब तक आंखें फेरोगे।

तेरी रहीशी देख, उन भूखे-प्यासों की अब लार टपक रही है,
कब समझोगे पानी को तरसती उनकी टपकती लार उनके शरीर का पानी सूखा रही है।

भूख और प्यास के मारें हैं वे , और तुम अरबों डकार कर भी अरबों के भूखे-प्यासे हो।

समझ लो,
खुदा के बिना कोई वतन भी नहीं होता, तो कैसे कहते हो, बगल-ए-गाजा के वे, हम-वतन नहीं होता।

एक समय जरूर आयेगा,
जब वे महरुम खुदा के सामने महान और वहां तेरा खुल्ले अपमान किया जाएगा।
तब तेरे अरमान फीका और उनके महान बनाया जाएगा, तब तू रोएगा, और वे जन्नत-ए-जश्न मनायेगा।




ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!