हकीकत

जंग और पत्रकारिता पर दो लाइनें पढ़ता हूं .....

प्रकाशि 13/08/2025


(1) असलाहों की धमाकों से हम ना डरते हैं, प्रेस की स्वतंत्रता की खातिर, भारी कीमत अदा करते हैं ।
पत्रकारों की जान की कीमत पर हम, मैदान-ए-जंग से न्यूज़ अदा करने की दुस्साहस करते हैं ।।


(2) ये पत्रकारों पर टूट पड़ते हैं, जो इनपर भारी पड़ते हैं ।
तौबा-तौबा, ये पत्रकारों की बस्ती उजाड़ने के मूड में दिखते हैं।।

क्या इनकी कमजोरी है? क्या इन्हें झकझोरती है?
क्या पत्रकारों के नाज़ुक कैमरे, इनकी असलाहों पर भारी पड़ते हैं। ।

क्या छुपाना चाहते हैं ये ? क्या दबाना चाहते हैं ये ?
जो अपने असलाहों के दम पर ये , निहत्थे पत्रकारों टूट पड़ते हैं ये। ।

सलाम उन पत्रकारों का, आदाब उन जांबाजों का,
जो कब्रिस्तान में सोते हुए भी, मासूमों पर हो रहे अत्याचारों की यादें ताजा कर जाते हैं। ।


(3) ये पत्रकारों का कफन नहीं, ये दुश्मनों के कारीसतानी की दफन-ए-मंशा है ।
दफन ना कर सकोगे अपनी ये करतूतें, यह निहत्थे पत्रकारों की शहादत-ए- दास्तां है।।




ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!