हकीकत

ऐलाने जंग और इंसानियत पर दो लाइनें पढ़ता हूं.......

प्रकाशि 29/07/2025


(1) इंसानों की बस्ती ही नहीं, ये कब्रिस्तान भी उजड़ते हैं ।।
दरिंदगी का यह आलम है, ये कब्रिस्तानी शम्मा बुझाते हैं ।।
ये खुद ना चैन से सोते हैं, और ना ही मुर्दों को चैन से सोने देते हैं ।।


(2) ये मासूमों की मौत के फरमान पर दस्तखत करने वाले,
मौत से खुद इतना डरते हैं, शायरन की पहली आवाज से पहले बंकर में समा जाते हैं ।।

बुजदिल हैं ये, कायर हैं ये,
जो अपनी जिंदगी के सामने दूसरों की जिंदगी को नाचीज़ समझते हैं।।

अपनी जिंदगी के वास्ते ये ऐल-फैल ज़मीं तलाशते है; इसलिए औरों की ये कत्ल कर, अपने पांव पसारते हैं ।।

हद है इनकी सोच, बेहद नीच है इनकी सोच,
जो अपने पूरे तेवर में सज कर, मासूमों को मानव-जानवर पुकारते हैं ।।

ऐलाने जंग पर दस्तखत करने वाले,
ये मानव-जानवर का नारा दे कर अपनी फौजों में मासूमों के लिए नफ़रत और क्रूरता की बीज बोते हैं ।।


(3)ना मुझे उर्दू आती है, और ना सलीके से हिंदी;
बस इंसानियत की खातिर, हकीकते-जंग की दास्तां बारुदों में झुलसने से पहले, इंसानियत की मर्यादा खातिर लिखता हूं ।।

मुझे हिंदी नहीं आती, ये हिंदी की कोई बात नहीं । मुझे उर्दू नहीं आती, ये उर्दू की कोई बात नहीं ।।
ये भाषा की कोई बात नहीं, ये मजहब-जति की भी बात नहीं ।
ये भाषा से परे इंसानियत की भाषा है, जिसे गूंगे भी बोल लेते हैं ।।
तो ऐ खुदा! बीस महीनों से हूकुमत पे काबिज़ ये तमाम, इंसानियती भाषा से क्यों कतराते हैं ।।



ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!