प्रकाशित 27/07/2025
(1) तुझे नहीं समझ आया, तेरे अपनों की तबाही का मंजर । तू देख कर भी चुप रहा, तेरे अपनों की तबाही का मंजर ।।
एक नज़र तो तू देखो ले, अपनों के तड़पने और कराहने का मंजर ।
यदि तू समझ लेता, तो तेरे अपनों को जख्म ना होता । उन्हें अपनों के पागलपन और खुद्खुशी का कोई ग़म ना होता ।।
वे तेरे अपने थोड़े ही हैं, जो तुझे समझ आयेगा । दूसरों की बरबादी में तू सत्ता का भूखा, रे! तुझे कौन समझाएगा ।।
(2) जिन्हें अपने बाजुओं का है गुमान, उन्होंने दफ़नाए मासूमों के अरमान ।।
अब हो रही उन दबंगों की किरकिरी और तड़प रहे मासूम की फिटकिरी।।
यह जान ले, समय बदलते देर नहीं होता, नादान शेर कभी ढेर नहीं होता ।।
समय रहते तू संभल जा, उन मासूमों का खून ना बहा ।।
नहीं समझोगे तो तेरी शामत आएगी । ऐसी शामत, जो जानलेवा शेर को भी ढेर कर जाएगी ।।
(3) इस जंग को देख कर मैं दंग हुआ, यह जंग से बेवफाई है ।।
ये कैसी जंग है, जहां फौज, फौज से नहीं; निहत्थों और मासूमों से टकराईं है ।।
(4) ये जंग की बेशर्मी है, जहां जंगी पैदा करने वाली, जंग में उतारी जाती हैं ।।
वह बिल्कुल निर्मम हो कर , ममता की चारदीवारी लांघ जाती है ।।
हाथ में बंदूक माथे पर कफन लिए, मासूमों को निगलती जाती है ।।
ऐ खुदा! ये जंग की फूहड़ता है, जहां ममता भी उजाड़ी दी जाती है ।।
(5) नासमझ घोड़े की दास्तान मैं किसे सुनाऊं, बेलगाम घोड़े की दास्तान मैं किसे सुनाऊं ।।
कोई लगाम से आजाद हो जाए, तो मैं किसे सुनाऊं, इस रौंदने वाली जुल्म की दास्तान मैं किसे सुनाऊं ।।
इस रौंदने वाली जिद्द की दास्तान मैं किसे सुनाऊं ।।
(6) क्यों खुदा की दुहाई देते हैं, क्यों मासूमों की कत्ल करते हैं?
क्यों खुदाई किताब के बहाने, क्यों मासूमों की कत्ल करते हैं?
क्या यही उनकी मजहब है? नहीं! यही बस उनकी ख्वाहिश है ।।
अपनी ख्वाहिशों में, वे जिंदगी को इतनी ओछी क्यों समझते हैं?
(7) पानी को मरहूम वे, अब आंसू ही घूंट लेते हैं ।
जिनके आंखों में आंसू नहीं, वे पानी के हाहाकारों पर टूटते हैं ।।
(8) इक दर्द का ऐसा मंजर, सुन कर मैं हैरान हूं ।
वह तो अम्मा है, जो दर्द भरे मंजर का चश्मदीद हूं ।।
अपने नवजात की लाश पर बिलखती है, कहती हैं, काश! तू मेरे कोक में ना आया होता ।
तुझे पालने की जिद्द ना पालती मैं ।।
क्यों तू पैदा होते ही जुल्म को कुर्बान हुआ । क्यों तू मेरे कोक में दो और दिन रुक ना सका ।।
माफ़ करना मैं तूझ बचा ना सकी । इन जालिमों के हाथ से तुझे छुड़ा ना सकी ।।
सब खत्म हो गया मेरे औलाद । तेरी मेरी तमन्ना बारुदों में दफन हो गई ।।
(9)उनके बगीचे की खाद उन मासूमों से आती हैं। नासमझ वे अपने गमलों की फूल देख इतराते हैं।।
उन्हें कहां पता उन गमले में फूल नहीं, मासूम मुस्कुराते हैं।।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!