प्रकाशित 27/05/2020
आईए, धर्मग्रंथ में लिखें वचन से वचन और उसके मर्म को समझने का प्रयास करते हैं :
वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गए। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शांति मिले!" परंतु वे बिस्मित और भयभीत होकर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं। लूकस 24 : 36-37
ईसा मसीह की शांति देने के वचन का शिष्यों पर कोई असर नहीं पड़ा। ईसा मसीह अपने शिष्यों को कह रहे हैं- तुम्हें शांति मिले- लेकिन शांति पाने के बजाय शिष्य विस्मित और बहुत ज्यादा घबराए हुए हैं। बड़ी ही अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है; ईसा मसीह अपने शिष्यों को शांति देना चाहते हैं लेकिन उनके शिष्य शांति पाने के बजाय अशांत हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मृत्यु से पहले ईसा मसीह अपने शिष्यों के साथ जीवन व्यतीत करते समय उन्हें जो वचन दिया करते थे, शिक्षा दिया करते थे उसे उनके शिष्य हृदय गमन नहीं करते थे; अपने हृदय में अंकित नहीं करते थे। एक कान से सुनते थे, और दूसरे काम से बाहर कर देते थे।
ईसा मसीह तो स्वयं एक लिविंग स्टाइल है; जीवन जीने का तरीका हैं। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उनसे कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन में हूं। मुझ से हो कर गए बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता। योहन 14 : 6
वे जीवन जीने का एकमात्र ऐसा तरीका हैं, जिस पर वे स्वयं चल कर पिता ईश्वर के दर्शन किए हैं; जिस पर चल कर वे स्वयं पिता ईश्वर के साथ पवित्र आत्मा में एक हो गए हैं। उनका जीवन जीने का तरीका प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय से परिपूर्ण है। उसी जीवन जीने के तरीके पर चलकर वे एकमात्र ऐसा लिविंग लीजेंड हैं, जिनकी तुलना में संसार के तमाम महान से महानतम व्यक्तियों की व्यक्तित्व फीकी नजर आती है। जिस तरह के जीवन जीने का तरीका को अपनाकर वे महानों में महान बन गए हैं, उसी जीवन जीने का तरीका का अनुसरण करने का आह्वान वे संसार भर के लोगों से करते हैं, ताकि संसार भर के लोग ईश्वर की नजर में महान बन कर महिमान्वित किए जाएं। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।" मती 16 : 24
यदि शिष्य, प्रभु के उपरोक्त वचन को अपने हृदय में जड़ लेते और इस वचन के अनुसार प्रभु का अनुसरण करते, तो वे भी प्रभु के जीवन स्टाइल के अनुसार इस संसार में जीवन जी सकते। प्रभु का जीवन तो डर भय, घबराहट, विस्मित होने, आश्चर्यचकित होने से बहुत ऊपर उठा हुआ जीवन था। जरा सोचिए, जब उनके जानी दुश्मनों की सैलाब/भीड़ हथियार से लैस होकर उनके सामने खड़ी थी, तो उस हंगामे के बीच भी वे बिल्कुल शांत खड़े थे। उनमें किसी प्रकार की उत्तेजना नहीं थी। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
ईसा, यह जानकर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी, आगे बढ़े और उनसे बोले, "किसे ढूंढते हो?" उन्होंने उत्तर दिया, "ईसा नाजरी को।" ईसा ने उनसे कहा, "मैं वही हूं।" वहां उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खड़ा था। जब ईसा ने उन से *कहा, "मैं वही हूं", तो वे पीछे हट कर भूमि पर गिर पड़े।*योहन 18 : 4-6
ईसा मसीह के शांत स्वभाव का औकात देखिए कि उनके बोलने मात्र से, उनके वचन मात्र से, कि मैं वही हूं, उतनी खूंखार भीड़ भूमि पर गिर पड़ी; वे चाहते तो पूरी भीड़ को नष्ट कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया- उन्होंने विषम परिस्थिति में भी बिल्कुल शांत रहने का उदाहरण पेश किया है और यह जताया है कि उनके साथ ईश्वर है। जैसा शांतिमय जीवन ईसा मसीह ने संसार में जिया है, वैसे ही शांतिमय जीवन जीने के लिए वे लोगों को उनका अनुसरण करने का आह्वान करते हैं; वचन देते हैं; शिक्षा देते हैं। यदि शिष्य, ईसा मसीह के जीवन जीने के वचन को अपने हृदय में अंकित कर उसका पालन करते, तो बंद कमरे में पुनर्जीवित ईसा मसीह की उपस्थिति पर डरने के बजाय वे बहुत ज्यादा आनंदित हो उठते।
प्रभु ईसा मसीह स्वयं शांतिमय जीवन जीने का अद्भुत एवं नायाब तरीका हैं। उनकी सत्य की शिक्षा ही उनका वचन है, जो समस्त मानव जाति को शांतिमय जीवन जीने का तरीका सिखलाती है। इसलिए ईसा मसीह जैसे सत्य हैं, वैसे ही उनका वचन भी सत्य है; या कहिए ईसा मसीह और उनका वचन अलग अलग दो नहीं, बल्कि एक ही हैं- दोनो शांतिमय जीवन जीने के तरीका का रास्ता दिखाते है। जिसने ईसा मसीह के वचन को अपने दिल में जड़ लिया, उसने ईसा मसीह को अपने दिल में जड़ लिया; और जिसने ईसा मसीह को अपने दिल में जड़ लिया उसने उनके शांतिमय वचन को अपने दिल में जड़ लिया। शिष्य तो न ही ईसा मसीह को दिल में जड़े थे, और न ही उनके शांतिमय वचन को। यही कारण है कि बंद कमरे में साक्षात ईसा मसीह की उपस्थिति और उनके शांतिमय वचन - तुम्हें शांति मिले- के बावजूद वे सभी विस्मित, अशांत और बिल्कुल डरे हुए थे। वे न ईसा मसीह को पहचान पाए और न उनके बचन को ही।
ईसा मसीह का बंद कमरे में शिष्यों को कहना- तुम्हें शांति मिले- इस बात का आह्वान है कि तुम वचन को ह्रदय गमन कर लो, वचन को अपने हृदय में जड़ लो, ताकि तुम हमेशा शांतिमय जीवन जी सको; एक ऐसा जीवन जी सको, जिसके अंत में मृत्यु नहीं, आनंत जीवन है। एक धनी व्यक्ति का जीवन चरित्र धर्मग्रंथ में दर्ज है, जो ईश्वर के वचन के महत्व को उजागर करता है :
एक अमीर था, जो बैगनी वस्त्र और मखमल पहनकर प्रतिदिन दावत उड़ाया करता था। उसके फाटक पर लाजरूस नामक कंगाल पड़ा रहता था, जिसका शरीर फोड़ों से भरा हुआ था। वह अमीर की मेज की जूठन से अपनी भूख मिटाने के लिए तरसता था और कुत्ते आ कर उसके फोड़े चाटा करते थे। वह कंगाल एक दिन मर गया और स्वर्गदूतों ने उसे ले जा कर इब्राहिम की गोद में रख दिया। अमीर भी मरा और दफनाया गया। उसने अधोलोक में यंत्रणाएं सहते हुए अपनी आंखें ऊपर उठाकर दूर ही से इब्राहिम को देखा और उसकी गोद में लाजरुस को भी। उसने पुकार कर कहा, "पिता इब्राहिम! मुझ पर दया कीजिए और लाजरूस को भेजिए, जिससे वह अपनी उंगली का सिरा पानी में भिगो कर मेरी जीभ ठंडी करें, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूं।" इब्राहिम ने उससे कहा, "बेटा, याद करो कि तुम्हें जीवन में सुख-ही-सुख मिला था और लाजरुस दुख-ही-दुख। अब उसे यहां सांत्वना मिल रही है और तुम्हें यंत्रणा। इसके अतिरिक्त हमारे और तुम्हारे बीच भारी गर्त अवस्थित है; इसलिए यदि कोई तुम्हारे पास जाना भी चाहे, तो वह नहीं जा सकता और कोई भी वहां से इस पार नहीं आ सकता।' उसने उत्तर दिया, "पिता! आप से एक निवेदन है। आप लाजरुस को मेरे पिता के घर भेजिए, क्योंकि मेरे पांच भाई हैं। लाजरूस उन्हें चेतावनी दे। कहीं ऐसा न हो कि वे भी यंत्रणा के इस स्थान में आ जाएं।" इब्राहिम ने उस से कहा, "मूसा और नबियों की पुस्तकें उनके पास हैं, वे उनकी सुने।" आमिर ने कहा, "पिता इब्राहिम! वे कहां सुनते हैं! परंतु यदि मुर्दों में से कोई उनके पास जाए, तो वे पश्चाताप करेंगे।" पर इब्राहिम ने उस से कहा, "जब वे मूसा और नबियों की नहीं सुनते, तब यदि मुर्दों में से कोई जी उठे, तो वे उसकी बात भी नहीं मानेंगे।" लूकस 16 : 19-34
ईसा मसीह, मूसा नबी, योहन बपतिस्ता व अन्य नबियों कि शिक्षा जो धर्म ग्रंथ में दर्ज है, वह ईश्वर का वचन है। ईश्वर ही वचन है और ईसा मसीह शरीरधारी वचन। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
आदि में शब्द था,
शब्द ईश्वर के साथ था
और शब्द ईश्वर था।
उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ
और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ।
शब्द ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया।
हमने उसकी महिमा देखी।
वह पिता के एकलौते की महिमा-जैसी है-
अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण। योहन 1 : 1-3 और 14
इसलिए जिसके पास वचन है या/और जिसके पास धर्मग्रंथ है या/और जिसने वचन सुना है, यदि वह उसका पालन नहीं करता है, तो वह ईश्वर की आज्ञा (नियम-कानून) का पालन नहीं करता है; क्योंकि वचन तो जीवन जीने का तौर-तरीका है; ईसा मसीह का आसानी से अनुसरण करने का सहज उपाय है, जो इस संसार में शांतिमय जीवन की गारंटी देता है और इस संसार के अंत में ईश्वर तथा ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में चार हो जाने का, अर्थात स्वर्ग का टिकट देता है।
वचन से दूर भटक जाना, ईश्वर से दूर भटक जाना है; सत्य से दूर भटक जाना है; ईसा मसीह से दूर भटक जाना है; प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय से दूर भटक जाना है; शांतिमय जीवन से अशांति में भटक जाना है। मानव सृष्टि और मानव जीवन तो ईश्वर के द्वारा है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
प्रभु ने धरती की मिट्टी से मनुष्य को गढ़ा और उसके नथनों में प्राणवायु फूंक दी। इस प्रकार मनुष्य एक सजीव तत्व बन गया। उत्पत्ति ग्रंथ 2 : 7
जिस ईश्वर ने मनुष्य को रचा है उसी ईश्वर का वचन, मानव जीवन को संवारने का उपाय है। जब हम मनुष्य ईश्वर की सांसो से सांस लेते हैं, तो कोई उनके वचन से अलग अपना जीवन कैसे संवार सकता है? जैसा कि धर्मग्रंथ में इस संदर्भ में लिखा हुआ है :
क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा। मती 16 : 25
इस संसार में इंसान दो परस्पर विरोधी जीवन जीने के तरीकों में से किसी एक तरीके से ही जीवन जीता है –
अपना तरीका - यह तरीका मनुष्य के सांसारिक वासनाओं की पूर्ति का तरीका है, जिसमें आत्मा का कोई महत्व नहीं है; सिर्फ और सिर्फ शरीर का महत्व है। अपना तरीका अपनाने वालों के विषय में धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है? मती 16 : 26
अपना तरीका का इस्तेमाल कर जीवन जीने हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि कोई इस संसार में खाली हाथ नहीं उत्पन्न होता है, बल्कि हम सब-के-सब ईश्वर के सदृश्य अपनी आत्मा की सुंदरता के साथ उत्पन्न होते हैं; और हमें उसी आत्मा की सुंदरता के साथ ईश्वर के पास लौटना है।
ईश्वर का तरीका - ईश्वर का तरीका पर स्वयं ईसा मसीह चलकर इस संसार में उत्तम एवं प्रेममय जीवन जीए और इस संसार के अंत में स्वर्ग की सुख को प्राप्त कर लिए। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ़ बना रहता हूं। योहन 15 : 10
ईसा मसीह का जीवन इस संसार में शांतिमय था; और इस संसार के बाद अनंत शांतिमय। क्या ईसा मसीह के शरीर के लिए भोजन, कपड़ा और मकान उत्तम नहीं था? था, बिल्कुल था। वे स्वयं उत्तम भोजन खाते और लोगों को भी मछली रोटी-जैसा उत्तम भोजन बार-बार खिलाया करते थे। वे ऐसा कपड़ा पहना करते थे, जो पूरी तरह से ऊपर से नीचे तक एक बुना होता था; जिसमें कहीं किसी प्रकार का सीवन नहीं होता था। वे ऐसे घर में रहते थे, जिसका निर्माण उसके पालक पिता, जोसेफ ने किया था; जो एक कार्यकुशल निपुण बढ़ई थे और ईसा मसीह उनकी मदद किया करते थे। जीवन जीने का ईश्वर का तरीका, मनुष्य को इस संसार में उत्तम और इस संसार के अंत में सर्वोत्तम शांति देता है। ईश्वर के अनुसार जीवन जीने के तरीके में मनुष्य को शरीर की चिंता के बजाय आत्मा की चिंता करनी होती है; और उसके शरीर की चिंता, स्वयं सृष्टिकर्ता ईश्वर करते हैं। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
खेतों की घास आज भर है और कल चूल्हे में झोंक दी जाएगी। उसे भी यदि ईश्वर इस प्रकार से सजाता है, तो अल्पविश्वासियों! वह तुम्हें क्यों नहीं पहनाएगा? इसलिए खाने-पीने की खोज में लगे रहकर चिंता मत करो। इन सब चीजों की खोज में संसार के लोग लगे रहते हैं। तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें इनकी जरूरत है। इसलिए उसके राज्य की खोज में लगे रहो। ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जाएंगी। लूकस 12 : 28-31
आत्मा की चिंता करने वाले, अपनी आत्मा में ईश्वर के वचन को जड़ते हैं, ताकि उचित समय में उसका पालन कर शांतिमय जीवन जीया जा सके। इसलिए प्रभु का वचन सिखलाता है कि मनुष्य को सब कुछ (असत्य) छोड़ कर सत्य में ईसा मसीह की तरह पूर्णतः समर्पित हो जाना चाहिए, जबकि असत्य की सफाई और धुलाई के लिए प्रभु का दूसरा वचन सिखलाता है कि सत्य में समर्पित होने में बाधक, असत्य (शैतान) को सिर्फ और सिर्फ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा ही निकाल कर सत्य के लिए जगह बनाया जा सकता है।
शिष्य प्रभु के वचन को अपने हृदय में जड़ नहीं पाए थे, इस कारण से वे पुनर्जीवित प्रभु की उपस्थित पर विस्मित थे। वे यह भूल गए थे कि प्रभु ने उन्हें वचन देकर समझाए था कि जो उनके वचन का पालन करता है, वही प्रभु का रिश्तेदार होता है। चूंकि शिष्यों ने प्रभु के वचनों को न ही अपने हृदय में जड़ा और न ही उसका पालन किया इसलिए जिसे वे प्रभु और गुरु कहते थे उनकी उपस्थिति में वे गुरु और शिष्य के रिश्ते को बिल्कुल भूल गए। प्रभु के वचन का पालन ही तो प्रभु के साथ रिश्ते का आधार है; जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
ईसा की माता और भाई उनसे मिलने आए, किंतु भीड़ के कारण उनके पास नहीं पहुंच सके। लोगों ने उनसे कहा, "आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आपसे मिलना चाहते हैं।" उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी माता और मेरे भाई वही हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं।" संत लूकस 8 : 19-21
ईसा मसीह की माता मरियम तो स्वर्गदूत के द्वारा ईश्वर का वचन सुनकर, विषम परिस्थिति में उसका पालन कर कुंवारी ही उनकी माता बनने का निर्णय लेकर ईसा मसीह की मां (रिश्तेदार) बन गईं; ईसा मसीह के डीएनए का हिस्सा बन गई। ईसा मसीह की कुंवारी माता मरियम की तरह जो भी मनुष्य ईश्वर का वचन सुनकर उसका पालन करता है, वह ईसा मसीह का निज एवं अजीज रिश्तेदार बन जाता है। ईश्वर के वचन का महत्व, वचन के पालन में है, अन्यथा वचन धर्मग्रंथ के रूप में मनुष्य के घर में रहने पर या मनुष्य के कान तक सीमित रहने पर, उसका मनुष्य को कोई लाभ नहीं होगा।
मनुष्य और बकरी का दृष्टांत दृष्टांत
किसी निकम्मे मनुष्य के पास एक बकरी था। वह अपना खेत होने पर भी मेहनत नहीं करता था। इसलिए उसके खेत में धास-पतवार भरी पड़ी थी। वह अपना पेट भरने के लिए दूसरों के खेत से चोरी किया करता था। प्रभु के किसी श्रद्धालु भक्त ने उसको चोरी करते हुए बार-बार देखा था; लेकिन उसके मना करने पर भी वह निकम्मा व्यक्ति नहीं मानता था। एक दिन बकरी घास चरते-चरते किसी दूसरे के खेत में घुस कर मटर का लुफ्त उठाने लगी। मटर के खेत का मालिक बकरी को खदेड़ता हुआ उसके निकम्मे मालिक के पास आया और बोला, "अपनी बकरी को बांध कर रखो।" निकम्मा एक रस्सी लाया और बकरी के गले में बांध दिया। बकरी दुबारा गले में रस्सी बंधा हुआ मटर के खेत में जा घुसी। मटर के खेत का मालिक बकरी को खदेड़ते हुए फिर उस निकम्मे के पास पहुंचा और बोला, "सिर्फ गले में रस्सी बांधने से नहीं चलेगा, उसे खूंट कर रखो।" निकम्मे ने रस्सी के दूसरे छोर पर लकड़ी बांधकर उसे जमीन में गाड़ दिया। उसी वक्त प्रभु का श्रद्धालु भक्त उधर से गुजर रहा था। निकम्मे को बकरी को खूंटते देख, उससे बोला, 'अपने आपको भी इसी तरह से खूंट लो, नहीं तो मैं तुम्हारे बारे में तुम्हारे पोडोसियों को बता दूंगा; वे तुम्हें ठीक से खूंट देंगे।"
दृष्टांत का अर्थ
बकरी - हम मनुष्य हैं, जिन्हें बकरी के समान ईश्वर ने नादान सृष्ट किये हैं। बकरी को क्या मालूम कि दूसरों के खेत में नहीं चरना चाहिए, लेकिन मनुष्य को तो प्रभु का वचन मालूम है- चोरी मत कर। परिश्रम कर। लालच मत कर। ....
रस्सी -ईश्वर का वचन है, जिसके द्वारा नादानी को कायम रखने के लिए मनुष्य अपने आप को बांध कर खूंट लेना चाहिए। बकरी रस्सी से बंधने के बावजूद गले में बंधे रस्सी समेत सीमा लांघ गई। यह एक ऐसे व्यक्ति का हाल है- जो वचन तो सुनता है, लेकिन उसका पालन नहीं करता है। जिसके लिए प्रभु का धर्मग्रंथ में वचन लिखा है :
जिसके कान हों, वह सुन ले। संत मत्ती 11 : 15
खूंटा -निश्चय ही रस्सी से खूंटी बकरी सीमा लांघ नहीं सकती और उसके चरने का दायरा सीमित हो जाता है। यह ऐसा व्यक्ति है, जो वचन को सुनकर उसका पालन करने और वचन के दायरे में सीमित हो जाने के लिए अपने आप को उपवास और प्रार्थना की खूंटी से खूंट लेता है और निरंतरता के साथ वचन के दायरे में सीमित रहना धीरे-धीरे सीख जाता है। ऐसा व्यक्ति ही वचन का मर्म जानता है।
प्रभु का श्रद्धालु भक्त - मूसा नबी, योहन बपतिस्ता एवं अन्य नबियों की तरह ईश्वर पर श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति जिसने अपने आपको ईश्वर के वचन के दायरे में उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की निरंतरता के द्वारा सीमित कर लिया है। वह ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया कर मजबूत सदस्य होता है। ईश्वर, अप्रत्यक्ष रूप से उन में उपस्थित होकर दूसरों के ह्रदय में वचन जड़ने और उसके पालन की शिक्षा देते हैं, ताकि वे भी वचन के दायरे में सीमित होकर, ईश्वरीय जीवन जी कर ईश्वर के एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया का सदस्य बन जाएं। प्रभु के ऐसे ही श्रद्धालु भक्तों के विषय में धर्मग्रंथ में लिखा है :
प्रभु! मेरे हृदय में अहंकार नहीं है।
मैं महत्वाकांक्षी नहीं हूं।
मैं बड़ी-बड़ी योजनाओं के फेर में नहीं पड़ा
और मैंने ऐसे कार्यों की कल्पना नहीं की,
जो मेरी शक्ति से परे है।
मां की गोद में सोए हुए दूध-छुड़ाए बच्चे के सदृश
मेरी आत्मा शांत और मौन है।
ठीक उसी बच्चे की तरह मेरी आत्मा मुझ में है।
इस्राएल! प्रभु पर भरोसा रखो,
अभी और अनंत काल तक! स्तोत्र ग्रंथ 131 : 1-3
आइए, ईश्वर के श्रद्धालु भक्तों की तरह हम भी ईसा मसीह का अनुसरण करते हुए अपनी आत्मा को वचन से पोषित कर छोटे बालकों की तरह नादान बना दें और धर्मग्रंथ का निम्न कथन अपने जीवन में पूरा कर लें :
उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, "स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?" ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूं- यदि तुम फिर छोटे बालकों- जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। इसलिए जो अपने को इस बालक जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है। संत मत्ती 18 : 1-5
क्या हम ईश्वर के वचन और उसका मर्म समझते हैं? क्या हम ईश्वर के वचन के अनुसार अपने आपको दूसरों से छोटा समझते हैं? क्या हम अपने आप को ईश्वर के वचन का ठेकेदार समझ कर दूसरों को छोटा समझते और उन पर रौब जमाते हैं? ........ आईए, ईश्वर का वचन जीवित वचन है; वह जीवन देता है और जीवन उसी से फलता-फूलता है। हम बड़े हो या छोटे सब-के-सब ईश्वर के वचन को ह्रदय गमन कर अपना जीवन उसी के इर्द-गिर्द खूंट लें; और वचन से फिर कभी न भटक जाएं। धर्मग्रंथ में चार तरह के मनुष्य आत्माओं का जिक्र है :
1. मनुष्य आत्मा, जो रास्ते के किनारे वाले जमीन के समान है - जिस पर बीज तो गिरता है लेकिन राहगीर उस पर चल कर उन बीजों को रौंद देते या आकाश के पंछी उसे चुग लेते हैं। बीज, ईश्वर का वचन और राहगीर, शैतान है, जो ईश्वर का वचन को पनपने से पहले ही आत्मा में कुचल देता है।
2. मनुष्य आत्मा, जो पथरीली भूमि के समान है -जिस पर बीज गिरते हैं और पौधा उगा जाते हैं, लेकिन नमी के अभाव में झुलस जाते हैं। ये वे लोग हैं जो वचन सुनकर प्रसन्न होते हैं, लेकिन वचन के अनुसार जीना नहीं चाहते है। असत्य उन पर असानी से हावी रहती है; वे असत्य से पिंड छुड़ाना नहीं चाहते हैं; वैसे लोग जानते-जानते ईश्वर के वचन की अवहेलना करते हैं।
3. मनुष्य आत्मा, जो कटीले झाड़ियों के समान है -जहां झाड़ियों के बीच गिरी बीज के पौधे साथ-साथ बढ़ने वाली झाड़ियों से बुरी तरह दबा दिए जाते हैं। ये वे लोग हैं, जो वचन तो सुनते हैं, लेकिन उनकी आत्मा में ईर्ष्या द्वेष क्रोध वासना व्यभिचार अत्याचार भ्रष्टाचार घमंड पाखंड दिखावा......... इत्यादि का बोलबाला है; जहां वचन को बिल्कुल बौना साबित कर दिया जाता है।
4. मनुष्य आत्मा, जो अच्छी भूमि के समान है - जिस पर बीज गिरते ही हरियाली और फल लग जाती है। ये वैसे लोग हैं, जिस पर प्रभु का वचन फलता-फूलता है। ऐसे लोग सच्चे और निष्कपट भाव से वचन को अपने हृदय में अंकित कर सुरक्षित रखने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं; और अपने धैर्य से ईश्वर का कार्य संपन्न कर बहुत फल उत्पन्न करते हैं।
मैं जो यह सब लिख रहा हूं, सिर्फ ईश्वर की महिमा हेतू साक्षी देता हूं कि वर्ष 2007 से ही मैं वचन के दायरे में सीमित रहने के लिए निरंतर प्रयासरत हूं, लेकिन अब तक वचन के दायरे में सौ प्रतिशत समाहित नहीं हो पाया हूं; कभी-कभार वचन के दायरे से बाहर खिसक ही जाता हूं, जो मेरे लिए बहुत अफसोस और क्षोभ कारण होता है। मैं यह साक्षी इसलिए दे रहा हूं कि मैंने अनुभव किया है कि उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की निरंतरता के द्वारा मैं अपनी सांसारिक वासनाओं/कमजोरियों पर जरूरी संयम प्राप्त करने में बहुत हद तक सफल रहा हूं। अब मैं कुछ भी करने से पहले यह चिंतन जरूर करता हूं कि ऐसा करने से ईश्वर प्रसन्न होंगे या नहीं। यदि लगता है कि प्रसन्न होंगे, तो मैं वह करता हूं और करने के बाद पुनः विचार करता हूं कि उस काम को करने के दौरान मैंने ईश्वर को अप्रसन्न तो नहीं कर दिया। यदि अंतरात्मा कहती है कि तूने ईश्वर को अपरसन्न कर दिया है, तो सच्चा पश्चाताप कर आगे बढ़ जाता हूं। मैं जानता हूं कि अपनी मृत्यु से पहले मैं अपने आपको वचन के दायरे में 100% सीमित कर मैं इस धर्मयुद्ध में असत्य को पूरी तरह से पछाड़ने में, और सत्य में पूर्णतः समर्पित होने में सफल हो जाऊंगा। ईसा मसीह और भला डाकू प्राण त्याग कर सीधा स्वर्ग चले गए; मैं भी उनका अनुसरण करते हुए सीधा स्वर्ग जाना चाहता हूं और सब लोगों के लिए यही कामना करता हूं। उपवास और प्रार्थना प्रभु की नजर में इतना अहम् है कि ईसा मसीह ने स्वयं उपवास और प्रार्थना कर यह दर्शाए हैं; इसलिए यह साक्षी जो मैं दे रहा हूं, किसी फालतू वजह के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ ईश्वर की महिमा के लिए बहुत महत्वपूर्ण समझता हूं और चाहता हूं कि सब लोग उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा अपने जीवन में परिवर्तन लाएं और ईश्वर के द्वारा महिमान्वित किए जाने की तैयारी करें। बहुत सारे लोग 2007 से मेरे साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा जीवन में अद्भुत परिवर्तन के साक्षी हैं और अंतिम दिनों ईश्वर के द्वारा महिमान्वित किए जाने की तैयारी में जुटे हैं। आईए, हम सब अनंत जीवन की तैयारी करें,; जैसा कि धर्मग्रंथ् में लिखा है :
प्रभु यह कहता है :
"आकाश मेरा सिहासन है
और पृथ्वी मेरा पावदान।
तुम मेरे लिए कौन-सा घर बनाओगे?
मेरे विश्राम का घर कहां होगा?
मैंने अपने हाथों से सब कुछ बनाया है।
सब कुछ मेरा ही है।"
-यह प्रभु की वाणी है-
"मैं उन लोगों पर कृपा दृष्टि करता हूं,
जो विनम्र और पश्चातापी हैं,
जो श्रद्धा से मेरी वाणी सुनते हैं।
कुछ लोग बछड़ा चढ़ाते,
किंतु मनुष्य का वध भी करते हैं।
वे भेड़ की बलि चढ़ाते,
किंतु कुत्ते की भी गर्दन तोड़ते हैं।
वे अन्न-बली अर्पित करते,
किंतु सूअर का रक्त भी चढ़ाते हैं।
वे लोबान की धूप जलाते,
किंतु देवमूर्तियों की भी पूजा करते हैं।
उन्होंने अपना मनमाना मार्ग चुना
और उन्हें अपने घृणित कार्यों में आनंद आता है।
इसलिए मुझे उन्हें दंड देने
और भयभीत करने में आनंद आएगा;
क्योंकि जब मैंने उन्हें बुलाया,
तो किसी ने उत्तर नहीं दिया।
मैंने उन्हें संबोधित किया
और उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी।
उन्होंने वही किया, जो मेरी दृष्टि में बुरा है।
उन्होंने वही चुना, जो मुझे अप्रिय है।" नबी इसायाह 66 : 1-4
ईश्वर के उपरोक्त वचन पर मनन-चिंतन कीजिए और यह समझ लीजिए कि प्रभु की वाणी सुनकर उसे हृदय पर अंकित करने के लिए निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) कितना जरूरी है, ताकि मनुष्य की आत्मा सिर्फ ईश्वर की वाणी का डेरा और ईश्वर का मंदिर बन जाए; और मनुष्य जीते जी ईश्वर और ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में चार हो जाए।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!