RIGHTEOUSNESS

पवित्र आत्मा को अपनी आत्मा में संजोए रखना ही धार्मिकता

प्रकाशित 21/05/2020


बीते दिनों 16 - 18 मई 2020 के बीच बपतिस्मा थीम के तहत मैंने स्पस्ट उल्लेख किया है कि सत्य से परिपूर्ण अति पवित्र ईसा मसीह, जो ईश्वर में है और जिनमें ईश्वर निवास करते हैं, को बपतिस्मा लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने बपतिस्मा लेकर दर्शाया है कि कोई भी मनुष्य कैसे आग एवं पवित्र आत्मा-का-बपतिस्मा के द्वारा अपनी आत्मा को पवित्र आत्मा के समान शुद्ध एवं पवित्र कर अपनी धार्मिकता की शुरुआत करता है। यह भी कि जल-का-बपतिस्मा ईसा मसीह के साथ ईश्वर में पवित्र आत्मा के साथ चार हो जाने का सुनहरा अवसर है। यह इसलिए कि स्वयं ईश्वर चाहते हैं कि हम सब-के-सब ईश्वर में एक हो जाएं जैसा कि ईसा मसीह पिता ईश्वर के साथ पवित्र आत्मा में एक हैं। ईश्वर, ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में सिर्फ तीन नहीं रहना चाहते हैं, बल्कि हम प्रत्येक जन के साथ चार हो जाना चाहते हैं। यही ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का विस्तार है; और जो भी व्यक्ति इस का सदस्य होता है, वह ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में निवास करता है और पवित्र आत्मा उसमें निवास करता है। इस तरह मनुष्य पूर्णता सत्य को समर्पित हो जाता है और सत्य उसमें निहित हो कर अपना पवित्र कार्य संपन्न करने लगता है। धार्मिकता की इस अवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मनुष्य निरंतर उपवास और प्रार्थना के द्वारा सत्य में सदा समर्पित रहे जिसका उल्लेख मैं बार-बार अपने लेखों में करता रहा हूं। इस प्रकार मनुष्य अपनी आत्मा में पवित्र आत्मा को संजोकर ठीक वैसे ही ईश्वर की गुणगान में, महिमा गान में लीन हो जाता है जैसे कि ईसा मसीह की कुंवारी मां मरियम ने स्वर्गदूत के मुंह से ईश्वर का वचन सुनकर अपने आपको ईश्वर में यह कहते हुए कि मैं प्रभु की दासी हूं प्रभु का कथन मुझ में पूरा हो, समर्पित कर ईश्वर में चार हो गई और अपनी आत्मा से ईश्वर की महिमा में लीन हो गई; जो इस बात का भी प्रमाण है की ईश्वर की महिमा शरीर का नहीं बल्कि आत्मा का काम है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


तब मरियम बोल उठी,
"मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,
मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनंद मनाता है;
क्योंकि उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है।
अब सब पीढ़ियां मुझे धन्य कहेंगी;
क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मेरे लिए महान कार्य किए हैं।
पवित्र है उसका नाम!
उसकी कृपा उसके श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
उसने अपना बाहुबल प्रदर्शित किया है,
उसने घमंडियों को तितर-बितर कर दिया है।
उसने शक्तिशालियों को उनके आसनों से गिरा दिया
और दीनों को महान बना दिया है।
उसने दरिद्रों को संपन्न किया
और धनिया को खाली हाथ लौटा दिया है।
इब्राहिम और उनके वंश के प्रति
अपनी चिरस्थाई दया को स्मरण कर,
उसने हमारे पूर्वजों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार
अपनी दास इसराइल की सुधि ली है।" संत लूकस 1 : 46-55


मरियम का स्तुति गान यह स्पष्ट करता है कि वह ईश्वर में चार है और पवित्र आत्मा उसमें निवास करता है इसलिए उसकी आत्मा पवित्र आत्मा के साथ मिलकर ईश्वर की महिमा करती है। यह इस बात का भी द्योतक है कि मरियम के समान कोई भी व्यक्ति सत्य में समर्पित होकर पवित्र आत्मा को प्राप्त कर सकता है। यही धर्म ग्रंथ की, नबियों की और ईसा मसीह की शिक्षा भी रही है जिसके अनुसार तमाम लोग ईश्वर की धार्मिकता को प्राप्त कर ईश्वर के अभिषेक के कारण अपनी आत्मा में पवित्र आत्मा को, सत्य की आत्मा को जगह देते हैं और नबी कहलाते हैं। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन काल में ही नबी बन जाए और ईश्वर में पवित्र आत्मा के साथ चार हो होकर ईश्वर की महिमा में मरियम के समान लीन हो जाए। ऐसे ही अपने श्रद्धालु भक्तों से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और अपना कार्य संपन्न करते हैं। ऐसे श्रद्धालु भक्त जानते हैं की पवित्र आत्मा कोई कबूतर नहीं है जिसे खेद कर अपनी आत्मा रूपी घोसले में जबरदस्ती प्रवेश कराया जाए। वे यह भी जानते हैं कि पवित्र आत्मा किसी को उधार और खैरात में नहीं दी जा सकती है।


आज बहुत सारे लोग पवित्र आत्मा की खोज में जुटे हुए हैं, लेकिन वे पवित्र आत्मा की प्राप्ति और धार्मिकता की प्रक्रिया जिसका मैं वर्णन करता रहा हूं, से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। वे प्रार्थना सभाओं में ईश्वर से पवित्र आत्मा भेजने की याचना करते हैं; लेकिन पवित्र होने के लिए निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) नहीं करते हैं, जो कि पवित्र आत्मा पाने की ओर पहला कदम है। कुछ तो पवित्र आत्मा के वरदान और फल से लग जाने की दुहाई देते हैं। और कुछ तो दावा भी करते हैं कि उन्हें पवित्र आत्मा एवं उसके वरदान एवम फल मिल गए हैं। कुछ तो यह भी कहते हैं कि जितना पैसा दान करोगे उतना ही पवित्र आत्मा मिलेगा। क्या पवित्र आत्मा को पैसे से खरीदा जा सकता है? नहीं! वे पवित्र आत्मा के नाम पर चंदा वसूलते हैं और लूट मचाते हैं। क्या पवित्र आत्मा का अपने सांसारिक लाभ के लिए दुरुपयोग किया जाना चाहिए? कुछ को तो प्रार्थना सभा में किसी एक स्थान को घेर कर यह कहते हुए सुना गया कि वहां पर पवित्र आत्मा है! क्या कोई पवित्र आत्मा को, जो सर्वत्र व्यापी हैं, एक जगह छेका जा सकता है? क्या पवित्र आत्मा संसार के किसी कोने में लोकेट कर दिए जाने के लिए हैं या हृदय में जगह दिए जाने के लिए हैं? तो कुछ तो पवित्र आत्मा की शक्ति का प्रदर्शन भी करते हैं - जैसा की प्रार्थना सभा के मंच पर गवाही देने आए लोगों के ऊपर अपना हाथ पसार कर उन्हें बेहोशी में गिराते हैं। क्या ऐसा वे पवित्र आत्मा की शक्ति से करते हैं? नहीं! बिल्कुल ही नहीं। पवित्र आत्मा किसी को नहीं गिराता है, बल्कि गिरे हुए को उठाता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मती 11 : 28


स्मरण रहे कि पवित्र आत्मा उन्हीं को प्राप्त होती है जो मरियम के समान हृदय से निर्मल एवं दीन हीन है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। संत मत्ती 11 : 28


स्मरण रहे कि पवित्र आत्मा उन्हीं को प्राप्त होती है जो मरियम के समान हृदय से निर्मल एवं दीन हीन है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


धन्य है वे, जिनका हृदय निर्मल है! वह ईश्वर के दर्शन करेंगे। संत मत्ती 5 : 8


इसलिए यदि आप पवित्र आत्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, तो सिर्फ और सिर्फ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) के द्वारा अपने आप को दीन हीन और अपने हृदय को निर्मल बनाइए। और सावधान रहिए उन लोगों से जो पवित्र आत्मा की शक्ति की दुहाई दे-दे देकर भले चंगे लोगों को बेहोशी में पीछे गिरा कर उपस्थित लोगों के बीच पवित्र आत्मा की उपस्थिति के झूठे दिखावे का प्रदर्शन करते हैं; और वैसे लोगों से बचिए जो पवित्र आत्मा के नाम पर चंदा वसूली करते और लूट खसोट करते हैं। उनके पास अपने मेहनत की कमाई लुटाने से अच्छा है कि आप स्वयं भिक्षा दान कर गरीबों का उत्थान करें; देखिए देश में कितनी गरीबी है यदि आप झूठे नबियों के समक्ष पैसा लुटाने के बजाय किसी गरीब पीड़ित लाचार विधवा का उत्थान कर देते, तो ईश्वर आप से ज्यादा प्रसन्न होते। हमें यह समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा दिखावा नहीं करता है, तो ऐसा दिखावा करने वाले पवित्र आत्मा की शक्ति से तो बिल्कुल ही नहीं, बल्कि वे दुष्ट आत्मा की शक्ति लोगों के सामने प्रदर्शित करते हैं, जिसका असर लोगों को उनके जीवन में बीमारी, पागलपन, पारिवारिक अशांति इत्यादि के रूप में झेलना पड़ता है - दुष्टात्मा का काम ही क्या है- अशांति फैलाना, तकलीफ देना, पीड़ित करना......। इसलिए प्रभु की चेतावनी धर्म ग्रंथ में स्पष्ट है :


झूठे नबियों से सावधान रहो। वे भेड़ो के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, किंतु वे भीतर से खूंखार भेड़िए हैं। संत मत्ती 7 : 15


ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, सावधान रहो। तुम्हें कोई नहीं बहकाए, क्योंकि बहुत से लोग मेरा नाम लेकर आएंगे और कहेंगे- मैं मसीह हूं, और वे बहुतों को बहका देंगे। संत मत्ती 24 : 4-5


धार्मिकता किसी की बपौती, जागीरदारी या ठेकेदारी नहीं है। धार्मिकता न ही उधार में दी जा सकती है और न ही खैरात में बांटी जा सकती है। पवित्र आत्मा को "प्रभु आपके साथ हो" कहकर दूसरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता है। पवित्र आत्मा कोई शटल या कार्क नहीं है जिसे इधर से उधर रैकेट से बैडमिंटन की तरह किया जा सकता है। धार्मिकता को प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है और व्यक्तिगत मामला है; और धार्मिकता प्राप्त किसी ईश्वर के अभिषिक्त का कर्तव्य है कि वह योहन व अन्य नबियों की तरह उपवास प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा स्वयं नबी बने रहकर दूसरों तक धार्मिकता की शिक्षा को पहुंचाए ताकि धार्मिकता की शिक्षा को सुनने वाले अपने जीवन में निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) को लागू कर एवं जल का बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वरीय शांति को प्राप्त कर लें। इसलिए धर्म ग्रंथ में लिखा है :


"जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले"। संत लूकस 8 : 8


क्या आंधी ईश्वर का वचन सुनकर नहीं थम जाता है? क्या आंधी के कान होते हैं? फिर भी वह ईश्वर के आदेश को सुनकर थम जाता है! जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


नाव चल रही थी और ईसा सो गए। तब झील में झंझावात उठा, नाव पानी से भरी जा रही थी और वे संकट में पड़ गए। शिष्यों ने ईसा के पास जाकर उन्हें जगाया और कहा, "गुरुवर! गुरुवर! हम डूब रहे हैं! वे जाग गए और उन्होंने वायु और लहरों को डांटा। वे थम गई और शांति छा गई। संत लूकस 8 : 23-24


आंधी तो आंधी है; न आंखें हैं, न मुंह है और न ही कान है; फिर भी ईसा मसीह का आदेश सुनकर थम गया। क्या हम आंधी से भी गए गुजरे हैं, जो कान रहते नहीं सुनते हैं या सुनकर पालन नहीं करते हैं। आइए, हम सब अपने अपने कानों का सदुपयोग करें; कान रहते हुए भी बहरे न बने; और ईश्वर के जीवित वचन को, सत्य वचन को सुनकर पालन करते हूए सत्य में समर्पित होकर धार्मिकता को प्राप्त करें। अनावश्यक झूठे नबियों के चक्कर में फंसने से अपने आप को बचाएं। धार्मिकता को प्राप्त करना प्रत्येक जन का कर्तव्य है; धार्मिक एक व्यक्तिगत पवित्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति ईसा मसीह की माता कुंवारी मरियम की तरह ईश्वर में चार हो सकता है। धार्मिकता सिर्फ और सिर्फ निरंतरता के साथ उपवास और सच्चा पश्चाताप (प्रार्थना) और बपतिस्मा के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।


जरा सोचिए कि किसी के प्रार्थना करने से कोई चंगा हो सकता है, तो खुद के प्रार्थना करने से वह चंगा क्यों नहीं हो सकता है? यदि कोई इतना ही प्रभावशाली प्रार्थना करना जानता है, तो वह दूसरों को ऐसा प्रार्थना क्यों नहीं सिखलाता है? प्रार्थना बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति ईश्वर में चार हो जाता है और तब वह जो भी ईश्वर से मांगता है वह उसे प्राप्त होता है; इसका अर्थ भी बहुत गंभीर है जिसकी चर्चा जरूर आगे के लेखों में कभी करूंगा। प्रार्थना जरूर थोड़ा मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं है; आप नबी बनने की ओर अपना कदम बढ़ाए और ईश्वर का अभिषेक प्राप्त कीजिए; कोई व्यक्ति किसी का अभिषेक नहीं कर सकता है; हां! अभिषेक पाने की शिक्षा जरूर दे सकता है। झूठे नबियों से सावधान!


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!