RIGHTEOUSNESS

कौन नबी? कौन अजनबी? कौन झूठे नबी?

प्रकाशित 14/05/2020


कलीसिया का अर्थ धार्मिक संगठन होता है। जो व्यक्ति ईश्वर की अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन से जुड़ना चाहता है, उसे लोगों की नजर में नहीं, बल्कि ईश्वर की नजर में धार्मिक होना बहुत जरूरी है। उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) ही एकमात्र उपाय है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति ईश्वर को पसंद आने वाली धार्मिकता पाने का प्रयास कर सकता है। शैतान ठीक से जानता है कि मनुष्य का शरीर उसकी आत्मा का बोझ बढ़ाता है। जब शरीर ईर्ष्या-द्वेष से ग्रसित होता है, तो क्या आत्मा में पाप के कलंको की संख्या नहीं बढ़ती है? जब शरीर क्रोध से ग्रसित होता है, तो क्या आत्मा में पाप के कलंको की संख्या नहीं बढ़ती है? जब आंख बुरा देखता हैं, तो क्या आत्मा में पाप के कलंको की संख्या नहीं बढ़ती है? जब मुंह कटुता उगलती है, तो क्या आत्मा में पाप के कलंको की संख्या नहीं बढ़ती है? शैतान प्रत्येक मानव की प्रत्येक कमजोरियों को ठीक से जानता हैं इसलिए वह मनुष्य के शरीर के द्वारा उसकी आत्मा को कलंकित करने के लिए उसके पीछे हाथ धो कर पड़ा रहता है। उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) ही वह एकमात्र व्यक्तिगत धार्मिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा शैतान के छल प्रपंच से बचकर ईश्वर को पसंद आने वाली धार्मिकता हासिल किया जा सकता है। यदि कोई उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के धार्मिक प्रक्रिया का पालन व्यक्तिगत तौर पर नहीं करता है, तो वह अपने पापों से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता; ऐसे मे वह जरूर शैतान के असत्य के संगठन का सहभागी होता है; जैसे कि शैतान की योजना है। उपवास और प्रार्थना के बिषय में लिखा है :


परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। मती 17 : 21


कौन नबी?


हाथ धोकर पीछे पड़े शैतान से यदि मुक्ति पाना है, तो निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना करना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। उपवास और प्रार्थना के द्वारा ही कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत पाप के कलंको से मुक्ति पा सकता हैं, जबकि पूर्वजों के पाप के कलंको से मुक्ति का उपाय बपतिस्मा है। सवाल यह है कि जब ईसा मसीह पाप रहित उत्पन्न हुए, तो फिर उन्हें बपतिस्मा लेने की जरूरत क्यों पड़ी? आगे के लेखों में मैं इस बात का खुलासा जरूर करूंगा। फिलहाल यह समझना जरूरी है कि जब कोई अपनी आत्मा में पाप के कलंको से बपतिस्मा / उपवास और प्रार्थना के द्वारा मुक्त हो कर, ईश्वर का अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य बन जाता है, तो वह ईश्वर के कार्य में लगा दिया जाता है। वैसा व्यक्ति ही नबी कहलाता है। नबियों के द्वारा ही ईश्वर अपनी महिमा के लिए अपने पवित्र कार्यों को अंजाम तक पहुंचाते हैं। नबी एक ऐसा व्यक्ति है जो ठीक से जानता है कि वह जो करता है, वह नहीं करता है, बल्कि वह करता है, जो उसे करवाता है; वह ईश्वर है, जो उसमें निवास करते हैं। ।इसलिए नबी अपने कार्यों के लिए किसी प्रकार का मान-सम्मान, प्रशंसा-बड़ाई, पुरस्कारों की उम्मीद किसी से नहीं करता है; वह चुपचाप ईश्वर के कार्य के प्रति कटिबद्ध और प्रतिबध होता है; वह बिल्कुल निडर होकर विषम परिस्थिति में भी ईश्वर के कार्यों को संपन्न करता जाता है। वह करने से पहले विश्लेषण करता है कि वह जो करने जा रहा है, ईश्वर को प्रिय लगेगा या नहीं; और कार्य संपन्न करने के बाद फिर विश्लेषण करता है कि कार्य संपन्न करने के दौरान उसने कहीं ईश्वर को अप्रसन्न तो नहीं कर दिया, ताकि वह ईश्वर से क्षमा मांग कर ईश्वर में पुनर्वास कर ईश्वर में संगठित हो जाए। इस तरह वह सदा ईश्वर में बना रहता है और ईश्वर उसमें। अव्वल तो वह किसी से नहीं डरता और यदि उसे किसी बात का डर है भी, तो सिर्फ इतना कि ईश्वर उससे नाराज न हो जाएं। वह हर हाल में ही ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता है। वह ईश्वर को बिल्कुल अप्रसन्न नहीं करना चाहता है; और अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर के लिए समर्पित कर देता है, सत्य के लिए समर्पित कर देता है। वह ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का एक मजबूत चट्टान के समान असत्य की ओर न झुकने वाला सदस्य होता है। वह सब कुछ (असत्य) पूरी तरह से छोड़ चुका होता है। वह चट्टान के समान धार्मिकता की मजबूती में बने रहने के लिए निरंतरता के साथ जीवन भर उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) में लीन रहता है। सत्य में समर्पित जीवन जीता है; ईश्वर में समर्पित जीवन जीता है और दूसरों को सत्य में समर्पित जीवन जीना सिखालाता है; ईश्वर में समर्पित जीवन जीना सिखालाता है। उसके कथनी और करनी में किसी प्रकार का फर्क नहीं होता है। इस प्रकार वह ईश्वर के एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन के विस्तारीकरण के लिए अनवरत प्रयत्नशील रहता है। वह संसार में जिस भी ईट पत्थर के संगठन का सदस्य होता है, वह संगठन निश्चय ही ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का प्रतिबिंब होता है। वह हृदय से सच बोलता है और चाहता है कि लोग असत्य छोड़कर, सत्य में समर्पित होकर उसके समान ईश्वर का अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन की सदस्यता ग्रहण कर नबी बन जाएं। वह नबी है; और दूसरों को भी नबी बनाना चाहता है; इसलिए वह लोगों के बीच ईश्वर का रास्ता तैयार करता है; सत्य का मार्ग तैयार करता है। वह ईश्वर का संसाधन बन, ईश्वर का कार्य संपन्न करता है इसलिए ईश्वर उसके जीवन निर्वाह (रोटी कपड़ा और मकान) की पूरी व्यवस्था में उसकी मदद करता है। वह अपने कष्ट की परवाह किए बिना ईश्वर और किसी भी व्यक्ति को कष्ट नहीं देना चाहता है। वह ईश्वर और दूसरों के बेहतर जीवन (सत्यमय) के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देता है। उसकी बोली में कड़वाहट होती है लेकिन वह अपनी आत्मा से बिल्कुल विनम्र होता है। वह असत्य में पड़े अपने राजा को भी हिदायत देने से नहीं डरता। यही कारण है कि असत्य में पड़े राजा को किसी नबी की बोली कड़वी और डांट फटकार लगती है, बर्दाश्त के बाहर लगती है।‌ कितने ही लोग नबियों की मौत का कारण हैं। नबियों के शरीर को कष्ट पहुंचाया जा सकता हैं लेकिन उनकी आत्मा की हानि शैतान भी नहीं कर सकता है।। नबियों के समान जीवन जीने वालों के लिए स्रोत ग्रंथ 128 में लिखा है:


भक्त को आशीर्वाद


धन्य हैं वे, जो प्रभु पर श्रद्धा रखते
और उसके मार्गों पर चलते हैं!
तुम अपने हाथ की कमाई से
सुखपूर्वक जीवन बिताते हो।
तुम्हारी पत्नी तुम्हारे घर के आंगन में
दाखलता की तरह फलती-फूलती है।
तुम्हारी संतान जैतून की टहनियों की तरह
तुम्हारे चौके की शोभा बढ़ाती है।
जो प्रभु पर श्रद्धा रखता है,
उसे यही आशीर्वाद प्राप्त होता है।
प्रभु सियोन पर्वत पर से
तुम्हें आशीर्वाद प्रदान करें,
जिससे तुम जीवन भर येरूशलेम का कुशल मंगल
और अपने पौत्रों को देख सको।
इसराइल को शांति। स्त्रोत ग्रंथ 128 : 1-6


कौन अजनबी?


वह व्यक्ति जो सत्य में जीवन तो गुजारना चाहता है लेकिन असत्य में यूं ही फिसल जाता है और असत्य में गतिशील बना रहता है। ऐसा व्यक्ति असत्य में अपना जड़ मजबूत करता जाता है। प्रार्थना नहीं करता है या करता भी है तो वह ईश्वर से अपनी संसारिक इच्छा / प्रलोभनों की पूर्ति की मांग करता है। मान सम्मान दिखावा घमंड पाखंड प्रलोभन........ उसके कामों में झलक ही जाती है। वह अपने को धार्मिक भी समझता है। वह नबियों की सलाह को सुनकर अनसुना कर देता है और अपना जीवन बदलना नहीं चाहता है। नबियों की बातें उसे डांट फटकार के समान वेदना देती है। यदि उसे ईश्वर और मनुष्य दोनों में से ‌ एक को खुश करने के लिए चुनना पड़े, तो वह ईश्वर के बजाय मनुष्यों को खुश करना ज्यादा पसंद करता है। वह ईश्वर पर विश्वास करने की बात कहता है लेकिन ईश्वर पर विश्वास करने के बजाय, मनुष्यों पर ज्यादा विश्वास करता है। वह मनुष्यों की सेवा इसलिए करता है कि उसे भी कभी ना कभी मनुष्यों की सेवा की जरूरत पड़ सकती है। वह उधार इसलिए देता है कि बुरे वक्त में लोग उसके काम आए। वह नबियों को अपने असत्य की राह में रोड़ा समझ कर, अनसुनी करता है। मौज-मस्ती धन-संपत्ति मान-सम्मान ओहदा उसके जीवन में अहम होती है क्योंकि वह जानते जानते भी भूल जाता है कि मनुष्य तो सिर्फ स्वास मात्र है। स्वार्गिक धन की अपेक्षा उसे सांसारिक धन से ज्यादा लगाव होता है। दिन भर में शायद ही उसके पास ईश्वर के लिए कुछ समय होता है। संसार के ईट पत्थर के संगठन के नियम कानून के अनुसार प्रार्थना और उपवास तो करता है, लेकिन अपने पापी प्रवृत्ति को नहीं छोड़ पाने के कारण वह ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य नहीं बन पाता है। इसलिए वह जिस भी ईंट पत्थर के संगठन से इस संसार में जुड़ा होता है, वह संगठन ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का प्रतिबिंब नहीं होता है। वह प्रभु! प्रभु! पुकारता है लेकिन असत्य को पूरी तरह से छोड़, सत्य में समर्पित नहीं होना चाहता है। वह दो नावों में सवार होने वाला व्यक्ति प्रतीत होता है। वह ईश्वर पर विश्वास करने का दावा तो करता है लेकिन यह नहीं जानता है कि विश्वास के द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को छूना जरूरी है; प्रेम करने के लिए प्रेम हासिल करना जरूरी है। वह यह भी नहीं जानता है कि प्रेम, का स्थान पहला और विश्वास का दूसरा है। क्योंकि ईश्वर प्रेम है। यदि प्रेम नहीं तो विश्वास कैसा? यदि ईश्वर नहीं तो विश्वास कैसा? विश्वास तो ईश्वर को अपनी आत्मा में हासिल करने का एक जरिया है, फिर भी वह अपनी आत्मा की तुलना में संसारिक इच्छा से ज्यादा प्रेम करता है इसलिए उसका विश्वास, अविश्वास के समान होता है क्योंकि वह अपने विश्वास के द्वारा ईश्वर के साथ संगठित नहीं हो पाता है। यही कारण है कि वह संसार की नजर में धार्मिक होने के बावजूद, ईश्वर की नजर में नास्तिक होता है; अजनबी होता है। उसे बहुत सारी बातों का डर लगा रहता है और वह अनावश्यक सांसारिक चिंताओं से ग्रसित होता है। वह अपने ही संसार में अपने ही संसार का राजा है। क्या ऐसे ही लोगों ने उनके जीवन में प्रभु (सत्य) का मार्ग सीधा करने वाले नबी, योहन बपतिस्ता को अपने रास्ते से नहीं हटाया? ऐसे लोगों के लिए स्रोत ग्रंथ 53 में लिखा है:


नास्तिक की मूर्खता


मूर्ख लोग अपने मन में कहते हैं :
"ईश्वर है ही नहीं।"
उनका आचरण भ्रष्ट और घृणास्पद है,
उनमें से कोई भलाई नहीं करता।
ईश्वर यह जानने के लिए
स्वर्ग से मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ता है
कि उन में कोई बुद्धिमान हो,
जो ईश्वर की खोज में लगा रहता हो।
सब-के-सब भटक गए हैं, सब समान रूप से भ्रष्ट हैं।
उन में कोई भलाई नहीं करता, नहीं, एक भी नहीं।
क्या वे कुकर्मी कुछ नहीं समझते?
वे भोजन की तरह मेरी प्रजा का भक्षण करते हैं
और ईश्वर का नाम नहीं लेते।
जहां वे थरथर कांपने लगे थे,
वहां भयभीत होने का कोई कारण नहीं था।
प्रभु ने आपके सपनों की हड्डियां छितरा दीं
प्रभु ने उनका परित्याग किया था,
इसलिए आपने उन्हें अपमानित किया।
कौन सियोन पर से इसराइल का उद्धार करेगा?
जब प्रभु अपनी प्रजा के निर्वासितों को लौटा लाएगा,
तब याकूब उल्लसित होगा और इसराइल
आनंद मनाएगा। स्रोत ग्रंथ 53 : 2-7


कौन झूठा नबी?


ऐसा व्यक्ति जो शैतान के असत्य के संगठन का सदस्य है और शैतान के कार्यों को संपन्न करता है। वह दिखावे के लिए प्रभु का नाम व्यर्थ लेता है और अपने आपको ईश्वर से संगठित दिखलाता है। वह अपने आप को समाज में सबसे धार्मिक व्यक्ति समझता है और धार्मिकता को अपनी जागीर या बपौती समझता है और ऐसा एहसास करवाता है जैसे वह लोगों में धार्मिकता खैरात में बांट रहा है; सिर्फ उसी के द्वारा धार्मिकता समाज में फल-फूल सकती है। वह धार्मिकता के नाम पर अपना मान सम्मान और लोगों से चंदा वसूली करता है। यदि लोग ऐसे व्यक्ति का सोहन-स्वागत न करें, तो वह बिल्कुल अंदर से नाराज हो जाता है और उसकी नाराजगी और बदले की भावना उसके चेहरे पर कभी ना कभी कहीं ना कहीं साफ झलक ही जाती है। धार्मिक कार्यों के बीच वह अपने मान सम्मान और सोहन का पूरा पूरा ध्यान रखता है। वह अपने को धार्मिक समझता है और दूसरों को तुच्छ समझता है। वह स्वयं धार्मिकता से दूर है और दूसरों को भी धार्मिकता से दूर करता है। वह स्वयं ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन से बहुत दूर है और दूसरों को भी उसकी सदस्यता से वंचित करता है। वह स्वयं पाप करता है और दूसरों के लिए भी पाप का कारण बनता है। वह ईश्वर की आड़ में शैतान के असत्य के कार्यों को संपन्न करता है। वह चाहता है कि लोग हर वक्त हर परिस्थिति में उससे सलाह-मशवरा लें ताकि समाज में उसका ताना बाना कायम रहे। वह अपने ओहदे पर घमंड करता है और अपने ओहदे के कारण दूसरों को अपने सामने झुका कर रखता है। वह भूल जाता है कि सिर्फ ईश्वर के सामने झुकना चाहिए; किसी और के समक्ष नहीं। वह भूल जाता है कि सत्य और सत्य का पालन करने वाला झुक नहीं सकता। वह यह समझने का प्रयास नहीं करता है कि उपवास और प्रार्थना धार्मिकता पाने की व्यक्तिगत प्रक्रिया है; और वह अपने आप को उच्च कोटि का प्रार्थना करने वाला समझता है; और चाहता है कि वह सब लोगों के लिए प्रार्थना करें और सब लोग उससे प्रार्थना का निवेदन करें। वह यह दिखाना चाहता है कि उसी की प्रार्थना शक्तिशाली एवं प्रभावशाली है और उसी में सबकी भलाई है। वह नहीं समझना चाहता है कि प्रार्थना पवित्रता पाने की एक व्यक्तिगत पवित्र प्रक्रिया है और प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य। वह यह समझने का प्रयास नहीं करता है कि प्रभु की शांति प्रभु में निवास करने से मिलती है; लेकिन वह अपने मुंह से बोल कर दूसरों को प्रभु की शांति देने का दिखावा करता है। वह प्रभु के वचनों का पाठ करता है और धाराप्रवाह बोलता है; लेकिन प्रभु के वचनों का पालन नहीं करता है। वह स्वयं पाप करता है और दूसरों के पाप का कारण बनता है। वह नबियों को हेय दृष्टि से देखता है, अपमानित करता है और अपने असत्य के कार्य में बाधा जानकर उन्हें रास्ते से हटाने का हर संभव प्रयास करता है ताकि समाज में उसका ताना-बाना बरकरार रहे। क्या ऐसे ही लोगों ने ईसा मसीह का कत्ल नहीं किया? ऐसे व्यक्ति के विषय में स्त्रोत ग्रंथ 52 में लिखा है :


पापी का पतन


विधर्मी अत्याचारी!
तुम अपनी दुष्टता पर डींग क्यों मारते हो?
तुम दिन भर षड्यंत्र रचते हो।
कपटी! तुम्हारी जीभ तेज उस्तरे-जैसी है।
तुम को भलाई की अपेक्षा बुराई
और सत्य की अपेक्षा झूठ अधिक प्रिय है।
कपटी जिह्वा।
हर विनाशकारी बात तुम को प्रिय है।
इसलिए ईश्वर सदा तुम तुम्हारा विनाश करेगा।
वह तुम को तुम्हारे तंबू के भीतर से छीन लेगा,
वह जीवन-लोक से तुम्हारा उन्मूलन करेगा।
धर्मी देखेंगे और दंग रह जाएंगे।
वे यह कहते हुए इसका उपहास करेंगे :
"इस मनुष्य को देखो! इसने ईश्वर को
अपना आश्रय नहीं बनाया था।
इसे अपनी अपार संपत्ति का भरोसा था
और यह अपने कुकर्मों की डींग मारता था।" स्तोत्र ग्रंथ 52 :3-9


इसलिए,


हम जो भी हैं, जहां भी हैं, जैसी भी स्थिति में है, अपना सब कुछ (असत्य) छोड़ कर प्रभु के लिए अपने अंदर तरस उत्पन्न करें; सत्य के लिए अपने अंदर प्यास जगाएं, ईश्वर के लिए अपने अंदर प्यार जगाएं और सत्य की आत्मा (पवित्र आत्मा) के लिए आदर बढाएं- हम निश्चित ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य बन जाएंगे; नबी बन जाएंगे; ईश्वर के श्रृद्धालु भक्त बन जाएंगे। स्मरण रहे कि ईश्वर पाप से घृणा और पापियों से बहुत प्रेम करता है क्योंकि हम सब उसी के हैं। इसलिए आइए, हम अपनी जवानी के समय से आज तक के तमाम कुकर्मों पर विचार करते हुए, उन्हें ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत करते हुए उपवास के साथ सच्चा पश्चाताप (प्रार्थना) करें :


प्रभु! दया कर


ईश्वर! तू दयालु है, मुझ पर दया कर।
तू दयासागर है, मेरा अपराध क्षमा कर।
मेरी दुष्टता पूर्ण रूप से धो डाला,
मुझ पापी को शुद्ध कर।
मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूं।
मेरा पाप निरंतर मेरे सामने है।
मैंने तेरे विरूद्ध पाप किया है।
मैंने वही किया, जो तेरी दृष्टि में बुरा है,
इसलिए तेरा निर्णय सही
और तेरी दण्डाज्ञा न्यायसंगत है।
मैं तो जन्म से ही अपराधी,
अपनी माता के गर्भ से पापी हूं।
तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है।
मेरे अंतःकरण को ज्ञान की बातें सिखा।
मुझ पर जुफा से जल छिड़क दें और मैं शुद्ध हो जाऊंगा।
मुझे दो और मैं हिम से भी अधिक स्वच्छ हो जाऊंगा।
मुझे आनंद और उल्लास का संदेश सुना
और तुझ से रौंदी हुई हड्डियां फिर खिल उठेंगी।
मेरे पापों पर दृष्टि ना डाल,
मेरा अपराध मिटाने की कृपा कर।
ईश्वर! मेरा हृदय फिर शुद्ध कर
और मेरा मन फिर सुदृढ़ बना।
अपने सानिध्य से मुझे दूर ना कर,
अपने पवित्र आत्मा से मुझे वंचित न कर।
मुक्ति का आनंद मुझे फिर प्रदान कर,
उदारता में मेरा मन सुदृढ़ बना।
मैं अपराधियों को तेरे मार्ग की शिक्षा दूंगा
और पापी तेरे पास लौट आएंगे।
ईश्वर! मेरे मुक्तिदाता! मेरा उद्धार कर
और मैं तेरी भलाई का बखान करूंगा।
प्रभु! मेरे होंठ खोल दे
और मेरा कंठ तेरा गुणगान करेगा।
तू बलिदान से प्रसन्न नहीं होता।
यदि मैं होम चढ़ाता, तो तू उसे अस्वीकार करता।
मेरा पश्चताप ही मेरा बलिदान होगा।
तू पश्चातापी दीन-हीन हृदय का तिरस्कार नहीं करेगा।
प्रभु! सियोन पर दया दृष्टि कर,
यरूशलेम की चारदीवारी फिर उठा।
तब तू योग्य बलिदान -
होम तथा पूर्णाहुति - स्वीकार करेगा
और तेरी वेदी पर बछड़े चढ़ाए जाएंगे। स्त्रोत्र ग्रंथ 51 : 3-21


आइए, हम उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) के द्वारा अपने हृदय रूपी मंदिर की आत्मा रूपी वेदी पर अपने पापों का बछड़ा बना कर उसकी बलि चढ़ा दें, यानी पापों का परित्याग कर दें और ईश्वर का मेमना, ईसा मसीह (सत्य) को अपनी आत्मा रूपी वेदी में सुसज्जित कर शोभायमान कर मेमने की तरह शुद्ध एवं पवित्र हो जाए। ऐसा नहीं करने पर हम अपने पापों की बलि चढ़ाने के बजाय, अपनी आत्मा में पाप के कलंको की संख्या बढ़ाकर ईश्वर के मेनने, ईसा मसीह की बलि चढ़ाएंगे; प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय की बलि चढ़ाते रहेंगे; ईश्वर को कष्ट देते रहेंगे; सत्य को पीड़ित करते रहेंगे। क्या पुत्र को अपने पिता के कष्ट का कारण बनना चाहिए?


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!