प्रकाशित 13/05/2020
मानव को दो प्रकार के पाप के कलंक लगते हैं।
(1) पूर्वजों के पापों का कलंक - जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही,
मैंने तुम को जान लिया।
तुम्हारे जन्म से पहले ही,
मैंने तुम को पवित्र किया।
मैंने तुमको राष्ट्रों का नबी नियुक्त किया।" यिरमियाह 1 : 5
उपरोक्त ईश्वर का कथन यह साफ करता है की प्रभु ईश्वर पहले मनुष्यों की आत्मा की रचना करते हैं, फिर आत्मा को उसकी माता के गर्भ में रखकर शरीर का निर्माण करते हैं। इसलिए माता के गर्भ में रखे जाने से पहले मनुष्यों की आत्मा ईश्वर की आत्मा के समान बिल्कुल स्वच्छ और पवित्र और सत्य से परिपूर्ण होती है; जैसा कि ईश्वर ने मनुष्यों को अपनी पवित्रता के सदृश्य पवित्रता प्रदान करने का वचन दिया है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईश्वर ने कहा, हम मनुष्यों को अपना प्रतिरूप बनाएं, वह हमारे सदृश्य हो। पति ग्रंथ 1 : 26
लेकिन माता के गर्भ में रखे जाने के साथ ही, मनुष्यों की आत्मा पाप के कलंको से कलंकित हो जाती है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
मैं तो जन्म से अपराधी,
अपनी माता के गर्भ से पापी हूं। स्त्रोत 51 : 7
सवाल यह है कि जिसका शरीर ही उसकी माता के गर्भ में निर्माणाधीन है, वह कैसे अपनी माता के गर्भ में पाप कर सकता है? नहीं! निर्माणाधीन मनुष्य पाप नहीं कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अपनी माता के गर्भ में मनुष्य अपने उन तमाम पूर्वजों के पाप के कलंको को अपनी आत्मा में पाता है, जिन्हें अपने पापों से मुक्ति प्राप्त नहीं हुई है। यह पहला तरह का पाप है, जिसे उस मनुष्य ने किया ही नहीं, लेकिन जिससे उसकी आत्मा कलंकित हो गई है। इस पाप का शुद्धिकरण बपतिस्मा के द्वारा किया जाता है; जिसका जिक्र भी मैं विस्तार से आगे के लेखों में करूंगा। बपतिस्मा के द्वारा बपतिस्मा लेने वाला अपने पूर्वजों के पापों की कलंक से मुक्त होता है, उसके पूर्वज नहीं!! सवाल यह भी है कि व्यक्ति अपने पूर्वजों के पाप के कलंक से क्यों कलंकित किया जाता है? यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि व्यक्ति अपने पूर्वजों के कलंक से इसलिए कलंकित होता है कि वह यह स्मरण रखे कि उसे एक नबी (नबी वह व्यक्ति है जो ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया का सहभागी है) की तरह अपने पूर्वजों के लिए पाप के कलंको से मुक्ति का कारण बनना है; और पाप के कलंको को अपनी आने वाली पीढ़ी में जाने से रोकना है। दयासागर प्रभु हमारे पूर्वजों को मुक्त करने के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी उनके पाप के कलंको को देकर याद रखते हैं; जब तक कि कोई पीढ़ी अपने पूर्वजों के पापों से मुक्ति का कारण न बने; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
वह हजार पीढ़ियों तक अपनी कृपा बनाए रखता और बुराई, अपराध और पाप क्षमा करता है। निर्गमन ग्रंथ 34 : 7
जाहिर है कि हमारे पूर्वजों पर भी ईश्वर की कृपा बनी रहती है। जब तक कि कोई पीढ़ी अपने पूर्वजों के पाप से मुक्ति का कारण नहीं बनता है। प्रभु हमारे पूर्वजों के पापों को स्मरण रखते हैं क्योंकि वे मुक्तिदाता ईश्वर हैं। इस बात का उल्लेख मैंने बीते दिनों के लेखों में किया है; जिसे आप इस चर्चा के अंतिम भाग में भी पाएंगे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
रास्ते में ईसा ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म से अंधा था। उसके शिष्यों ने उनसे पूछा, "गुरुवर! किसने पाप किया था, इसने अथवा इसके मां-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अंधा है?" ईसा ने उत्तर दिया, "न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके मां-बाप ने। यह इसलिए जन्म से अंधा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाए। योहन 9 : 1-3
ईसा मसीह के इस वचन से यह जाहिर होता है कि अपने पापों से मुक्त न हुए पूर्वजों के पाप का असर मनुष्यों पर पड़ता है। हालांकि, जिस व्यक्ति की चर्चा इस वचन में है, वह अपने पूर्वजों के पापों के कारण नहीं है, बल्कि इसलिए अंधा पैदा किया गया है कि उसे चंगा कर ईसा मसीह ईश्वर के सामर्थ्य को प्रकट करें।
(2) व्यक्तिगत पाप का कलंक - मनुष्य की इंद्रियां उनकी आत्मा में पाप का कलंक लगाती है क्योंकि मनुष्य का शरीर तो सांसारिक वासनाओं एवं व्यभिचार से घिरा होता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
क्योंकि नश्वर शरीर आत्मा के लिए भार-स्वरूप है और मिट्टी की यह काया मन की विचार शक्ति घटा देती है। प्रज्ञा ग्रंथ 9 : 15
यदि मनुष्य अपनी शरीर की वासनाओं, कमजोरियों पर उपवास और प्रार्थना के द्वारा विजय नहीं पाता है, तो उसका शरीर दिन-ब-दिन अपनी वासनाओं एवं कमजोरियों में गिरता जाता है; और उम्र के साथ-साथ उसके पाप के कलंको का संख्या उसकी आत्मा में बढ़ती ही जाती है। उपवास और प्रार्थना के विषय में मैंने अपने बीते दिनों के लेखों पर व्यापक चर्चा किया है। यहां इतना ही स्मरण दिलाना चाहता हूं कि कोई भी व्यक्ति उपवास और प्रार्थना के द्वारा शैतान के प्रपंचों से बच और पूरी तरह से मुक्त हो सकता है; और भविष्य में अपनी कमजोरियों पर शैतान को हावी नहीं होने देते हुए सयंम प्राप्त कर स्वयं विजय प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि उपवास और प्रार्थना किसी भी व्यक्ति का बिल्कुल ही व्यक्तिगत मामला है। उपवास शरीर की कमजोरियों पर कंट्रोल पाने का जरिया है, जबकि प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) आत्मा में पाप के कलंको को मिटाने का जरिया। उपवास और प्रार्थना एक दूसरे के पूरक हैं- बिना उपवास के प्रार्थना नहीं; और बिना प्रार्थना के उपवास नहीं! ये दोनों धार्मिक प्रक्रिया है; और प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला। उपवास और प्रार्थना के अनुपात में ही किसी व्यक्ति की धार्मिकता बढ़ती है। मैंने बीते दिनों के लेखों में स्पष्ट किया है कि धार्मिकता न किसी की जागीरदारी या बपौती है; न ही थोपी जा सकती है; और ना ही उधार और खैरात में दी जा सकती है। धार्मिकता, उपवास और प्रार्थना के द्वारा कमाई जाती है।
पाप को यदि परिभाषित किया जाए, तो कहा जा सकता है कि "पाप वह बेहद घटिया प्रक्रिया है, जिसके घटित होते ही पुत्र, पिता से अलग हो जाता है, जबकि पिता वहीं बैठा अपने पुत्र की वापसी का इंतजार करता है।" जब भी कोई व्यक्ति पाप करता है, वह अति पवित्र पिता ईश्वर से दूर चला जाता है। दूसरे शब्दों में जब भी कोई व्यक्ति असत्य करता है, वह सत्य से दूर हो जाता है। उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) अपने प्रभु ईश्वर (सत्य) में वापस फिरने का एकमात्र उपाय है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें देते हो, तो तुम्हारा स्वार्गिक पिता मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा? लूकस 11 : 13
इसका मतलब यह हुआ कि जब कोई व्यक्ति अपने अंदर अपने तमाम पाप के कलंको को ढूंढता है, फिर उन पाप के कलंको के साथ पश्चातापी मन से ईश्वर का द्वार खटखटाते हुए सच्चे हृदय से क्षमा मांगता है, तो फिर उसकी आत्मा को ईश्वर पुन: पवित्र आत्मा की वही शुद्धता प्रदान करते हैं, जैसे कि माता के गर्भ में रखने से पहले उसकी आत्मा को उन्होंने शुद्धता प्रदान की थी। जो व्यक्ति इस प्रक्रिया को यानी ढूंढने, खटखटाने और मांगने की प्रक्रिया को पूरी करता है, उसके लिए धर्म ग्रंथ में लिखा है :
तुम मुझ में रहो और मैं तुम मे रहूंगा। जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते। योहन 15 : 4
सत्य के लिए सत्य में रहना जरूरी है, सत्य में जीना जरूरी है। यही ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया के निर्माण एवं विस्तारीकरण की पवित्र प्रक्रिया है। ऐसा अपने पापों के लिए सच्चा पश्चताप के द्वारा ही संभव है। इसलिए सच्चा पश्चताप को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि "सच्चा पश्चताप वह अद्भुत एवं पवित्र प्रक्रिया है, जिसके द्वारा पिता से जुदा हुआ पुत्र, पुनः पिता में वापस मिल जाता है।
पाप, शरीर करता है; जबकि सच्चा पश्चताप करना मनुष्य की आत्मा का काम है। वैसे तो उपवास निरंतरता के साथ की जानी चाहिए ताकि शरीर को सयंम में डालकर, पाप में गिरने से बचा जा सके। यदि कोई निरंतरता के साथ उपवास नहीं करता है, तो उसे सच्चा पश्चताप (प्रार्थना) करने के लिए शरीर को उपवास के द्वारा संयम में लाना निहायत ही जरूरी है ताकि पश्चताप के द्वारा जिन पाप के कलंको से वह मुक्त होता है, उन पापों को दुबारा करने से शरीर को रोकने का पुरजोर प्रयत्न हो; क्योंकि आत्मा की शुद्धता को देखकर शैतान मानव के शरीर को पाप में गिराने के लिए भरसक प्रयत्न करता है। शैतान यह कतई नहीं चाहता है कि मानव की आत्मा सत्य से परिपूर्ण हो जाए। यही कारण है कि अपनी कमजोरियों पर विजय पाने के लिए हर व्यक्ति को निरंतरता के साथ उपवास करना चाहिए। पाप न करना या फिर पाप हो जाने पर सच्चा पश्चताप करना ही प्रार्थना है, जो एक बिल्कुल व्यक्तिगत प्रक्रिया है, जिसका वर्णन में ऊपर कर चुका हूं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है।
मेरे अंतःकरण को ज्ञान की बातें सिखा। स्त्रोत 51 : 8
आइए, हम पापों से मुक्त होने के ज्ञान को प्राप्त कर पाप मुक्त होने के लिए जरूरी कदम उठाएं और ईश्वर को प्रसन्न करें। जो व्यक्ति अपने पापों से मुक्त होते हैं, वे ही दूसरों को पाप से मुक्त होने की शिक्षा दे सकते हैं। जैसा कि मैं उल्लेख कर रहा हूं कि पापों से मुक्त होना आत्मा का काम है इसलिए पूर्वजों की आत्माओं को भी अपने पाप के कलंकों से मुक्त होने के लिए सच्चा पश्चाताप करना पड़ेगा। आत्मा ईश्वर की महिमा करने के लिए बनायी गयी है इसलिए शरीरधारी आत्मा हो या शरीर छोड़ चुका आत्मा, दोनों को अपने पाप के कलंको से मुक्ति के लिए सच्चा पश्चाताप करना ही पड़ेगा ताकि उनकी महिमा ईश्वर को ग्राहय हो। मुक्ति प्राप्त शरीरधारी आत्माएं, पाप के कलंको से ग्रसित अपने पूर्वजों की आत्माओं और शरीरधारी आत्माओं को सच्चा पश्चाताप का मार्ग दिखा सकती है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यही कारण है कि मृतकों को भी समाचार सुनाया गया, जिससे यद्यपि वे शरीर में मनुष्यों की तरह दंडित हो चुके हैं, फिर भी आत्मा के द्वारा ईश्वर के अनुरूप जीवन प्राप्त करें। पेत्रुस 4 : 6
इसलिए यह प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह स्वयं शुद्ध एवं पवित्र जीवन जीते हुए ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया का सहभागी बने; तब कहीं ईश्वर उसे अपनी एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया के विस्तारीकरण के लिए अपना संसाधन बनाकर स्वयं उसके द्वारा दूसरों (जीवित शरीरधारी आत्माओं एवं उसके पूर्वजों की आत्माओं) को शुद्धता एवं पवित्रता पाने के लिए प्रेरित करेंगे।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!