RIGHTEOUSNESS

ईसाई कौन? आपसी फूट और विभाजित कलीसिया।

प्रकाशित 07/05/2020


संसार की कलीसियाओं के बीच फूट के कारण ईसाई धर्म पालन में भयंकर अंतर है। ऐसे में विभिन्न कलीसियाओं के द्वारा ईसा मसीह की शिक्षा के प्रचार की सार्थकता क्या है? इस संसार में ईसाई लोग आपसी फूट के कारण बहुत सारी कलीसियाओं में विभाजित हैं; और ईसाई धर्म पालन में विरोधाभास भी प्रचुर मात्रा में व्याप्त है। शैतान ईसाई लोगों के बीच में फूट डालकर उन पर शासन करता है। *ईसाई कौन है?*ईसाई शब्द को संधि विच्छेद करने से दो शब्द मिलता है:


ईसाई = ईसा + आई


पहला शब्द है *ईसा*और दूसरा शब्द है इंग्लिश का *आई*, मतलब मैं। हर व्यक्ति का *"मैं"* होता है; किसी जानवर का नहीं। इसलिए जिस व्यक्ति का "मैं", ईसा मसीह से संयुक्त है, वहीं ईसाई है; दूसरा नहीं। ईसा और मैं (Christian = Christ 'n I ) ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार ईसा मसीह से वही व्यक्ति संयुक्त हो सकता है, जो असत्य को पूरी तरह से छोड़कर अपना जीवन सत्य की सेवा में पूर्णता समर्पित कर दिया है। ईसा मसीह भी हम जैसे हाड़-मांस के मनुष्य हैं। उनका भी "मैं" ईश्वर से संयुक्त रहा क्योंकि उन्होंने पिता ईश्वर के आदेशों का पालन किया है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। मैंने भी अपनी पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में ढृढू बना रहता हूं। योहन 15 : 10


ईसा मसीह का "मैं" प्रेम से संयुक्त अर्थात ईश्वर से संयुक्त। वाह! क्या बात है। इसलिए हममें से प्रत्येक जन को आज अपने आप से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि क्या मेरा "मैं", पूरी तरह से पिता ईश्वर की आदेश अनुसार असत्य (पाप) को छोड़कर सत्य को अपना जीवन समर्पित किया है? यदि सवाल का जवाब हां है, तो मैं सच्चा ईसाई हूं; यदि नहीं, तो मैं ईसाई नहीं हूं। यदि मैं सच्चा ईसाई नहीं हूं, तो मैं क्या हूं? कसाई हूं! जी हां! कसाई।


कसाई = कस + आई


यानी ईसा मसीह को क्रूस पर कसने वाला "मैं"। ईसा मसीह सत्य हैं। यानी सत्य और उनके तमाम प्रतिकों (प्रेम दया क्षमा शांती करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय) को क्रूस पर कसने वाला "मैं"; जो ईसा मसीह को क्रूस पर कस कर, सत्य से असंयुक्त हो कर, छूटे सांड की तरह य बेलगाम घोड़े की तरह मन-मर्जी असत्य कर सके। क्या फूट में जीने के लिए हमने ईसा की एकता को नहीं कसा है? क्या लड़ाई के लिए शांति नहीं कसी जाती है? क्या पिटाई के लिए दया नहीं कसी जाती है? क्या अन्याय के लिए न्याय नहीं कसी गई है?.....


लड़ाई = लड़ + आई, लड़ने वाला "मैं "। शांति को कस कर ही लड़ा जा सकता है।
ढिठाई = ढीठ + आई, हठधर्मिता (असत्य) करने वाला "मैं" या किसी का नहीं सुनने वाला "मैं"।
दूसरे शब्दों में न्याय को, प्रेम को कसने वाला "मैं" जो मनमानी करने में व्यस्त है। ईश्वर प्रेम हैं और न्याय प्रिय हैं; वे हठधर्मिता, मनमानी, कठोरता, ज़िद बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं। क्या हमने बपतिस्मा लेकर शैतान के तमाम छल प्रपंच, ताम-झाम (असत्य) को त्यागने की शपथ नहीं खाई है? यदि हां! तो जिस बपतिस्मा के द्वारा हम सत्य (ईश्वर) के हो गए हैं, उस सत्य से वापस असत्य में लौटना कितना उचित है? अपने बपतिस्मा के करार अनुसार निरंतर ईश्वर (सत्य) से संयुक्त रहना ही ईसाइयत है, जैसा कि ईसा मसीह ईश्वर (सत्य) से निरंतर संयुक्त हैं; और स्वयं बहुत बड़े ईसाई होने का परिचय देते हैं। जो सच्चा ईसाई न हो, वह ईसाई धर्म का प्रचार कैसे कर सकता है? ईसा मसीह स्वयं सच्चा ईसाई हैं, जैसा की अभी अभी मैंने उल्लेख किया है और वचनों से साबित भी किया है, इसलिए वे सच्चे ईसाई बनने की शिक्षा देते हैं। एक सच्चे ईसाईयों का शैतान कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है; वह उसे असत्य में नहीं ढकेल सकता है; क्योंकि सच्चा ईसाई, ईसा मसीह से संयुक्त हो कर (ईसाई = ईसा + आई )अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर से और ईश्वर के तमाम बेटे बेटियों से ईसा मसीह की तरह अनन्य प्रेम करता है, जैसा कि धर्म ग्रंथ में पहला और दूसरा आदेश क्रमशः लिखा हुआ है।


सवाल यह है कि यदि हम अपने आप को सच्चे ईसाई मानते हैं, तो फिर शैतान हमारे बीच फूट डालकर, हमें छोटी-छोटी ईट पत्थरों की कलीसियाओं में क्यों, कैसे और किस हैसियत से विभाजित कर रखा है? शैतान रुका भी नहीं रहा है और निरंतर विभाजित करता ही जा रहा है! नहीं! सच्चे ईसाइयों के बीच शैतान फूट नहीं डाल सकता है क्योंकि सच्चे ईसाईयों को ईश्वर का संरक्षण प्राप्त होता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


स्तोत्र ग्रंथ 91


तुम, जो सर्वोच्च के आश्रय में रहते
और सर्वशक्तिमान की छत्रछाया में सुरक्षित हो,
तुम प्रभु से यह कहो : "तू ही मेरी शरण है, मेरा गढ़,
मेरा ईश्वर : तुझ पर ही भरोसा रखता हूं।"
वह तुम्हें बहेलिया के फंदे से,
घातक महामारी से छुड़ाता है।
वह अपने पंख फैला कर तुमको ढक लेता है,
तुम्हें उसके पैरों के नीचे शरणस्थान मिलता है।
उसकी सत्यप्रतिज्ञता तुम्हारी ढाल है और तुम्हारा कवच।
तुम्हें न तो रात्रि के आतंक से भय होगा
और न दिन में चलने वाले बाण से,
न अंधकार में फैलने वाली महामारी से
और न दोपहर को चलने वाली घातक लू से।
तुम्हारी बगल में भले ही हजारों
और तुम्हारी दाहिनी और लाखों ढेर हो जाएं,
किंतु तुमको कुछ नहीं होगा।
तुम अपनी आंखों से देखोगे
कि किस प्रकार विधर्मीयों को दण्ड दिया जाता है;
क्योंकि प्रभु तुम्हारा आश्रय है,
तुमने सर्वोच्च ईश्वर को अपना शरण स्थान बनाया है।
तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं होगा,
महामारी तुम्हारे घर के निकट नहीं आएगी;
क्योंकि वह अपने दूतों को आदेश देगा
कि तुम जहां कहीं भी जाओगे, वह तुम्हारी रक्षा करे।
वे तुम्हें अपने हाथों पर उठा लेंगे
कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे।
तुम सिंह और सांप को कुचलोगे,
तुम बाघ और अजगर को पैरों तले रौदोगे।
वह मेरा भक्त है, इसलिए मैं उसका उद्धार करूंगा;
वह मेरा नाम जानता है, इसलिए मैं उसकी रक्षा करूंगा।
यदि वह मेरी दुआएं देगा, तो मैं उसकी सुनूंगा,
मैं संकट में उसका साथ दूंगा;
मैं उसका उद्धार कर उसे महिमान्वित करूंगा।
मैं उसे दीर्घायु प्रदान करूंगा
और उसे अपने मुक्ति-विधान के दर्शन कराऊंगा। स्तोत्र ग्रंथ 91 : 1-16


जब प्रभु भक्तों का कोई अनिष्ट नहीं होने का बात लिखी हुई है, तो हम ईसा मसीह के अनुयायी कहलाने वालों के बीच भयंकर फूट का अनिष्ट क्यों पड़ा हुआ है? हमें मान लेना चाहिए कि हम सच्चे ईसाई नहीं हैं। क्या सच्चे ईसाईयों का सिर्फ और सिर्फ एक झुंड और एक ही चरवाहा नहीं होता है? यहां तो दुनिया भर का चरवाहा (शैतान) है; जिसके छल प्रपंच में फस कर बपतिस्मा लेने के बावजूद, हम बहुत सारे झुडों में ऐसे बिखर गए हैं कि ईसा मसीह में कभी हम एक ना हो पाएं; जैसे कि पूर्व काल से आज तक हमारी दुर्गति है। अपनी-अपनी ईट पत्थर की कलीसियाओं में हम ईश्वर के वचन का पाठ तो करते हैं, लेकिन पालन नहीं करते। इस बात का सबूत यह है कि यदि हम वचन का पालन करते होते, तो ईसा मसीह के एक दूसरे से प्रेम करने के वचन को पालन कर, हम एक ही कलीसिया (एक ही झुंड) और एक ही चरवाहा के होते; जैसा कि 05/05/2020 के भी लेख में मैंने उल्लेख किया है।


अब कलीसियाओं के बीच पड़ी हुई फूट की स्थिति में हम अपनी-अपनी ईट पत्थर की कलीसियाओं की चारदीवारी के अंदर जो कुछ कर रहे हैं, उसे एक दृष्टांत के माध्यम से समझाता हूं। किसी घर में सात भाई हैं, जिनमें दो पढ़े लिखे व ज्ञानी हैं और बाकी पांच कम पढ़े लिखे, व अज्ञानी है। एक दिन दोनों ज्ञानी भाइयों के बीच अपने-अपने ज्ञान के कारण फूट पड़ गई। इसी फूट के बीच अपना-अपना पक्ष और गुट मजबूत करने के लिए दोनों भाईयों ने अपने ज्ञान और बुद्धि का व्यवहार कर बाकी भाईयों को पटा फुसलाकर अपने पक्ष में कर लेने का अथक प्रयत्न करने लगे। भला! क्या वे अपने अंदर के प्रलोभन की बेचैनी में अपने नादान भाईयों को अपने फूट में सम्मिलित कर पाप नहीं कर रहे हैं? और ऐसा कर अपने नादान भाईयों के पाप का कारण नहीं बन रहे हैं? ; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जो मुझ पर विश्वास करने वाले उन नन्हों में से एक के लिए भी पाप का कारण बनता है, उसके लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाट बांधा जाता और वह समुद्र में डुबा दिया जाता। प्रलोभनों के कारण संसार को धिक्कार! प्रलोभन अनिवार्य है, किंतु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है! मती 18 : 6-7


थोड़ा सा ठंडे दिमाग से सोचिए कि फूट के बीच हम अपनी-अपनी ईंट-पत्थरों की कलीसिया मजबूत करने के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक कर, नन्हों को अपनी फूट में सम्मिलित कर बुरा उदाहरण नहीं दे रहे है कया? ; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


"जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो 'प्रभु! प्रभु! कह कर मुझे क्यों पुकारते हो? जो मेरे पास आ कर मेरी बातें सुनता और उन पर चलता है- जानते हो, वह किसके सदृश्य है? वह उस मनुष्य के सदृश्य है, जो घर बनाते समय गहरा खोदता और उसकी नींव चट्टान पर डालता है। बाढ़ आती है और जल-प्रवाह उस मकान से टकराता है, किंतु वह उसे ढा नहीं पाता; क्योंकि वह घर बहुत मजबूत बना है। परंतु जो मेरी बातें सुनता है और उस पर नहीं चलता, वह उस मनुष्य के सदृश्य है, जो बिना नींव डाले भूमितल पर अपना घर बनाता है। जल-प्रवाह की टक्कर लगते ही वह घर ढह जाता है और उसका सर्वनाश हो जाता है।" लूकस 6 : 46-49


अब आप ही बताइए कि ईट पत्थरों की विभिन्न कलीसियाओं में फंसे प्रत्येक जन को आपसी फूट मिटाने और ईसाई एकता कायम करने के लिए ईश वचन के अनुसार अपना-अपना सब कुछ (असत्य यानी स्वार्थ घमंड पाखंड दिखावा लालच ईर्ष्या द्वेष दोषारोपण चापलूसी कानाफूसी....... इत्यादि) छोड़ कर, स्वयं सत्य में समर्पित हो जाना चाहिए या दूसरों को अपने ईट पत्थर की फूट की कलीसिया में सम्मिलित करने के लिए ऐडी चोटी एक करना चाहिए? स्मरण रहे कि जब कोई व्यक्ति ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार अपना सब कुछ छोड़ कर सत्य में समर्पित होता है, तो वैसे व्यक्ति को ईश्वर अपने सुसमाचार प्रचार का संसाधन (इंस्ट्रूमेंट) बनाकर स्वयं लोगों के बीच ईश शिक्षा का प्रचार कर अपनी एकमात्र अप्रत्यक्ष कलीसिया का विस्तार करते हैं; जिसका मालिक, शिल्पकार और योजनाकार स्वयं ईश्वर हैं और कोने का पत्थर ईसा मसीह। ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया, ईसा मसीह और उनके समान धार्मिक लोगों का संगठन है, जो एक दूसरे से सत्य के सीमेंट से जुड़े हुए हैं, जिसे शैतानी ताकत अलग नहीं कर सकती है। क्या शैतान पेत्रुस को ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया, जिसका वह चट्टान के समान मजबूत सदस्य है, उससे उसे अलग कर पाया? बिल्कुल नहीं। संसार की तमाम कलीसियाओं के बीच फूट की दुर्दशा से यह स्पष्ट है कि इनमें से एक भी कलीसिया दूर-दूर तक ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का प्रतिबिंब नहीं है क्योंकि हम वचन तो सुनते हैं लेकिन उसका अनुपालन नहीं करते हैं; इसलिए हम विश्वासी कहलाने के बावजूद ईश्वर और अपने पड़ोसियों से प्रेम करने से बहुत दूर हैं और हमारा श्रद्धा ईश्वर को ग्राह्य नहीं है; हमारी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट है!! जबकि मैं लगातार अपने पीछे लेखों में जिक्र कर रहा हूं कि विश्वास, प्रेम की पराकाष्ठा को छूना है ताकि हमारे जीवन में प्रेम सार्थक हो जाए। ईश्वर प्रेम है। शर्म आनी चाहिए हमें क्योंकि हम जैसे ईसा मसीह के अनुयायियों के बारे में धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैंने सोचा, "ये तो साधारण लोग हैं
और कुछ नहीं समझते।
ये प्रभु का मार्ग नहीं जानते
और उसके आदेशों से अपरिचित हैं।
इसलिए अब मैं बड़ों के पास जाऊंगा
और उनसे बात करूंगा।
वे तो प्रभु का मार्ग जानते हैं
और उनके आदेशों से परिचित हैं।"
किंतु सबों ने एकमत होकर जूआ तोड़ डाला।
और अपने बंधन काट दिए हैं।
किंतु यह प्रजा हठीली और विद्रोही है,
यह मुझे त्याग कर चली जाती है।
यह अपने मन में यह नहीं कहती,
'हम अपने प्रभु-ईश्वर पर श्रद्धा रखें,
जो समय पर पानी बरसाता है-
शिशिर ऋतु और बसंत ऋतु की वर्षा,
जिससे हमें निश्चित समय पर फसल मिलती है।'
तुम्हारे कुकर्मों के कारण समय पर वर्षा नहीं होती।
तुम्हारे पापों ने तुमको उन वरदानों से वंचित कर दिया है।
"मेरी प्रजा के बीच दुष्टों की कमी नहीं, जो चिड़ीमारों की तरह झुक कर घात लगाए बैठे हैं।
वे लोगों को फंदे लगाकर फंसाते हैं।
पक्षियों से भरी टोकरी के सामान
उनके घर लूट के माल से भरे हैं।
वे छल-कपट से धनी बने
और समाज में बड़े समझे जाते हैं।
वे मोटे-ताजे हैं;
उनके शरीर पर चरबी चढ़ गई है।
उनके कुकर्मों की सीमा नहीं।
वे अनाथों को न्याय नहीं दिलाते
और दरिद्रों के अधिकारों की रक्षा नहीं करते।
क्या मैं इसके लिए उन्हें दंड न दूं?"
यह प्रभु की वाणी है।
क्या मैं ऐसी प्रजा से प्रतिशोध न लूं?
इस देश में जो घटित हुआ है,
वह भयंकर और घृणित है।
नबी झूठी भविष्यवाणियां करते हैं,
याजक भ्रष्टाचार करते हैं
और मेरी प्रजा को यह सब प्रिय है।
किंतु तुम लोग अंत में क्या करोगे? नबी यिरमियाह 5 : 4-5 और 23-31


इसलिए,


हम जो अपने अपने ईंट-पत्थरों की फूट की मारी कलीसिया की चारदीवारी के अंदर जो कर रहे हैं, वह ईश्वर की नजर में घृणित है। अच्छा होगा कि हमें जो सुसमाचार सुनाया गया है और हमें जो ईसा मसीह की शिक्षा मिली है, उस पवित्र शिक्षा के अनुसार व्यक्तिगत धार्मिकता की प्राप्ति हेतु असत्य को पूरी तरह से छोड़कर, सत्य में समर्पित हो जाएं। धार्मिकता किसी की जागीर, विरासत या बपौती नहीं है: यह न ही उधार या खैरात में दी जाती है; ना ही थोपी जा सकती है; और न ही उधार या खैरात में पाई जाती है। धार्मिकता को प्राप्त करना हममें से प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है; जो बिल्कुल ही व्यक्तिगत मामला है। धार्मिकता प्राप्त नहीं करना अनुचित है; पाप है; अधर्म है। इसलिए अपनी धार्मिकता की ओर कदम बढ़ाएं- पाप को पूरी तरह से छोड़कर, सत्य में पूरी तरह से समर्पित हो जाएं। सत्य ही ईश्वर है।


आइए,


और आज ही अपने आप से यह सवाल पूछिए कि क्या मैं प्रभु ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया जो संसार की ईट पत्थर की कलीसियाओं से बढ़कर है, का सदस्य और उसके विस्तार में सहभागी हूं? यदि उपरोक्त सवाल का जवाब नहीं है, तो फिर हम जरूर संसार की ईट-पत्थर की फूट की मारी कलीसिया में फंसे हुए हैं और तमाम कलीसियाओं के बीच व्याप्त फूट के सहभागी हैं, पाप के साथ भागी है; और दूसरों को भी फूट का सहभागी करने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए यह उचित होगा कि हम प्रत्येक जन अपनी-अपनी ईंट-पत्थर की फूट की मारी कलीसियाओं की चारदीवारी से हठधर्मिता (असत्य) छोड़ कर बाहर निकल कर ईश वचन का पालन करते हुए सत्य में पूरी तरह से समर्पित हो जाएं और कलीसियाओं के बीच व्याप्त धर्म के भयंकर अंतर को नष्ट कर दे; तब जाकर हम एक ही कलीसिया और एक ही चरवाहे, ईसा मसीह की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के साहभागी बन पायेंगे। क्योंकि स्त्रोत ग्रंथ अध्याय 15 में लिखा है:


ईश्वर का भक्त


प्रभु! कौन तेरे शिविर में प्रवेश करेगा?
कौन तेरे पवित्र पर्वत पर निवास कर सकेगा?
वही, जिसका आचरण निर्दोष है,
जो सदा सत्कार्य करता है,
जो हृदय से सत्य बोलता है
और चुगली नहीं खाता,
जो अपने भाई को नहीं ठगता
और अपने पड़ोसी की निंदा नहीं करता,
जो विधर्मी को तुच्छ समझता
और प्रभु-भक्तों का आदर करता है,
जो किसी भी कीमत पर अपने वचन का पालन करता है,
उधार देकर ब्याज नहीं मांगता
और निर्दोष के विरुद्ध घूस नहीं लेता।
जो ऐसा आचरण करता है,
वह कभी विचलित नहीं होता। स्तोत्र ग्रंथ 15 : 2-5


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!