प्रकाशित 05/05/2020
क्या मैं प्रभु ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का सदस्य और उसके विस्तार में सहभागी हूं? ईश्वर सत्य है, सत्य प्रिय है और सत्यप्रतिज्ञा हैं। वे अनादिकाल से सत्य में गतिशील हैं और अपने एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के शिल्पकार और उसके विस्तार के योजनाकार हैं। ईसा मसीह के संसार में आने से पहले, ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का विस्तार ईश्वर के अभिषिक्त लोगों (नबियों) के द्वारा होता रहा। नबियों ने लोगों को असत्य (पाप) त्याग कर, सत्य में समर्पित होने की शिक्षा दिया करते थे। आज भी लोग अभिषिक्त लोगों (नबियों) के ग्रंथों को पढ़कर सत्य में समर्पित जीवन कर प्रभु की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के सदस्य बनते हैं । ईश्वर की इच्छा एवं योजना के अनुसार ईसा मसीह सत्य ने समर्पित जीवन जी कर, ईश्वर के एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का मजबूत स्तंभ बन गए हैं; और ईश्वर के साथ सत्य में गतिशील हो होकर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के विस्तार की योजना के साहभागी हैं। बहुत सारे लोग ईसा मसीह की शिक्षा को तुच्छ और पालन करने में असंभव समझ कर उनका साथ छोड़ दिया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, "क्या तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?" सिमोन पेत्रुस ने उन्हें उत्तर दिया, "प्रभु! हम किसके पास जाएं! आप के ही शब्दों में अनंत जीवन का संदेश है। योहन 6 : 67-68
ईसा मसीह का संदेश को पा कर, पेत्रुस, ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार पूरी तरह से असत्य त्याग कर, सत्य को समर्पित हो गए और ईश्वर से अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का चट्टान के समान मजबूत सदस्य बन गए; और ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ सत्य में गतिशील हो कर अपने जीवन काल और आज भी अपनी आदर्शों के कारण ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के विस्तार की योजना के साहभागी हैं। बहुतों ने ईसा मसीह की शिक्षा पर विश्वास नहीं किया, लेकिन बहुतों ने पेत्रुस की तरह ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार पूरी तरह से असत्य त्याग कर, सत्य को समर्पित हो गए और ईश्वर से अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का चट्टान के समान मजबूत सदस्य बन गए और ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ सत्य में गतिशील हो होकर अपने जीवन काल में ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के विस्तार की योजना के साहभागी बने।
आज तक बहुत सारे लोग ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार पूरी तरह से असत्य त्याग कर, सत्य को समर्पित हो गए और ईश्वर से अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया की चट्टान के समान मजबूत सदस्य बन गए हैं; और ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ सत्य में गतिशील हो होकर जीवनभर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के विस्तार की योजना के साहभागी हैं। विचार करने वाली बात यह है की क्या मैं प्रभु की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का सदस्य और उसके विस्तार का सहभागी हू? जो कोई भी ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का सहभागी है, वह प्रभु भक्त है, प्रभु का अभिषिक्त हैं। प्रभु के अभिषिक्तों की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है; क्योंकि इस संसार में , शैतान के राज्य में पूर्णता असत्य त्यागना और पूर्णता सत्य में समर्पित होना असंभव तो नहीं, बल्कि मुश्किल जरूर है। प्रभु भक्तों / अभिषिक्तों और जो प्रभु भक्त बन कर प्रभु का अभिषेक पाना चाहते हैं; जैसा कि प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम के बारे में धर्म ग्रंथ में स्तोत्र 103 में लिखा है :
ईश्वर प्रेम है।
मेरी आत्मा! प्रभु को धन्य कहो।
मेरे अंतरतम! उसके पवित्र नाम की स्तुति करो।
मेरी आत्मा! प्रभु को धन्य कहो
और उसका एक भी वरदान कभी नहीं भुलाओ।
वह तेरे सभी अपराध क्षमा करता
और तेरी सारी दुर्बलताएं दूर करता है।
वह तुझे सर्वनाश से बचाता
और दया और अनुकंपा से संभालता है।
वह जीवन भर तुझे सुख-शांति प्रदान करता
और तुझे गरुड की तरह चिरंजीवी बनाता है।
प्रभु न्यायपूर्वक शासन करता
और सब पददलितों का पक्ष लेता है।
उसने मूसा को अपने मार्ग दिखाएं
और इस्राएल को अपने महान कार्य।
प्रभु दया और अनुकंपा से परिपूर्ण है;
वह सहनशील और अत्यंत प्रेममय है।
वह सदा दोष नहीं देता
और चिरकाल तक क्रोध नहीं करता।
वह न तो हमारे पापों के अनुसार
हमारे साथ व्यवहार करता
और न हमारे अपराधों के अनुसार हमें दण्ड देता है।
अकाश पृथ्वी के ऊपर जितना ऊंचा है,
उतना ही महान है अपने भक्तों के प्रति प्रभु का प्रेम।
पूर्व पश्चिम से जितना दूर है,
प्रभु हमारे पापों को हम से उतना ही दूर कर देता है।
पिता जिस तरह अपने पुत्रों पर दया करता है,
प्रभु उसी तरह अपने भक्तों पर दया करता है;
क्योंकि वह जानता है कि हम किस चीज के बने;
उसे याद रहता है कि हम मिट्टी हैं।
मनुष्य के दिन घास की तरह हैं
वह खेत के फूल की तरह खिलता है।
हवा का झोंका लगते ही वह चला जाता है
और फिर कभी दिखाई नहीं देता।
किंतु प्रभु-भक्तों के लिए उसकी कृपा और उनके पुत्र-पौत्रों के लिए उसकी न्यायप्रियता
सदा-सर्वदा बनी रहती है;
उनके लिए, जो उसके विधान पर चलते हैं;
जो उसकी आज्ञाएं याद कर उनका पालन करते हैं।
प्रभु ने स्वर्ग में अपना सिहासन स्थापित किया है।
वह विश्वमण्डल का शासन करता है।
प्रभु के शक्तिशाली दूतों!
तुम सब, जो उसकी वाणी सुनते ही
उसकी आज्ञा का पालन करते हो, प्रभु को धन्य हो।
विश्वमण्डल! प्रभु को धन्य कहो।
प्रभु के आज्ञाकारी सेवकों ! प्रभु को धन्य कहो।
प्रभु की समस्त कृतियों!
उसके राज्य में सर्वत्र
प्रभु को धन्यवाद कहो।
मेरी आत्मा! प्रभु को धन्य कहो। स्तोत्र 103 : 1-22
इसलिए,
हमें चाहिए कि हम प्रभु की शिक्षा के अनुसार असत्य को पूर्णतः त्याग कर, सत्य में समर्पित हो जाएं; और ईश्वर का अभिषेक प्राप्त कर, ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के सदस्य बन जाएं। क्या संसार में हमारी कलीसियाओं के बीच आपसी फूट नहीं है? मतभेद नहीं है? दोषारोपण नहीं है? खींचतान नहीं है? हां! है। बिल्कुल है! प्रत्यक्ष है! और प्रचुर है! इसका कारण यह है कि हम सब अपने आप को ईसा मसीह का अनुसरण करने वाला तो मानते हैं, लेकिन एक दूसरे से प्यार ही नहीं करते हैं। ईसा मसीह की शिक्षा, सत्य की शिक्षा, ईश्वर की शिक्षा क्या एक दूसरे से प्रेम करने की नहीं है? शैतान कभी नहीं चाहता कि हम सत्य को समर्पित होकर और एक दूसरे से प्रेम कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के सहभागी हो जाएं! बार-बार एकता की बात होती है और एकता के लिए प्रार्थना भी होता भी है; फिर भी एकता कहां है? एक दूसरे से प्यार नहीं करने के करने कारण ही, हम सब आज तक ईसा मसीह में एक नहीं हो पाए हैं; जैसे कि आज हमारी दयनीय स्थिति है। ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार हम एक दूसरे से प्यार ही नहीं करते हैं। हम ईसा मसीह के कैसे अनुयायी हैं? आपसी प्रेम की कमी के कारण ही तो हम सब अलग-थलग पड़ कर, अलग-अलग कलीसियाओं में विभाजित हैं। हम कैसे कह सकते हैं कि हमारी कलीसिया में ईश्वर विराजमान हैं, ईसा मसीह विराजमान हैं? ईश्वर प्रेम है; इसलिए तो वे प्रेम करने वालों के बीच उपस्थित रहते हैं; और प्रेम की कमी के कारण अशांत जीवन जीने वालों के दरवाजे के बाहर दस्तक देते हैं। यदि कोई उनकी आवाज सुनकर दरवाजा खोलेगा, तो वे वहां प्रवेश कर वहां विराजमान हो जाएंगे। यदि हम सचमुच में ईश्वर और ईसा मसीह में एक होना चाहते हैं, तो हमें ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार असत्य त्याग कर सत्य में उचित समर्पण के लिए- प्रेम के लिए बंद अपना हृदय खोल देना चाहिए। जब तक हम प्रभु के वचन के अनुसार एक दूसरे से प्रेम नहीं करेंगे और सिर्फ प्रभु के वचन का रट्टा लगाते जाएंगे, तब तक प्रभु के निम्नलिखित वचन के अनुसार हमारे बीच फूट कायम रहेगी; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर शांति लेकर आया हूं। मैं शांति नहीं, बल्कि तलवार लेकर आया हूं। मैं पुत्र और पिता में, पुत्री और माता में, बहू और सास में फूट डालने आया हूं। मनुष्य के घरवाले ही उसके शत्रु बन जाएंगे। मती 10 : 34-36
शायद हम नहीं समझ पा रहे हैं कि धार्मिकता बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है, जिसकी गहराई सिर्फ ईश्वर ही नाप सकता है। हम तो यहां अपनी कलीसिया (संगठन) को सार्थक और दूसरे की कलीसिया (संगठन) को निरर्थक समझते हैं। यही कारण है कि आज प्रेम इतना न क्षत-विक्षत है कि एक ही परिवार के लोग भी अलग-अलग कलीसियाओं से जुड़े पाये जाते हैं, और अलग-अलग कलीसियाओं से जुड़े तमाम लोग अपनी-अपनी कलीसिया की चारदीवारी के अंदर सिमट कर दूसरों से प्रेम नहीं करने की हठधर्मिता के शिकार हैं। प्रेम इतना क्षत-विक्षत क्यों है? क्या यह धर्म ग्रंथ में नहीं लिखा है :
यह इसलिए हुआ कि धर्म ग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाए- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोड़ी जाएगी; योहन 19 : 20
फिर उसकी (ईसा मसीह की) कौन-कौन सी हड्डियां तोड़-मरोड़ कर, प्रेम (ईश्वर) को क्षत-विक्षत कर हम लोगों ने संसार में अलग-अलग अपना-अपना कलीसिया का खड़ा किया है? ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाने वाले खूंखार डाकूओ ने, ना तो उनकी हड्डियां ही तोड़ी और ना ही उनके कुरते को फाड़ डाला! फिर किसने हमें प्रेम को खंडित करने का, टुकड़ों में बांटने का अधिकार दिया है? क्या हम उन डाकुओं से भी गए गुजरे नहीं हैं?
यदि कोई सचमुच में एकमात्र ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया, जिसके कोने का स्तंभ ईसा मसीह हैं, का सहभागी होना चाहता हैं, तो आज ही पूरी तरह से असत्य त्याग कर, सत्य में समर्पित हो जाएं और प्रेम का बंद दरवाजा खोल दे। यही पिता ईश्वर चाहते हैं और यही ईसा मसीह एवं ईसा मसीह के तमाम शिष्यों, तमाम नबियों और प्रभु भक्तों की शिक्षा रही है। धार्मिकता न ही प्रदर्शन की बात है और न ही किसी प्रकार के दिखावे की बात है, बल्कि धार्मिकता तो ईश्वर और मनुष्य के बीच का अदृश्य सत्य के सीमेंट से जुड़ा पवित्र संबंध है; और धार्मिकता पाना हर व्यक्ति का व्यक्तिगत कर्तव्य। धार्मिकता न किसी व्यक्ति विशेष की विरासत या जागीरदारी या बपौती है और न खैरात में ही दी जा सकती है। हां! धार्मिकता, ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार जरुर समझाई और सिखलाई जा सकती है।
आईये,
हम सब के सब जहां कहीं भी है, जिस किसी भी कलीसिया या संगठन में है, अपनी हठधर्मिता (स्वार्थ घमंड लालच भेदभाव घृणा दोषारोपण चुगल खोरी............) पूरी तरह से छोड़ कर, प्रेम का बंद दरवाजा खोलकर और सत्य में अपना जीवन पूर्णतः समर्पित कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया के सहभागी बन जाएं। इसी में हमारा कल्याण है; इसी में शांति है; इसी में एकता है। तब संसार में दिखने वाला हमारा संगठन / कलीसिया ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया / संगठन का प्रतिबिंब होगा जहां प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय फलेगा-फूलेगा; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जाएंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। योहन 13 : 35
नहीं तो, तू तू मैं मैं, तेरा कलीसिया मेरा कलीसिया, घृणा, लालच, स्वार्थ, घमंड, भेदभाव, फूट की जिंदगी के बीच हम शांति ढूंढते रह जाएंगे और शांति हमें कभी नसीब नहीं होगा, जैसे कि आज हमारी स्थिति है। प्रभु ईश्वर के एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया रूपी संगठन के सदस्यों के बारे जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
देखो, एक राजा धार्मिकता से राज्य करेगा
और शासक न्याय से शासन करेंगे।
उन में से प्रत्येक आंधी से आश्रय-जैसा होगा,
तूफान से शरणस्थान-जैसा,
मरुभूमि में जलधारा-जैसा,
संतप्त प्रदेश में बड़ी चट्टान की छाया-जैसा।
तब देखने वाले अपनी आंखें बंद नहीं करेंगे
और सुनने वालों के कान ध्यान से सुनेंगे।
अविवेकी लोग में सद्बुद्धि आएगी
और हकलाने वाली जीभ धारा प्रवाह बोलेगी।
तब मूर्ख का सम्मान नहीं किया जाएगा
और धूर्त की प्रतिष्ठा नहीं होगी;
क्योंकि मूर्ख निरर्थक बातें कहता
और अपने मन में बुराई की बात सोचता है।
वह अधर्म का आचरण करता
और प्रभु की निंदा करता है।
वह भूखों की भूख दूर नहीं करता
और प्यासे को पानी नहीं पिलाता।
धूर्त की कार्यप्रणाली कपटपूर्ण है।
वह ऐसी दुष्ट योजनाएं बनाता है
कि जब दरिद्र अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं,
तो झूठी बातों द्वारा उनका विनाश हो जाता है;
किंतु सहृदय मनुष्य उच्च योजनाएं बनाता
और उन्हें कार्यान्वित भी करता है। नबी इसायाह 32 : 1-8
जो ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का सदस्य बनेगा, उसके यहां से प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय की अविरल संजीवन धारा बह निकलेगी; और उसके संपर्क में आने वाले बहुत सारे लोग सत्य में फूलेंगे-फूलेंगे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यह नदी जहां कहीं गुजरती है, वहां पृथ्वी पर विचरने वाले प्राणियों को जीवन प्रदान करती है। वहां बहुत-सी मछलियां पाई जाएंगी, क्योंकि यह धारा समुद्र का पानी मीठा कर देती है और जहां कहीं भी पहुंचती है, जीवन प्रदान करती है। नबी एजेकिएल 47 : 9
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!