RIGHTEOUSNESS

अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन

प्रकाशित 04/05/2020


ईसा मसीह स्वयं सत्य में समर्पित जीवन जी कर इस संसार में ईश्वर में निवास करते रहे; और ईश्वर, ईसा मसीह में। यही अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) है जो ईसा मसीह के आचरण एवं वचनों से स्पष्ट होता है। वे कहा करते थे कि मैं पिता में हूं और पिता मुझ में। इस प्रकार ईसा मसीह ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन जिसे उन्होंने कलीसिया कहा है, के कोने के पत्थर (स्तंभ) हैं। ईसा मसीह लोगों से सत्य में समर्पित हो कर अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के सदस्य (चट्टान) बनने का आह्वान किया करते हैं। स्मरण रहे कि सब कुछ (असत्य) छोड़े बिना और सत्य में समर्पित हुए बिना, ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) का सदस्य नहीं बना जा सकता है। इस तरह से ईसा मसीह का जीवन सत्य की सेवा, ईश्वर की सेवा में समर्पित था; और वे चाहते थे कि लोग भी सत्य की सेवा, ईश्वर की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दें। इसलिए ईसा मसीह कहा करते थे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।" मती 20 : 28


ईसा मसीह ने ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के निर्माण का सेवा कार्य करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे लोगों को पूरी तरह से असत्य छोड़कर सत्य में, ईश्वर की सेवा में समर्पित कर देना चाहते हैं; और संगठन को विशाल रूप देना चाहते हैं, जैसे मधुमक्खियां रानी मधुमक्खी के इर्द-गिर्द अपने छत्ते को विशाल बनाने का निरंतर प्रयत्न करती रहती हैं। ईसा मसीह चाहते हैं कि जिस प्रकार से रानी मक्खियां छत्ते का निरंतर निर्माण मे लगी रहती हैं, ठीक उसी प्रकार से अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के निर्माण कार्य में उसके सभी सदस्य (चट्टान) ईसा मसीह के साथ निरंतर लगे रहें- स्वयं सत्य में गतिशील रहकर और दूसरों को सत्य में समर्पित होने की शिक्षा देकर। यही सेवा का कार्य है क्योंकि सत्य में चलने वाला दूसरों को दुख दर्द नहीं देता है, बल्कि दूसरों से प्यार कर दुख दर्द हर लेता है। इसलिए ईसा मसीह कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


और जो तुम में प्रधान होना चाहता है वह तुम्हारा दास बने। मती 20 : 27


इससे यह प्रमाणित होता है कि ईश्वर का अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) ईट पत्थरों का नहीं, बल्कि सत्य को समर्पित, ईश्वर द्वारा अभिषिक्त लोगों का है, जो मधुमक्खियों की तरह निस्वार्थ सेवा में निरंतर लगे हुए हैं ताकि लोगों को असत्य के अत्याचार से बचाया जा सके। जो स्वयं असत्य करता है, वह दूसरों को असत्य के अत्याचार से कैसे से बचा सकता है? इसलिए संसार के संगठनों के बारे में ईसा मसीह कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, "तुम जानते हो कि संसार के अधिपति अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी लोगों पर अधिकार जताते हैं। तुममें ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने। मती 25 : 26


ईसा मसीह का उपरोक्त कथन बिल्कुल सही है क्योंकि संसार के संगठन में तो संगठन के लोगों के बीच तो खींचतान, बड़ा-छोटा, उठापटक, मनमुटाव, पोस्ट, घमंड, पावर, भेदभाव, स्वार्थ, गुस्सा, दोषारोपण, कानाफूसी, बदले की भावना, चापलूसी, ................ होता ही है। फिर संसार का संगठन, जहां इस प्रकार का असत्य व्याप्त है, कैसे ईश्वर का धार्मिक संगठन हो सकता है? ऐसा ईट पत्थरों का संसार का संगठन कैसे ईश्वर का धार्मिक संगठन हो सकता है? क्या लोग अपने संसार के संगठन की तारीफ और दूसरों के संगठन को नीचा दिखाने का अवसर नहीं ढूंढते हैं? ऐसा करने से क्या वे कभी चूकते हैं? क्या ईश्वर को दोषारोपण पक्षपात भेदभाव लांछन चुगल खोरी कानाफूसी मुंहफुली दूसरों को दबाना हड़काना पोस्ट पावर का दुरुपयोग घमंड स्वार्थ ........ पसंद है? ईसा मसीह कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


अपने स्वर्गीय पिता जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा। किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जाएगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जाएगी। दो और तुम्हें भी दिया जाएगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जाएगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा।" लूकस 6 : 36-38


अब आप ही विचार करें कि संसार में ईट पत्थरों के संगठनों की दशा कैसी है? क्या तू तू मैं मैं के बीच फंसे, संसार के संगठन के लोग इस दशा में ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के सहभागी हो सकते हैं? संसार का हर संगठन तो ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का प्रतिबिंब होना चाहिए; जहां धार्मिकता की झलक हर वक्त दिखलाई पड़े। यही कारण है कि ईसा मसीह कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जब तुम बेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहे हो और तुम्हें वहां याद आए कि मेरे भाई को मुझसे कोई शिकायत है, तो अपनी भेंट वहीं बेदी के सामने छोड़ कर पहले अपने भाई से मेल करने जाओ और तब आ कर अपनी भेंट चढ़ाओ। मती 5 : 23-24


ईसा मसीह का इशारा साफ है कि पहले अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का हिस्सा बनो, फिर संसार के संगठन का हिस्सा बनना; क्योंकि संगठन का काम सिर्फ और सिर्फ सेवा करने का होना चाहिए, ना कि सेवा कराने का। सत्य के सेवा कार्य के लिए ईश्वर को सच्चे सेवकों की आवश्यकता है ताकि असत्य में फंसे लोगों को सत्य की शिक्षा देकर छुड़ाया जा सके। इसलिए ईसा मसीह अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के अभिषिक्त लोगों से यानी अपने शिष्यों से कहते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


उन्होंने उनसे कहा, "फसल तो बहुत है, परंतु मजदूर थोड़े हैं; इसलिए फसल के मालिक से विनती करो कि वह अपनी फसल काटने के लिए मजदूरों को भेजे। जाओ, मैं तुम्हें भेड़ियों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूं। लूकस 10 : 2-3


असत्य को त्याग कर ही सत्य की मजदूरी की जा सकती है। हाल यह है कि जिन्हें सत्य की मजदूरी करनी है, वे तो स्वयं संसार के संगठनों की चारदीवारी में फंसकर असत्य को समर्पित हैं। इसलिए ईसा मसीह ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन के सदस्यों को असत्य में फंसे, संसार के लोगों के बीच सत्य में समर्पित होने की शिक्षा देने के लिए भेजते हैं ताकि उनमें से जो शिक्षा ग्रहण कर सत्य को समर्पित होगा वह ईश्वर का सेवक, ईश्वर का मजदूर, ईश्वर का अभिषिक्त कहलाएगा और सत्य की सेवा में गतिशील हो जाएगा यानी अपना प्राण अर्पित कर देगा।


इसलिए,


हम सब सत्य के सेवार्थ असत्य को पूरी तरह से त्याग कर सत्य को समर्पित हो जाएं। और सबसे पहले, सब कुछ छोड़ कर प्रभु के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) के निर्माण का सहभागी बने। तब हम उनके आदेश पा कर उनकी इच्छा के अनुसार निडर होकर सत्य की सेवा कर पाएंगे जैसा कि ईसा मसीह के शिष्यों ने किया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


भला गड़ेरिया मैं हूं। जिस तरह पिता मुझे जानता है और मैं पिता को जानता हूं, उसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूं और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं। मैं भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता हूं। मेरी और भी भेड़ें हैं जो इस भेड़शाला की नहीं हैं। मुझे उन्हें भी ले आना है। वह मेरी आवाज सुनेंगी। तब एक ही झुंड होगा और एक ही गड़ेरिया। योहन 10 : 14-16


यह एक ऐसा अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन है, जहां लोगों ने सत्य की सेवा में ईसा मसीह की तरह अपना जीवन अर्पित कर दिया है इसलिए वे सब के सब ईश्वर की नजर में एकदम बराबर हैं। यदि इस अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य बनना है, तो असत्य में बिल्कुल नग्नय हो जाना होगा। जैसे कि नबी का संदेश है-


क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है।
उसने मुझे भेजा है कि मैं
दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊं,
दु:खियों को ढांढस बंधाऊं;
बंदियों को छुटकारे का
और कैदियों को मुक्ति का संदेश सुनाऊं;
प्रभु के अनुग्रह का वर्ष
और ईश्वर के प्रतिशोध का दिन घोषित करुं;
विलाप करने वालों को सांत्वना दूं,
राख के बदले उन्हें मुकुट पहनाऊं,
शोक-वस्त्रों के बदले आनंद का तेल प्रदान करुं
और निराशा के बदले स्तुति की चादर ओढ़ाऊं।
उनका यह नाम रखा जाएगा :
"सदाचार के बलूत, प्रभु की महिमा प्रकट करने वाला उद्यान"। नबी इसायाह 61 : 1-3


आइए,


हम जहां भी हैं जिस भी संगठन में हैं जिस भी कलीसिया में हैं, पहले प्रभु के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन (कलीसिया) का सदस्य बन जाएं। प्रभु का आत्मा हमारे शरीर रूपी मंदिर के आत्मा रूपी बेदी से अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का पवित्र निर्माण कार्य, हमें अपना संसाधन बनाकर खुद-ब-खुद कर लेगा।


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!