RIGHTEOUSNESS

धार्मिकता ईश्वर का मान सम्मान।

प्रकाशित 03/05/2020


मनुष्य ईश्वर की महिमा और मान-सम्मान करने के लिए गढ़े गए हैं। इस संसार में और इस संसार के बाद, स्वर्ग में अनंत काल तक के लिए। ईसा मसीह अपनी शिक्षा के अनुरूप स्वयं सत्य को समर्पित जीवन जी कर इस संसार में निरंतर ईश्वर की महिमा और मान सम्मान बढ़ाते रहे; इसलिए मृत्यु से ठीक पहले उन्होंने ईश्वर की अनंत कालीन महिमा और मान सम्मान के लिए सत्य और पवित्रता से परिपूर्ण अपनी आत्मा को ईश्वर के हाथों सौंप दिए। ऐसा पवित्र जीवन जी कर ईसा मसीह अपनी शिक्षा को प्रमाणित कर मानव जाति के लिए बेशकीमती उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। उनकी शिक्षा के बारे में लोग अचंभित हुआ करते थे और सोचते थे कि उन्हें यह ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ। क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है! धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मेरी शिक्षा मेरी नहीं है। यह उसकी शिक्षा है, जिसने मुझे भेजा। यदि कोई उसकी इच्छा पूरी करने का संकल्प करेगा, तो वह यह जान जाएगा कि मेरी शिक्षा ईश्वर की ओर से है अथवा मैं अपनी ओर से बोलता हूं। जो अपनी ओर से बोलता है वह अपने लिए सम्मान चाहता है; किंतु जो उसके लिए सम्मान चाहता है, जिसने उसे भेजा, वह सच्चा है और उसमें कोई कपट नहीं। योहन 7 : 16-18


ईसा मसीह ने अपने मान सम्मान की खातिर नहीं, बल्कि ईश्वर के मान सम्मान की खातिर अपना जीवन सत्य को समर्पित रखें और दूसरों को अपने जीवन को सत्य को समर्पित करने की ईश्वर की शिक्षा देते रहे, ताकि मानव जाति से ईश्वर का मान सम्मान हो। जो मनुष्य ईसा मसीह की शिक्षा के अनुसार सत्य को समर्पित जीवन जीता है, वह ईश्वर का मान सम्मान इस संसार में बढ़ाता है। ऐसे व्यक्ति के हृदय में ईश्वर विराजमान होते हैं; और उसके हर कार्य एवं बोली वचन में पवित्रता की झलक मिलती है क्योंकि उसका हर कार्य एवं बोली वचन ईश्वर की महिमा को समर्पित होता है। ऐसा व्यक्ति इस संसार में ईश्वर का मान सम्मान बढ़ाता है और उसकी मृत्यु से ठीक पहले ईश्वर उसकी आत्मा को अपनी अनंत कालीन मान सम्मान के लिए स्वर्ग में ग्रहण करते हैं जैसा कि उन्होंने ईसा मसीह की आत्मा को ग्रहण किया।


किसी भी व्यक्ति को अपने मान सम्मान के लिए ईश्वर की शिक्षा का प्रचार नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वर को यह कतई पसंद नहीं है। इसलिए तो ईसा मसीह लोगों से सब कुछ (छल प्रपंच स्वार्थ लोभ लालच ईर्ष्या द्वेष वासना व्यभिचार चुगलखोरी दोषारोपण......... सब कुछ) छोड़कर उनका अनुसरण करने का आह्वान करते हैं। जो व्यक्ति ईश्वर की शिक्षा का प्रचार अपने मान सम्मान, लोभ लालच की पूर्ति, अपने ज्ञान और बुद्धि के दिखावा के लिए करता है, वह पिता ईश्वर के विरूद्ध पाप करता है जिसने उसे इस संसार में भेजा है। ऐसा व्यक्ति सत्य को समर्पित जीवन नहीं जीता है, बल्कि असत्य (दिखावा घमंड लोभ लालच) की ओर झुका हुआ है और उसके कथनी और करनी में आकाश पाताल का अंतर है। ईसा मसीह ऐसे लोगों को धिक्कारते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


सारी जनता सुन रही थी, जब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, शास्त्रियों से सावधान रहो। लंबे लबादे पहनकर टहलने जाना, बाजारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना, सभागृहों में प्रथम आसनों पर और भोजों में प्रथम स्थानों पर विराजमान होना- यह सब उन्हें पसंद है। वे विधवाओं की संपत्ति चट कर जाते और दिखावे के लिए लंबी-लंबी प्रार्थनाएं करते हैं। उन लोगों को बड़ी कठोर दंड आज्ञा मिलेगी। लूकस 20 :45-47


सत्य तो सत्य है; पहले से ही सम्मानित और महिमान्वित है। सत्य को किसी प्रकार की मान-सम्मान या बढ़ावा की जरूरत नहीं है क्योंकि वह सत्य है; वह ईश्वर है। मनुष्यों को चाहिए कि वह अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर का मान सम्मान बढ़ाए। यदि कोई सत्य में समर्पित होता है, तो ईश्वर की नजर में उसका महत्व बढ़ जाता है। लेकिन यदि कोई सत्य में समर्पित हुए बिना, सत्य में समर्पित होने का दिखावा करता है, तो वह ईश्वर की दण्डाज्ञा के काबिल हो जाता है। दण्डाज्ञा की चर्चा विस्तार से कल के लेख में पढ़ सकते हैं। ऐसे लोगों से प्रभु बहुत नाराज होते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


धिक्कार तुम्हें, जब सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं! उनके पूर्वज झूठे नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे। लूकस 6 : 26


ईसा मसीह जिस प्रकार से अपनी ओर से कुछ नहीं बोलते थे, उसी तरह वे अपनी ओर से कुछ भी नहीं करते थे। वे उतना ही बोलते और करते थे, जितना कि उन्हें इस संसार में भेजने वाले ईश्वर की इच्छा होती। उनके सत्य में समर्पित जीवन के कारण ही उनके हृदय में उपस्थित ईश्वर या कहिए सत्य की आत्मा या कहिए पवित्र आत्मा उनके शरीर और आत्मा के माध्यम से अपना ईश्वरीय कार्य पूरा कर पाती। यही कारण है कि ईसा मसीह का होना करना एवं बोलना सब कुछ ईश्वरीय है, सत्य है। यदि कोई मनुष्य चाहता है कि उसका भी होना, करना, बोलना ईश्वरीय हो, सत्य हो और उससे ईश्वर का मान-सम्मान बढ़ें, तो उसे भी ईसा मसीह की तरह सब कुछ (असत्य) छोड़ कर सत्य में समर्पित जीवन जी कर अपने शरीर रूपी मंदिर के आत्मा रूपी वेदी में ईश्वर को सुसज्जित कर शोभायमान कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं कर, अपने मान-सम्मान, लोभ-लालच दिखावे हेतु ईश्वर ईश्वर कह कर ईश्वर का नाम व्यर्थ लेने वाले लोगों के विषय में जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


झूठे नबियों से सावधान रहो। वे भेड़ों के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, किंतु वे भीतर से खूंखार भेड़िए हैं। उनके फलों से तुम उन्हें पहचान जाओगे। क्या लोग कंटीली झाड़ियों से अंगूर या ऊंटकटारों से अंजीर तोड़ते हैं? इस तरह हर अच्छा पेड़ अच्छे फल देता है और बुरा पेड़ बुरा फल देता है। अच्छा पेड़ बुरे फल नहीं दे सकता और ना बुरा पेड़ अच्छे फल। जो पेड़ अच्छा फल नहीं देता, उसे काटा और आग में झोंक दिया जाता है। इसलिए उनके फलों से तुम उन्हें पहचान जाओगे। मती 7 : 15-20


इसलिए


हम मनुष्यों के लिए उचित होगा कि हम सत्य की शिक्षा पर चलकर अपने शरीर रूपी मंदिर के हृदय रूपी वेदी पर सत्य को ईश्वर को सुसज्जित कर शोभायमान कर लें ताकि हमारा शरीर और आत्मा ईश्वर की इच्छा के अनुसार ईश्वर के उपयोग का साधन बन जाए। मानव इच्छा और ईश्वर की इच्छा में जमीन आसमान का अंतर है इसलिए मानव को ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य की शिक्षा के अनुसार सत्य को समर्पित हो जाना चाहिए। धर्म ग्रंथ में लिखा है :


प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं है और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। नबी इसायाह 55 : 8


आईए,


ईश्वर के रेड कारपेट (लाल कालीन) स्वागत में सत्य को समर्पित हो जाएं और ईश्वर की पवित्र इच्छा और कार्य के लिए संसाधन बन जाए। ईश्वर को आज ईसा मसीह के समान इस संसार में उनकी पवित्र इच्छा और पवित्र कार्य के लिए सिर्फ एक व्यक्ति चाहिए। क्या आप अपने आप को सत्य को समर्पित करेंगे? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


वे 'पवित्र प्रजा' और 'प्रभु के मुक्ति प्राप्त लोग' कहलाएंगे और तेरा नाम 'परमप्रिय' तथा 'अपरित्यक्त नगरी' रखा जाएगा। नबी इसायाह 62 : 12


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!