RIGHTEOUSNESS

पाप धार्मिकता और दण्डाज्ञा

प्रकाशित 02/05/2020


पाप धार्मिकता और दण्डाज्ञा के बारे में ईश्वर और सत्य का आत्मा को पूर्ण ज्ञान है। वही इन तीनों विषयों के पीछे छिपे भेद का खुलासा कर मानव जाति को इसके अज्ञानता और भ्रम से निकाल सकता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जब वह आएगा, तो पाप धार्मिकता और दण्डाज्ञा के विषय में संसार का भ्रम प्रमाणित कर देगा- पाप के विषय में, क्योंकि वह मुझ में विश्वास नहीं करते; धार्मिकता के विषय में, क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूं और तुम मुझे नहीं देखोगे; दण्डाज्ञा के विषय में, क्योंकि संसार का नायक दोषी ठहराया जा चुका है। योहन 16 :8-11


(1) पाप के विषय में, क्योंकि वह मुझ में विश्वास नहीं करते –


जो सचमुच ईश्वर में विश्वास करता है, वह निश्चित ही ईश्वर से प्रेम करता है और अपने शरीर रूपी मंदिर की आत्मा रूपी बेदी में ईश्वर को सुशोभित कर शोभायमान करता है। विश्वास, ईश्वर के प्रति मानव प्रेम का प्रतीक है। जो व्यक्ति ईश्वर में जितना विश्वास करता है वह ईश्वर से उतना ही प्रेम करता है और ईश्वर के प्रेम में उतना ही ढृढ होता जाता है। ईश्वर में विश्वास करना, ईश्वर के प्रेम की पराकाष्ठा को छूना है। यदि कोई कहता है, मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं लेकिन वह ईश्वर से प्रेम नहीं करता है, तो उसका विश्वास, विश्वास नहीं, अविश्वास है। और यदि कोई ईश्वर में विश्वास ही नहीं करता है, तो वह भी अविश्वासी है। ईश्वर में विश्वास करना, ईश्वर से प्रेम करना है; और ईश्वर से प्रेम करने के कारण उनकी शिक्षा का पालन करना है। ईश्वर की शिक्षा तो सत्य में समर्पित होने का आदेश है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


तू सत्य की सेवा में उन्हें समर्पित कर। तेरी शिक्षा ही सत्य है। योहन 17 : 17


क्योंकि ईश्वर सत्य, सत्यप्रिय और सत्यप्रतिज्ञा हैं; जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता है, वह सत्य में कैसे विश्वास कर सकता है? और जो सत्य में विश्वास नहीं करता, वह कैसे सत्य कर सकता है? जो सत्य नहीं करता, वह असत्य करता है, वह पाप करता है। ईश्वर सत्य प्रिय हैं, वे असत्य से घृणा करते हैं; इसलिए जो पाप करता है, वह ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सहभागी नहीं हो सकता है। पाप से मुक्ति का, पश्चाताप ही एकमात्र उपाय है। पाप को बड़ा या छोटा कर नहीं आकना चाहिए क्योंकि पाप मनुष्य को ईश्वर से दूर करता है; चाहे कुकर्म कितना भी छोटा क्यों ना हो! ईसा मसीह कहते हैं कि यदि कोई छोटी से छोटी बातो में ईमानदार नहीं हो सकता, तो वह बड़ी बातों में ईमानदार कैसे हो सकता है!? इसलिए छोटे से लेकर बड़े हर पाप को त्यागना है और हर पाप के लिए विलाप करना जरूरी है। जो अपने आप को यह कह कर संतुष्ट करता है कि मैं तो थोड़ा सा गलती किया हूं; और ऐसा सोचकर कैजुअल हो जाता और पशचताप नहीं करता है, वह ईश्वर से थोड़ा सा दूर हो ही जाता है। ईसा मसीह के क्रूस के दोनों ओर दो डाकू क्रूस पर टंगे थे। अपनी करनी पर पश्चाताप करने वाला डाकू, ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सहभागी हुआ, जबकि दूसरा उसी हाल में छोड़ दिया गया क्योंकि वह अपने जीवन के अंतिम घड़ी में भी ईश्वर को ललकार रहा था, पाप कर रहा था; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं तुमसे कहता हूं, ऐसा नहीं है; लेकिन यदि तुम पशचताप नहीं करोगे तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे। लूकस 13 : 3 और 5


ईश्वर को असत्य से घृणा है, पाप से घृणा है, हालांकि वे पापी से फिर भी उतना ही प्रेम करते हैं, जितना कि माता के गर्भ में रचने से पहले उसे प्यार करते हैं; इसलिए ईसा मसीह पाप में फंसे लोगों से पशचताप करने आह्वान करते हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझसे सीखो। मैं स्वाभाव से नम्र और विनीत हूं। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शांति पाओगे, क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का। मती 11 : 28-30


ईसा मसीही कभी कोई पाप नहीं किए इसलिए उनकी आत्मा में किसी प्रकार का असत्य का बोझ या जूआ नहीं है। असत्य रहित होने के कारण ईसा मसीह स्वभाव से बिल्कुल ही नम्र और विनीत हैं। हमें भी असत्य को त्याग कर प्रभु ईसा मसीह के स्वभाव के समान अपने आपको नम्र और विनीत बनाना है। सत्य में झुका हुआ और असत्य के लिए कड़क।


(2) धार्मिकता के बिषय में, क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूं और तुम मुझे नहीं देखोगे-


ईसा मसीह पाप रहित जीवन जी कर, धार्मिकता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किए हैं और इस संसार में जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का कोने का पत्थर (स्तंभ) साबित हुए। यह इस बात से प्रमाणित होता है कि उन्होंने प्राण त्यागने से पहले सत्य से परिपूर्ण अपनी आत्मा को ईश्वर के हाथों सौंप दिए। कोई भी व्यक्ति ईश्वर से संयुक्त हो कर ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का अभिषिक्त चट्टान हो सकता है; एक ऐसा चट्टान जो अपने इर्द-गिर्द के तमाम अभिषिक्त चट्टानों के साथ सत्य रुपी सीमेंट से आपस में जुड़े हैं। शैतान के हर असत्य के प्रपंचों जैसे छल प्रपंच लोभ लालच ईषय द्वेष क्रोध वासना व्यभिचार.......... इत्यादि को पूरी तरह छोड़ कर सत्य को समर्पित होना ही धार्मिक संगठन का चट्टान बनना है। ऐसा चट्टान जो ईश्वर के प्रेम में इतना ढृढ है कि किसी प्रकार का असत्य उसे एक सुत भी हिला नहीं सकता; असत्य के लिए कड़क। ईश्वर के अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन, जिसके कोने का स्तंभ स्वयं ईसा मसीह हैं, का चट्टान बनना जरूर असंभव सा प्रतीत होता है; लेकिन सच पूछिए तो बिल्कुल असंभव नहीं है, मुश्किल जरूर है। बिना परिश्रम के फल की आशा नहीं करनी चाहिए। ईसा मसीह इस संसार में बिल्कुल हम जैसे हाड मांस के ही थे। फिर भी वे ईश्वर से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना प्रेम ईश्वर उनसे करते हैं। इसलिए ईसा मसीह सत्य को समर्पित जीवन जी कर ईश्वर के प्रेम में संगठित रहें। ईश्वर भी मानव जाति से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना प्रेम वे ईसा मसीह से करते हैं। क्या हम मनुष्यों को ईसा मसीह के समान सत्य में समर्पित जीवन जी कर ईश्वर के प्रेम में संगठित नहीं होना चाहिए? जैसा कि ईश्वर की शिक्षा ही सत्य है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


जिस प्रकार पिता ने मुझको प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम में ढृढ बने रहो। यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में ढृढ बना रहता हूं। योहन 15 : 9-10


अब आप ही बताइए कि यदि कोई अपना मां बाप घर द्वार सब कुछ छोड़ दे, लेकिन असत्य करना ना छोड़े, तो क्या वह ईश्वर से संयुक्त हो पाएगा? क्या वह ईश्वर का अभिषिक्त कहलायेगा? क्या ईश्वर का आदेश- सत्य करने का और असत्य को त्यागने का नहीं है? क्या सत्य, असत्य से कभी संयुक्त हो सकता है? जो ईश्वर का आदेश मानता है, वह सिर्फ सत्य करता है; और जो सत्य करता है, वह सत्य से संयुक्त होता है; वही ईश्वर से संयुक्त होता है; और उसकी आत्मा में सत्य की आत्मा वास करती है। ऐसा ही व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की नजर में धार्मिक होता है; और उसे ईश्वर का अभिषेक प्राप्त होता है। ईश्वर की नजर में धार्मिक बन कर ईश्वर का अभिषेक प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। असत्य से लबालब संसार, तो प्रत्येक मनुष्य से बैर करता है क्योंकि हम असत्य के लिए नहीं गढ़े गए हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैंने उन्हें तेरी शिक्षा प्रदान की है। संसार ने उनसे बैर किया, क्योंकि जिस तरह मैं संसार का नहीं हूं, उसी तरह वे भी संसार के नहीं हैं। योहन 17 : 14


शैतान तो असत्य का राजा है। वह कभी स्वर्ग नहीं जा सकता है इसलिए वह मनुष्य से बैर करता है; और कतई नहीं चाहता कि मनुष्य धार्मिकता को प्राप्त कर ईसा मसीह की तरह स्वर्ग पहुंच कर ईश्वर का दर्शन करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है। मती 5 : 10


ईसा मसीह की पिता ईश्वर से प्रार्थना रही है कि शैतान (असत्य) का अत्याचार, सत्य की शिक्षा का पालन करते हुए धार्मिकता प्राप्ति की दिशा में गतिशील मनुष्यों की राह में बाधा ना बने। इसलिए मनुष्यों को असत्य से नहीं, बल्कि सत्य से डरना चाहिए; ईश्वर से डरना चाहिए क्योंकि ईश्वर के पास मनुष्यों को नरक में भी डालने का अधिकार है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सत्य में समर्पित रहे और उसकी धार्मिकता बनी रहे। अंतिम दिन वह ईसा मसीह के समान ईश्वर के समक्ष धार्मिक पाया जाए और उसकी आत्मा सत्य से परिपूर्ण पाई जाए; जिसका प्यासा हमारे एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर हैं। हम खाली हाथ नहीं, बल्कि सत्य से भरे अपनी आत्मा के साथ आए हैं; वही सत्य से भरा आत्मा हमें ईसा मसीह के समान ईश्वर के हाथों में सौंपना है। मैं प्यासा हूं! ईश्वर हमारी आत्मा के प्यासे हैं। उनकी प्यास कड़वाहट से भरे ह्रदय से नहीं, बल्कि विनम्र और विनीत हृदय से बुझेगी; जहां दूर-दूर तक असत्य का नामो-निशान ना हो।


(3) दण्डाज्ञा के विषय में, क्योंकि इस संसार का नायक दोषी ठहराया जा चुका है-


मनुष्य को असत्य करवाने वाला कोई दूसरा नहीं, बल्कि शैतान है। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य अपनी धार्मिकता के कारण ईश्वर की आराधना करें या ईश्वर की आराधना करते हुए धार्मिकता में बढ़ता जाए, बल्कि वह चाहता है कि मनुष्य असत्य कर उसकी आराधना करें। शैतान की नीचता इसी से प्रकट होती है कि उसने ईसा मसीह को झुकाकर अपना दंडवत करवाने का बेहूदा और बेतुका प्रयास किया था। क्या सत्य, असत्य का नमन कर सकता है? ना! कभी नहीं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


उसने उत्तर दिया, "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने सामान प्यार करो।" लूकस 10 : 27


क्योंकि शैतान ने अपना सारा ह्रदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि ईश्वर के विरूद्ध झोका दिया है इसलिए उसका पाप इतना बड़ा है कि वह माफी के लायक नहीं है; और वह ईश्वर के द्वारा दोषी ठहराया जा चुका है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


दण्डाज्ञा के विषय में, क्योंकि इस संसार का नायक दोषी ठहराया जा चुका है। योहन 16 : 11


जितना प्रेम ईश्वर ईसा मसीह से करते हैं, उतना ही प्रेम ईश्वर मानव जाति से भी करते हैं इसलिए जिस दण्डाज्ञा के द्वारा शैतान दोषी ठहराया जा चुका है, वैसा दण्डाज्ञा जारी कर ईश्वर मानव जाति को दोषी ठहराना नहीं चाहते हैं। यही कारण है कि ईश्वर ने ईसा मसीह को इस संसार में भेजकर वैसे भयंकर दण्डाज्ञा के कोप से मानव जाति को बचने की शिक्षा दिए हैं। अपने एकमात्र सृष्टिकर्ता ईश्वर को छोड़ और किसी और की आराधना करने की मनाही है। ईसा मसीह ने भी असत्य से परिपूर्ण शैतान का दंडवत कर उसकी आराधना नहीं किए, बल्कि अपने सत्य का आत्मा से उसे डांट कर दूर कर दिया। वह उनकी डांट सुनकर दूर हट गया; असत्य के लिए कड़क। सत्य का नमन ही ईश्वर का नमन है। संसार का नायक, शैतान तो मनुष्य को असत्य का नमन कराने पर तुला हुआ है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मैं उनके लिए विनती करता हूं। मैं संसार के लिए नहीं, बल्कि उनके लिए विनती करता हूं, जिन्हें तूने मुझे सौंपा है; क्योंकि वे तेरे ही हैं। जो कुछ मेरा है, वह तेरा है और जो तेरा, वह मेरा है। मैं उनके द्वारा महिमान्वित हुआ। योहन 17 : 9-10


धार्मिकता मनुष्य को दण्डाज्ञा से बचाती है। मनुष्यों की धार्मिकता ईश्वर को महिमान्वित करती है। ईसा मसीह की शिक्षा पाकर बहुत सारे लोग सत्य को समर्पित हुए और अपनी धार्मिकता से ईश्वर की महिमा बढ़ाए; इसलिए ईसा मसीह उनकी धार्मिकता की रक्षा के लिए पिता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं क्योंकि जो लोग उनके हैं, वह संसार (असत्य) के नहीं हैं; इसलिए वे ईश्वर के हैं। यदि कोई धार्मिकता को प्राप्त करता है, तो वह ईश्वर के द्वारा ईसा मसीह की इस प्रार्थना के कारण असत्य से बचाया जाता है। जो असत्य से बचना चाहता है, उसे ईश्वर बचा लेता है। हमें भी चाहिए कि हम खुद सत्य को समर्पित जीवन जी कर ईश्वर की दण्डाज्ञा से बचें और ईसा मसीह के प्रार्थना के काबिल बनें।


मनुष्य की आत्मा ही अनंतकाल तक ईश्वर की महिमा करने के लिए बनाई गई है। यदि मनुष्य की आत्मा महिमा-महिमा बोल सकती है, तो उचित होगा की वह शरीर द्वारा संपन्न गुनाहों के लिए सबसे पहले माफी मांगे क्योंकि पश्चताप हृदय की सच्चाई का प्रतीक है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


मेरा पश्चताप ही मेरा बलिदान होगा। तू पश्चतापी दीन-हीन ह्रदय का तिरस्कार नहीं करेगा। स्तोत्र 51 : 19


अर्थात मानव शरीर को पाप की प्रवृति से दूर रखने पर ही, ह्रदय से पश्चाताप किया जा सकता है। यानी आत्मा ही पश्चाताप करता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि शरीरधारी मनुष्यों की आत्मा और पाप की दशा में प्राण त्याग चुके मनुष्यों की आत्मा, दोनों तरह की आत्माओं को पश्चाताप करना जरूरी है ताकि दण्डाज्ञा के कोप से बचा जा सके; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


यही कारण है कि मृतकों को भी सुसमाचार सुनाया गया, जिससे यद्यपि वे शरीर में मनुष्यों की तरह दंडित हो चुके हैं, फिर भी आत्मा के द्वारा ईश्वर के अनुरूप जीवन प्राप्त करें। पेत्रुस का पहला पत्र 4 : 6


इसलिए प्रभु शरीरधारी मनुष्यों और पाप की स्थिति में प्राण त्याग चुके मनुष्यों के पश्चतापी हृदय का बेसबरी से इंतजार करते हैं। इतना जान लीजिए कि ईश्वर के लिए कोई कार्य संभव नहीं है। हम सब ईश्वर के हैं; सत्य के हैं और ईश्वर हम में से एक का भी विनाश नहीं चाहते‌‌ हैं, बर्शते हम जानबूझकर विनाश को ना चुने।


आईये,


हम सब असत्य त्याग कर और ईसा मसीह की सत्य की शिक्षा का ह्रदय से पालन कर धार्मिकता को हासिल करें और ईश्वर की दण्डाज्ञा से बचें।


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!