MARRIAGE

उपसंहार

प्रकाशित 02/07/2020


परिवार एक धार्मिक संगठन है। जिसकी पवित्रता को बनाये रखने के लिए, पति-पत्नी को एक दूसरे से बिल्कुल अपने समान प्यार करना जरूरी है क्योंकि धर्म ग्रंथ बतलाता है कि वे दो नहीं, बल्कि एक ही शरीर हैं। इसलिए, न ही पति को और न ही पत्नी को परिवारिक अशांति या अपने परिवार के टूटने का कारण बनना चाहिए। दूसरा कि ईश्वर ने पति-पत्नी को विवाह के पवित्र बंधन में बांध कर अपने सृष्टि के पवित्र कार्य में सम्मिलित कर लिया है; इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि सृष्टि के पवित्र कार्य को संपन्न करने के लिए ईश्वर, परिवार के मालिक के रूप परिवार में रहना चाहते हैं। चूँकि प्रत्येक परिवार में प्रभु की असीम उपस्थिति होती है इसलिए किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे परिवारों की ओर ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट, वासना-व्याभिचार अत्यिादि के भाव से भरकर कतई नहीं देखना चाहिए। तीसरा कि पति-पत्नी को सृष्टिकर्ता ईश्वर के सृष्टि के पवित्र कार्य में थोड़ा भी बाधा नहीं पहुँचाना चाहिए, इसलिए गर्भपात, गर्भ-निरोधक उपाय, यहां तक की संयम बरतना भी परिवार में उपस्थित प्रभु पर विश्वास नहीं करना है, जो सृष्टिकर्ता ईश्वर की नजर में अपराध है क्योंकि ऐसा करना ईश्वर की सृष्टि को असंतुलित करना है। चैथा कि ईश्वर अदृश्य हैं; वे माता-पिता के रूप में परिवार में उपस्थित रह कर बच्चों की परवरिश करते हैं इसलिए परिवार में पति-पत्नी को चाहिए कि वे ईसा मसीह की पवित्र जीवनशैली के अनुसार बिल्कुल धार्मिक जीवन जीयें; उनको देख कर उनके बच्चे भी पवित्र जीवनशैली का मर्म समझ जायेंगे और अपने माता-पिता का आदर करेंगे और उन्हें अपना आर्दश बना कर उनके अधीन रह कर अपना शारीरिक और बौद्धिक विकास कर पायेंगे। पाचवां कि परिवार का गठन धार्मिकता के साथ जरूरी है इसलिए संयम बरतें, ग्रह-नक्षत्र, शैतानी ताम-झाम और झाड़-फूँक इत्यिादि से बचें, इंटरनेट में विवाह संबंधी वेबसाइट, सोसल मिडिया, चैट से दूरी बनायें, मोबाईल में आनेवाली तमाम आलतू-फालतू मैसजों को तुरंत मिटा दें। समरण रहे कि पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, सब ईश्वर का है। यदि हम ईश्वर के प्रेम, दया, क्षमा, शांति, करूणा, सहनशीलता, धैर्य और न्याय के अथाह सागर से एक बूंद का सौवां हिस्सा भी अपने परिवार के लिए प्राप्त कर लें, तो हम, हमारा परिवार और हमारी आने वाली पीढ़ियों का जीवन सफल और धन्य हो जायेगा; जैसा कि ध्रर्म ग्रंथ में लिखा है:


किसने सागर का जल अपनी अंजली से मापा
या आकाश का विस्तार अपने वित्ते से निर्धारित किया है?
किसने पृथ्वी की मिट्टी टोकरे में उठायी है?
किसने पर्वत को तुला पर
या पहाड़ियों को तराजू पर तौला है?
किसने प्रभु के मन की थाह ली
या परामर्शदाता के रूप में उसे समझाया है?
प्रभु ने शिक्षा पाने के लिए किस से परामर्श लिया?
किसने प्रभु को न्याय का मार्ग दिखाया?
किसने प्रभु को ज्ञान की शिक्ष दी
या उसे विवेक का मार्ग दिखाया?
निश्चय ही राष्ट्र घड़े में बूँद के सदृश्य हैं।
वे पलड़े पर धूलि के बराबर माने जाते हैं।
प्रभु द्वीपों को रजकण के समान उठा लेता है। नबी इसायाह 40: 13-15


प्रभु तो भला चरवाहा है। हमें इस संसार में शांति-मय जीवन के लिए उन्हें अपने परिवार का मालिक बनान जरूरी है। आईये, हम धार्मिकता में जीवन जीने के लिए अपने और अपने परिवार के सदस्यों को ईसा मसीह की जीवनशैली में ढाल कर ईश्वर का अनुग्रह कमायें और उनकी कृपा प्राप्त करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:


देखो प्रभु-ईश्वर सामथ्र्य के साथ आ रहा है।
वह सब कुछ अपने अधीन कर लेगा
वह अपना पुरस्कार अपने साथ ला रहा है
और उसका विजयोपहार भी उसके साथ है।
वह गड़ेरिये की तरह अपना रेवड़ चराता है।
वह मेमने को उठा कर अपनी छाती से लगा लेता
और दूध पिलाने वाली भेड़े धीरे-धीरे ले चलता है। नबी इसायाह 40: 10-11


आमीन।


ईश्वर की महिमा में जारी.......


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!