प्रकाशित 29/06/2020
विवाह एक अटूट बंधन है। आज भी प्रभु ईश्वर मानवजाति के लिए ठीक उसी प्रकार से विवाह की योजना बनाते हैं और उसका आयोजन करते हैं, जैसे कि उन्होंने आदम के अनजाने में उसकी पसली से हेवा को बना कर , आदम से कहीं दूर उसकी परवरिश कर, आदम-हेवा विवाह का योजना बनाए कर, निश्चित समय आने पर हेवा को आदम के पास ला कर, उन दोनों के विवाह का आयोजन किये थे। प्रभु स्वयं अदृश्य रूप में उस प्रथम विवाह में उपस्थित थे; और आदम के खुशी में शामिल भी। उस समय से प्रभु प्रत्येक विवाह की योजना बनाते रहे हैं, और आयोजन भी करना चाहते हैं। क्या हम ईश्वर की योजना को उनके आयोजन में बदलने देते हैं? या खुद असयंम, संसारिक वासना और व्यभिचार में घिर कर अपने-आप विवाह का योजना बना कर, आयोजन कर देते हैं? क्या आज प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे परिवार टूटे हुए नहीं हैं? क्या प्रभु पविवारों को टूटते-बिखरते देखना पसंद करते हैं? नहीं! बिल्कुल ही नहीं! वे तो प्रथम विवाह के बंधन का पूरा इंतजाम किये हैं; और हम जानते हैं कि शरीरधारी ईसा मसीह के रूप में काना नगर में विवाह के बंधन का पूरा इंतजाम भी किये! जो खुद अपने विवाह का आयोजन नहीं करता है, उसके विवाह का आयोजन ईश्वर करते हैं- इसका उदाहरण काना नगर का विवाह भोज है, जहाँ ईसा मसीह स्वयं उपस्थित हैं क्योंकि उन लोगों ने इस विवाह के आयोजन का जिम्मा ईश्वर पर छोड़ रखा है और वे ईश्वर के संदेश के अनुसार चलायमान है। वे लोग धर्मी हैं; अधर्म नहीं करने वाले; इसलिए ईसा मसीह वहाँ उपस्थित हैं।
क्या आप बिना बुलाए किसी के विवाह भोज मे शामिल होना पसंद करेंगे? नहीं! जरूर आप उनके यहां ही जायेंगे, जिनसे आपका किसी प्रकार का रिश्ता हो। तो फिर ईसा मसीह भी किसी अजनबी (विधर्मी- जो प्रभु के आदेश का पालन नहीं कर, प्रभु को ठुकरा दिया है) के यहां नहीं, बल्कि अपने रिश्तेदार (धर्मी) के यहां अपनी धर्मी माता (रिश्तेदार) के साथ उपस्थित हैं। ईसा मसीह के रिश्तेदारों के बारे धर्म ग्रंथ में लिखा है:
ईसा ने उस से कहा, ”कौन है मेरी माता? कौन है मेरे भाई?” मत्ती 12: 48 उन्होंने उत्तर दिया ”मेरी माता और मेरे भाई वही हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं”। लूकस 8: 21
ईसा मसीह को काना नगर के विवाह भोज में घटी-बढ़ी, सब कुछ ठीक से मालूम हैं क्योंकि वे अपने रिश्तेदार (धर्मी)- जो ईश्वर वचन सुन कर उसका पालन करता है- के यहां विवाह का आयोजन कर रहे हैं; और उनकी मदद करने को तत्पर हैं, जैसे कि हम और आप अपने रश्तिेदारों की मदद को तैयार रहते हैं। यदि उनकी पवित्र माता मरयिम निवेदन नहीं करती, फिर भी वे वहाँ किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने देते। उनकी पवित्र माता मरयिम के निवेदन से यह उजागर हो गया कि पल-पल ईश्वर का है और ईश्वर अपने रिश्तेदारों (धर्मियों) की मदद के लिए सदा तत्पर रहते हैं, समय-असमय नहीं देखते हैं- बस मदद कर देते हैं- क्योंकि वे विवाह के योजनाकार और आयोजक हैं। यदि पवित्र माता मरयिम, ईश्वर की प्रेरणा से ईसा मसीह से वहाँ की घटी पूरा करने का निवेदन नहीं करती, तो अपने श्रद्धालु भक्तों- जो ईश्वर वचन सुन कर उसका पालन करते हुए ईसा मसीह की जीवनशैली के अनुसार जीवन यापन करते हैं- के प्रति ईश्वर की ऐसी असीम कृपा और अनुकंपा कैसे खुल कर सामने आती!
जैसा कि ईश्वर स्वयं व्यक्तिगत तौर पर अपने रिश्तेदोरों के यहाँ उपस्थित हो कर विवाह का आयोजन करते हैं इसलिए वे चाहते हैं कि विवाह के पवित्र बंधन में बंधे- दो शरीर नहीं, बल्कि एक शरीर और एक आत्मा हुए- पति-पत्नी को कोई अलग न करे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।“ मती 19 : 6
ईसा मसीह के इस पवित्र वचन का स्पस्ट मतलब है कि न ही पति को अपने विवाह के पवित्र बंधन के टूटने का कारण बनना चाहिए और न ही पत्नी को अपने विवाह के पवित्र बंधन के टूटने का कारण बनना चाहिए। जब पति-पत्नी दोनों अपने विवाह के करार पर बरकरार रहते हुए एक दूसरे से अपने समान प्यार करेंगे, तो तीसरा कौन उनके बीच प्रवेश कर पायेगा? इसलिए कोई तीसरा (मनुष्य अथवा संसारिक इच्छा जैसे पैसा, रूत्बा, घमंड) नहीं, बल्कि पति-पत्नी ही अपने विवाह के पवित्र बंधन के टूटने के कारण होते हैं।
विचारने वाली बात यह है कि जब किसा का बायां हाथ मनुष्य की अपनी गंदगी की सफाई करता है, तो उसका पूरा शरीर संतुष्ट होता है। दाहिना हाथ, बायें हाथ की अपेक्षा दिन भर ज्यादा काम करने के बावजूद कभी नहीं कुड़कुडाता है और बायें हाथा को कभी भी कम काम का दोषी नहीं मानता है। दोनों के बीच काम की कमाई पर मैंने कभी तू-तू-मैं-मैं नहीं देखी है।
जब पति-पत्नी दो नहीं एक ही शरीर हैं, तो फिर किस बात पर तू-तू-मैं-मैं! क्या पति की कमाई के पूरे हिस्सा पर उसकी पत्नी का उतना ही अधिकार नहीं होना चाहिए, जितना उसके पति का है? क्या पत्नी की कमाई के पूरे हिस्सा पर उसके पति का उतना ही अधिकार नहीं होना चाहिए, जितना उसकी पत्नी का है? क्या एक हाऊस वाईफ अपने धर में कमाई नहीं करती है? कितने पति और पत्नी हैं, जो अपनी कमाई के बारे में कहते हैं कि यह हम दोनों के मेहनत का फल है? क्या दोनों का दिन भर का मिला-जुला मेहनत- दायें और बायें हाथ के मेहनत के समान नहीं हैं? क्या पति, अपने पत्नी के दायें और पत्नी, अपने पति के बायें, स्थान नहीं ग्रहण करते हैं? आईये, इन फालतू तू-तू-मैं-मैं से दूर हो जायें और दो अलग-अलग दिखने वाले अपने एक ही शरीर को कष्ट देना बंद करें; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
इस कारण पुरूष अपने माता पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और *वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।* उत्पति ग्रंथ 2 : 24
इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।“ मती 19 : 6
पति-पत्नी, अपने पवित्र विवाह के कारण अब एक ही शरीर हैं, इसलिए विवाह के पवित्र बंधन के टूटने का कारण न ही पति बने और न ही पत्नी; क्योंकि जब कोई ऐसा करता है, वह अपने पति या पत्नी से ही नहीं, बल्कि विवाह के योजनाकार और आयोजक ईश्वर से भी टूट कर अलग हो जाता है। ऐसे लोगों से प्रभु बहुत नाराज होते है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझमें रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझसे अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यदि कोई मुझमें नहीं रहता, तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं। संत योहन 15: 5-6
पति-पत्नी को ईश्वर में बने रहने का सिर्फ एक उपाय है- एक दूसरे से अपने समान प्यार करते हुए शुद्ध और पवित्र जीवन जीना, जो सिर्फ आत्मत्याग (उपवास और प्रार्थना) की निरंतरता के द्वारा ही संभव है। उपवास और प्रार्थना (आत्मत्याग) ईसा मसीह की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है; जिसकी चर्चा आप मेरे लेखों में पा सकते हैं।
अगले भाग में पढ़िये
विवाह का पवित्र बंधन एवं आधुनिकीकरण
To be continued ……..
आमीन।
ईश्वर की महिमा में जारी.......
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!