MARRIAGE

पवित्र विवाह संस्कार की स्थापना का कारण

प्रकाशित 26/06/2020


ईश्वर ने अपनी सारी पवित्रता के साथ पवित्र विवाह के बंधन की स्थापना की है; जिसके परिणामस्वरूप वे मानव जाति के लिए सर्वोत्तम जीवनशैली की चाहत रखते हैं। उस जीवनशैली पर जीवन व्यतीत करते हुए पति-पत्नी इस संसार में पवित्र एवं सुखमय दामपत्य जीवन यापन कर सकते हैं। इसलिए पवित्र विवाह संस्कार की स्थापना के कारणों को समझना जरूरी है, जो इस प्रकार हैं:


पहला कारण - प्रभु प्रत्येक परिवार रूपी संगठन का एकमात्र मालिक


पवित्र विवाह संस्कार स्थापित कर प्रभु ने न सिर्फ मनुष्य के अकेलेपन को दूर कर दिया, बल्कि एक परिवार रूपी ईकाई कलीसिया (धार्मिक संगठन) का निर्माण कर दिया है, जिसकी दाखलता प्रभु है और डालियाँ, पति-पत्नी और उनसे होने वाले तमाम उनके बाल-बच्चे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:


मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझमें रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझसे अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यदि कोई मुझमें नहीं रहता, तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं। योहन 15: 5-6


दूसरा कारण - पति-पत्नी ईश्वर की सृष्टि के कार्य में सहभागी


जरा सोचिए कि जिस प्रकार से प्रभु ने पृथ्वी की मिट्टी से आदम को बनाया और आदम से मिट्टी (पसली) निकाल कर हेवा को; प्रभु चाहता तो वह आदम और हेवा को गहरी नींद में सुला कर आदम से थोड़ा सा मिट्टी लेता और हेवा से थोड़ा सा मिट्टी लेता फिर दोनों मिट्टी को मिला कर अपने पवित्र हाथों से बच्चा बना कर आदम और हेवा के पास ले आता - और आदम और हेवा एक साथ बोल उठते, ये तो हम दोनों के हड्डियों की हड्डी है और हम के दोनों मांस का मांस। इसका नाम ’बेटा’ होगा, या ’बेटी’ होगी क्योंकि यह तो हम दोनों से निकाली गई है।
लेकिन प्रभु ने ऐसा नहीं किया, बल्कि प्रभु ने पवित्र विवाह संस्कार स्थापित कर पति-पत्नी को अपने सृष्टि को आगे बढ़ाने के अपने पवित्र कार्य में सम्मिलित कर लिया है, ताकि पति-पत्नी किसी भी तरह की वासना-व्याभिचार एवं अशुद्धता से ग्रसित हुए बिना, जिस पवित्रता के साथ प्रभु ने उन्हें अपने पवित्र हाथों से सृष्टि किया है, बिल्कुल उसी पवित्रता के साथ, प्रभु की सृष्टि के पवित्र कार्य में प्रभु का हाथ बटाएँ; ताकि प्रभु की पवित्रता के अनुरूप बाल-बच्चों की उत्पति हो। प्रभु ने पति-पत्नी को अपने सृष्टि का भागीदार बना कर महत्वपूर्ण स्थान दिया है। फिर भी हमें याद रखना चाहिए कि ईश्वर ही सृष्टिकर्ता है जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


माता के गर्भ के गर्भ में रचने से पहले ही
मैंने तुमको जान लिया।
तुम्हारे जन्म से से पहले ही,
मैंने तुमको पवित्र किया।
मैंने तुम को राष्ट्र का नहीं नियुक्त किया। यिरमियाह का ग्रंथ 1 : 5


प्रभु चाहता है कि पति-पत्नी, ईश्वर की पवित्रता के अनुसार सृष्टि के पवित्र कार्य में प्रभु का हाथ बटायें, ताकि जिस पवित्रता से प्रभु ने आदम हेवा को उत्पन्न किया है, उसी पवित्रता के अनुसार प्रभु भावी पीढ़ी को उत्पन्न करे। इसलिए प्रत्येक पति-पत्नी को चाहिए कि वे पाप की दशा में संसर्ग न करें, बल्कि पहले सच्चा पश्चताप कर अपनी आत्मा की शुद्धता को प्राप्त कर लें क्योंकि संसर्ग के समय माता के गढ़ में मनुष्य को गढ़ने वाले सृष्टिकर्ता परम पावन प्रभु ईश्वर की कृपामय उपस्थिति निहायत ही जरूरी है। समरण रहे कि प्रभु पापी के द्वार पर दस्तक देते हैं; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


मैं द्वार के सामने खड़ा हो कर खटखटाता हूँ। यदि कोई मेरी वाणी सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके यहाँ आ कर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ। प्रकाशना ग्रन्थ 3: 20


क्या मनुष्य को अपने दिनचर्य में, द्वार पर उपस्थित प्रभु की सहायता नहीं लेनी चाहिए? जिसे प्रभु का साथ प्राप्त होता है, वह कभी विफल नहीं होता है। यदि आप अपने पारिवारिक जीवन में किसी भी प्रकार से विफल हैं, थोड़ा-सा चिंतन कीजिए। आपकी मदद को, आपके द्वार पर जरूर ईश्वर निश्चित दस्तक दे रहे हैं।


तीसरा कारण - माता के गर्भ में रचे जाने से पहले ही मनुष्य को ईश्वर का आशीर्वाद


नर-नारी की सृष्टि कर ईश्वर उन्हें आशीर्वाद देते हैं; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


ईश्वर ने उन्हे यह कहते हुए आशीर्वाद दिया, “फलो-फूलो। पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुदª की मछलियों, आकाश के पक्षियों और सब जीव-जन्तुओं पर शासन करो।“ उत्पति ग्रंथ 1 : 28


ईश्वर का यह वचन, परिवार रूपी कलीसिया (धार्मिक संगठन) के लिए तीन मूल सांसारिक जरूरतों - रोटी, कपड़ा और मकान की उपलब्धि का करार है; और पति-पत्नी को संदेश है कि प्रभु रूपी दाखलता में डालियों को बेरोक-टोक फलने-फूलने दो। क्योंकि परिवार रूपी कलीसिया (धार्मिक संगठन) का निर्माण कर, प्रभु स्वंय उसे चलाना चाहता है और वही उसका एकमात्र मालिक भी है- सृष्टि के संतुलन को डिस्टर्ब करने का, हम मनुष्यों को कोई अधिकार नहीं है। इसलिए प्रभु को उसकी सृष्टि के कार्य में विध्न-बाधा कतई पसंद नहीं है। वह हमारे परिवार में मेहमान नहीं है, बल्कि वह हमारे परिवार का मालिक है। इसलिए जिसे माता के गर्भ में रचने से पहले उसने जान लिए है; उसको न गर्भ में आने से रोकने का पति-पत्नी को अधिकार है और न ही गर्भपात करने का ही। गर्भ खराब करने वाले, अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के हाथ से लूट-पाट करते हैं क्योंकि माता के गर्भ में प्रभु अपने पवित्र हाथों से मनुष्यों की रचना करते हैं; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


तूने मेरी शरीर की सृष्टि की;
तूने माता के गर्भ में मुझे गढ़ा।
मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ - मेरा निमार्ण अपूर्व है। स्त्रोत्र ग्रंथ 139: 11-12


इसलिए धर्म गंथ के अनुसार गर्भपात बिल्कुल ही वर्जित है। गर्भ रोकने के तमाम कृत्रिम उपाय वर्जित है। यहाँ तक कि संयम बरतना भी पाप है - ऐसा करना, परिवार के मालिक प्रभु, दाखलता प्रभु पर अविश्वास प्रकट करना है - प्रभु को पता है कि हमारे परिवार का साइज, कितना होना चाहिए। अर्थात किसी भी परिवार में बच्चों की संख्या का निर्धारण प्रभु करते हैं; और प्रभु जानते हैं कि वह संख्या कितनी होनी चाहिए। क्योंकि वह भला चरवाहा है; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


भला गड़ेरिया मैं हूँ। भला गड़ेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है। योहन 9: 11


यदि आप कहते हैं कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो विश्वास कीजिए कि उसी के द्वारा सब कुछ उत्पन्न होता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:


पृथ्वी और जरे कुछ उस में है,
संसार ओर उसके निवासी - सब प्रभु का है; स्त्रोत ग्रंथ 24: 1


क्योंकि सब कुछ ईश्वर का है और सब कुछ ईश्वर के द्वारा संचालित है; इसलिए यह निश्चित है कि वह उन परिवार में जहाँ वह द्वार के बाहर नहीं, बल्कि परिवार के साथ है, कभी भी कमी नहीं होने देगा। उसने मरूभूमि में मन्ना खिलाया है। निर्जन प्रदेश में उसके वचन सुनने वालों को मात्र पाँच रोटी और दो मछली से खिला कर इतना तृप्त कर दिया कि बारह-बारह टोकरियाँ बच गई। उसके वचन सुनकर उसका पालन करने वालों को कभी निराश नहीं होना पड़ेगा।


चैथा कारण - अपने और पड़ोस के परिवार का महत्व


प्रभु परिवार का निर्माण कर, परिवार के मालिक के रूप में परिवार चलाने वाले का रोल अदा करना चाहता है। उसने परिवार रूपी गाड़ी का निर्माण किया है, जिसका दाहिना चक्का पति है और बायां चक्का पत्नी; प्रभु प्रत्येक परिवार रूपी गाड़ी का स्टेयरिंग अपने हाथ में चाहता है।
लेकिन आप और हम प्रभु की इस पवित्र इच्छा के विरूद्ध कार्य करते हैं। इन बातों को समझने के लिए आप जहाँ भी हैं, वहाँ से मात्र एक पाँच सौ कदम चलें, आपको बहुत सारे परिवार रूपी गाड़ी पलटा हुआ, रास्ता छोड़ा हुआ, टक्कराया हुआ, उलटा हुआ मिलेगा; जानते है क्यों?


क्योंकि


(1) बहुत सारे पति-पत्नी परिवार रूपी गाड़ी का स्टेरिंग अपने हाथ में लेने के लिए, वर्चस्व की लड़ाई, आपस में ही लड़ रहे हैं। हम विवाह में के दौरान प्रभु की परम पावन उपस्थिति में उच्चारें गये उस करार को क्यों भूल जाते हैं? पति-पत्नी क्यों भूल जाते कि भेज दो नहीं एक शरीर हैं? पति-पत्नी एक दूसरे को प्यार करने के प्रभु का यह कथन क्यों भूल जाते हैं? जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


मेरी आज्ञा यह है- जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया है, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। योहन 15: 12


जब कोई पति आपने पत्नी से प्यार नहीं कर सकता है, तो वह प्रभु के उपरोक्त वचन (योहन 15: 12) के अनुसार दूसरों से कैसे प्यार कर सकता है? जब कोई पत्नी आपने पति से प्यार नहीं कर सकती है, तो वह प्रभु के उपरोक्त वचन (योहन 15: 12) के अनुसार दूसरों से कैसे प्यार कर सकती है?


(2) बहुत सारे परिवार, अपने पड़ोस के परिवार से ईर्ष्या-द्वेष करते हैं, जलते हैं, चिढ़ते हैं और आपसी मन-मुटाव को पनपने देते हैं। हम प्रभु का कथन क्यों भूल जाते हैं; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भर हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-कह-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाल दी जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, एसी से तुम्हारे लिये भी नापा जायेगा। लूकस 6 : 38


हम सब को शांति का भाव अपनाते हुए, अपने प्रभु ईश्वर को संसार भर के तमाम परिवारों का निर्माणकर्ता और संचालक स्वीकार करना चाहिए। ऐसा करने पर हम सब अपने परिवार में, और पड़ोस में शांति का अनुभव करेंगे।


पाँचवा कारण - पारिवारिक शांति एवं भविष्य निर्माण


प्रभु दिखलाई नहीं देते हैं। लेकिन वे माता-पिता के रूप में परिवार में उपस्थित हो कर बाल-बच्चों का लालन-पालन करते हैं, ताकि परिवार में प्रभु के पवित्र इच्छा के अनुसार बाल-बच्चों की वृद्धि होने के बावजूद परिवार की पवित्रता और शांति बनी रहे और बच्चों का भविष्य इतना उज्जवल हो कि बच्चे भविष्य में प्रभु की योजनाओं में सहभागी होने लायक बन जाएँ।


इसलिए प्रभु चाहते हैं -


(क) माता-पिता अपने बच्चों को न खिजाएँ, लेकिन प्रभु के अनुसार बच्चे को ढालने के क्रम में, जरूरी होने पर कड़ाई से पेश आयें- बुरा के लिए सख्त- ताकि बच्चे माता-पिता की शिक्षा को हवा में न उड़ाएँ, बल्कि पूर्णतः ग्रहण करें। इसलिए माता-पिता को कितना सावधानी बरतना चाहिए कि वे अपने बाल-बच्चों के बर्बादी का कारण नहीं बने; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


उन नन्हों में से एक के लिय भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाट बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता। इसलिए सावधान रहो। लूकस 17: 2-3


(ख) बच्चे अपने माँ-बाप का आदर करें, उनकी सेवा करें जैसा ईसा मसीह ने अपने जीवनशैली के अनुसार आज्ञाकारी जीवन जी कर दर्शाया है; जैसा कि धर्म गंथ में लिखा है:


अपने माता-पिता को आदर करो, जिससे तुम बहुत दिनों तक उस भूमि पर जीते रहो, जिसे तुम्हारा ईश्वर तुम्हें प्रदान करेगा। निर्गमन ग्रंथ 20: 12


अगले भाग में पढ़िये
पवित्र विवाह संस्कार का योजनाकर और आयोजक
To be continued ……..


आमीन।


ईश्वर की महिमा में जारी.......


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


"न अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!