MARRIAGE

पवित्र विवाह संस्कार का असर और महत्व

प्रकाशित 25/06/2020


पहला असर -


पवित्र विवाह संस्कार स्त्री और पुरूष के दो अलग-अलग दिखने वाले शरीरों को, एक शरीर में बदल देता है क्योंकि प्रभु, स्त्री को उस शरीर में वापस भर देता है, जिससे वह बनाई गई है। विवाहोपरान्त वे दो अलग-अलग शरीर में जरूर दिखलाई पड़ते हैं, लेकिन वे एक ही शरीर हैं; जैसा कि स्त्री, अपने पुरूष की पसली से बनायी गयी है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:


इस कारण पुरूष अपने माता पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और *वे दोनो एक शरीर हो जायेंगे।* उत्पति ग्रंथ 2 : 24


दूसरी बात यह है कि ईश्वर के कथनानुसार वे दो नहीं एक शरीर हैं - एक शरीर में तो एक ही आत्मा का वास होना चाहिए; इसलिए पवित्र विवाह का बंधन दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह संस्कार के असर से पति और पत्नी एक शरीर और एक आत्मा हो जाते हैं। जिस दिन दमपत्ति इस बात को समझेंगे, वे आपस मे फिर नहीं उलझेंगे; क्या कोई अपने शरीर से उलझता है?


दूसरा असर -


कुछ लोग विवाहोपरांत प्रभु के उपरोक्त वचन का नजायज फायदा उठा कर माता-पिता से हमेशा के लिए जुदा हो जाते है। विवाह संस्कार तो प्यारा संस्कार है, जोड़ने वाला संस्कार है; न कि तोड़ने वाला। इसलिए माता-पिता से इस बहाने जुदा हो जाना ईश्वर की नजर में भारी पाप है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि क्यों प्रभु कहते है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:


इस कारण पुरूष अपने माता पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनो एक षरीर हो जायेंगे। उत्पति ग्रंथ 2 : 24


विवाह का संस्कार तो पति-पत्नी को संसर्ग का लाइसेंस देता है; इसलिए संसर्ग की क्रिया को ईश्वर की इच्छा के अनुसार पवित्रता के साथ पूर्ण करने के लिए पति-पत्नी को थोड़े समय के लिए एकांतवास चाहिए। इसके लिए यह जरूरी है कि *पति-पत्नी संसर्ग के आवश्यक समय तक के लिये माता-पिता को छोड़े, न कि सदा-सदा के लिए।* जिस दिन दमपत्ति इस बात को समझ जायेंगे वे अपने माता-पिता को कष्ट नहीं देंगे; और पारिवारिक झंझट बहुत हद तक समाप्त हो जायेगी।


तीसरा असर -


स्त्री ही विवाह संसकार में उस पुरूष को दी जाती है, जिससे वह बनाई गयी है। इसलिए सिर्फ स्त्री और उसके पुरूष को ही विवाह के बंधन में बांधा जाना चाहिए क्योंकि सिर्फ स्त्री और पुरूष के बीच ही संसर्ग का प्रावधान है, जिसके द्वारा ईश्वर अपनी सृष्टि को आगे बढ़ाना चाहता है; जिसकी चर्चा आगे करूंगा। इसलिए सैमलैंगिक रिश्ता ईश्वर की दष्टि में बिल्कुल उनुचित है। सिर्फ पति और पत्नी के बीच ही ईश्वर ने संसर्ग का प्रधान रखा है, किसी अन्य दो के बीच नहीं, जो ईश्वर के निम्न वचन से प्रमाणित होता है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


वह मनुष्य और उसकी पत्नी, दोनों नंगे थे, फिर भी उन्हें एक दूसरे के सामने लज्जा का अनुभव नहीं होता था। उत्पति ग्रंथ 2 : 25


मान मर्यादा और सम्मान का जीवन ईश्वर को पसंद है। किसी भी मनुष्य को निर्लज्ज नहीं होना चाहिए और ईश्वर के अनुसार अपने आप को दायरे में सीमित रखना चाहिए। ऐसा होने पर आज की ज्यादा से ज्यादा समस्याएं, जो अक्सर देखने सुनने को मिलती हैं, और अंदर से हिला देती हैं, अपने आप समाप्त हो जाएगा ।


अगले भाग में पढ़िये
पवित्र विवाह संस्कार की स्थापना का कारण
To be continued ……..


आमीन।


ईश्वर की महिमा में जारी.......


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!