प्रकाशित 23/06/2020 - 24/06/2020
प्रकाशित 23/06/2020
पिता परमेश्वर ने सृष्टि के आरंभ में, पहले मानव, आदम को गढ़ने के बाद ही पवित्र विवाह संस्कार की स्थापना की है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
प्रभु ने कहा, “अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं है। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।“ उत्पति ग्रंथ 2 : 18
ईश्वर का उपरोक्त कथन में सिर्फ और सिर्फ एक उपयुक्त सहयोगी का जिक्र है। इसलिए सिर्फ एक उपयुक्त सहयोगी ही जायज है; एक से जयादा नजायज है; इसलिए पोस्ट मैरिटल अफेयर भी नजायज है। दूसरी जरूरी बात यह है कि ईश्वर ने आदम के अकेलापन का एहसार करने के तुरंत बाद आदम के लिए एक सुयोग्य जोड़ी नहीं बनाया, बल्कि उसने जीव-जंजुओं को गढ़ कर उन्हें आदम के पास ले आया और आदम को उन तमाम जीव-जंजुओं का नाम देने का अधिकार दे दिया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
तब ईश्वर ने मिट्टी से पृथ्वी भर के सभी पशुओं और आकाश के सभी पक्षियों को गढ़ा और यह देखने के लिए कि मनुष्य उन्हें क्या नाम देगा, वह उन्हें मनुष्य के पास ले चला; क्योंकि मनुष्य ने प्रत्येक को जो नाम दिया होगा, वही उसका नाम रहेगा। उत्पति ग्रंथ 2 : 19
ईश्वर ने मनुष्य को तमाम जीव-जन्तुओं का नाम देने का अधिकार दे दिया - जानते हैं क्यों? क्योंकि ईश्वर ने हम सब के लिए यह साबित करना चाहा कि उसने निश्चित ही आदम को अपने सदृश बनाया है। इसलिए जब आदम, जीव-जन्तुओं को नाम दे-दे कर उन्हें किनारे कर दिया, तो यह बिल्कुल साफ हो गया कि ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य को ही अपने सदृश बनाया है। इसलिए तो आदम ने नाम देने के क्रम में किसी भी जीव-जन्तु को अपने लायक नहीं पाया; अपने उपयुक्त सहयोगी के रूप में नहीं पाया। ईश्वर ने सिर्फ मनुष्यों को अपने सदृश्य बनाने की बात ही नहीं किया है, बल्कि उसने हमारे लिये यह साबित भी कर दिया है कि उन्होंने सिर्फ मनुष्य को ही अपने सदृश बनाया है- सारी सृष्टि में दूसरा कोई भी ऐसा जीव-जन्तु नहीं जो ईश्वर के सदृश है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
मनुष्य ने सभी घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और सभी जंगली जीव-जन्तुओं का नाम रखा। किन्तु उसे अपने लिए उपयुक्त सहयोगी नहीं मिला। उत्पति ग्रंथ 2 : 20
अतः मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है - ईश्वर ने हमें और आपको बिल्कुल अपने समान बनाया है। ईश्वर की स्तुति हो, ईश्वर को धन्यवाद। सारी सृष्टि में सिर्फ हम मनुष्यों को ही ईश्वर का रूप प्राप्त है। खुशनसीब हैं हम सब! जिन्हें ईश्वर ने माता कें गर्भ में रखने से पहले जान लिया है। अर्थात् ईश्वर ने हम मानव जाति को अस्तित्व में लाने से पहले प्यार किया है। जब हम माता के गर्भ में लाये ही नहीं गये थे, तब से ईश्वर ने हमसे प्यार किया है। कितना अनोखा और निराला है हम मानव के प्रति ईश्वर प्रेम।
जब आदम ने सभी जीव-जन्तुओं का नाम दे-दे कर समाप्त किया; और ईश्वर ने हमारे लिये यह साबित कर दिया कि सारी सृष्टि में मनुष्य के लायक कोई दूसरा नहीं, तब ईश्वर अपने सदृश्य, आदम के अकेलेपन को दूर करने के लिए उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाने की ओर बढ़े; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
तब ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो ईश्वर ने उसकी एक पसली निकाल ली और उसकी जगह मांस से भर दिया। उत्पति ग्रंथ 2 : 21
ईश्वर ने सृष्टि का पहला ऑपरेशन करने के लिए मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया; क्योंकि वह नहीं चाहता है कि मनुष्य को दर्द हो । ईश्वर को दर्द होता है - क्रूस के काठ पर टंगे, काँटों का मुकुट पहने, हाथों और पैरो में ठुके कीलों के बीच कराहने वाले मानव रूप में ईसा मसीह को देखें, जो पिता को दर्द में पुकार कर कह रहा है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
तीसरे पहर ईसा ने ऊँचे स्वर से पुकारा, “एलोई! एलोई! लमा सबाखतानी?“ इसका अर्थ है- मेरे ईश्वर! मेरे ईश्वर! तूने मुझे क्यों त्याग दिया है? मारकुस 24: 34
उसने हम मनुष्यों को अपने सदृश बनाया है, इसलिए हमें भी दर्द का एहसास दिया है ताकि जिस प्रकार से ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला कर उसको दर्द नहीं देना चाहा है, हम भी किसी भी मानव को थोड़ा भी शारीरिक एवं मानसिक दर्द न दें। ईश्वर सृष्टि के आरंभ से ही मानव जाति के दर्द का कद्र करता रहा है। क्या हम ईश्वर का और अपने पड़ोसियों के दर्द का कदर करते हैं?
स्त्री और पुरूष दोनो ही ईश्वर के सदृश्य -
इसके बाद ईश्वर ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया। उत्पति ग्रंथ 2 : 22
ईश्वर चाहता तो वह जिस प्रकार से उसने आदम को पृथ्वी की मिट्टी से बनाया था; हेवा को भी उसी वक्त पृथ्वी की मिट्टी से बना कर आदम के पास ले आता, जब उसने सभी जीव-जन्तुओं को पृथ्वी की मिट्टी से बना कर आदम के पास नाम देने के लिए लाया था। लेकिन ईश्वर ने ऐसा नहीं किया, बल्कि उसने आदम को गहरी नींद में सुला कर, आदम के अनजाने में आदम से स्पेशल मिट्टी निकाल लिया। आदम मिट्टी का बना अतः आदम की पसली मिट्टी का बना। जिस प्रकार से ईश्वर ने आदम को अपने पवित्र हाथों से अपने सदृश्य गढ़ा है, हेवा को भी आदम के अनजाने मे उससे मिट्टी निकाल कर अपने पवित्र हाथों से अपने सदृश्य गढ़ा है, ताकि स्त्री भी ईश्वर के सदृश्य हो। ईश्वर ने समस्त मानवजाति को अपने सदृश्य गढ़ा है; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिख है:
तूने मेरी शरीर की सृष्टि की;
तूने माता के गर्भ में मुझे गढ़ा।
मैं तेरा धन्यवाद काता हूँ –
मेरा निमार्ण अपूर्व है। स्त्रोत्र ग्रंथ 139: 11 - 12
हेवा अर्थात् माता तो मिट्टी की बनी है; इसलिए माता का गर्भ मिट्टी का बना है। यह सत्य है कि आज भी ईश्वर माता के गर्भ में अर्थात् मिट्टी में अपने पवित्र हाथ डाल कर समस्त मानव जाति को अपने सदृश्य गढ़ता है- मनुष्यों को न ही अपने रूप-रंग से असंतुष्ट होना चाहिए और न ही किसी दूसरों के रूप-रंग पर किसी प्रकार का टीका-टिप्पणी ही करना चाहिए। जो ऐसा करता है वह ईश्वर की पवित्र सृष्टि के विरूद्ध अपराध करता है।
स्त्री व पुरूष विवाह पूर्व निज भाई-बहन -
जरूरी बात यह है कि हेवा चूँकि आदम की पसली से बनी है, इस कारण वह पहले उसकी निज बहन है। अतः विवाह संस्कार सम्पन्न होने से पहले स्त्री और पुरूष बिल्कुल निज भाई-बहन हैं। ईश्वर, आदम (पुरूष) से मिट्टी निकाल कर, हेवा (स्त्री) को कहीं उससे दूर गढ़ने के बाद, उचित समय आने तक उसका उसका परवरिश करता है। इसलिए किसी भी प्रकार का अंतरंग संबंध विवाह पूर्व, पूर्ण वर्जित है। गौर करने वाली बात यह है कि हर स्त्री अपने पुरूष की पसली से बनाई गई है; इसलिए स्त्री, पहले पुरूष की बहन है; और विवाहोपरांत उसकी पत्नी; दोनों एक ही पसली के बने हैं। अतः घर के या पड़ोस के किसी भी विवाह संस्कार में बंधे पति-पत्नी में भाई-बहन होने के लक्षण को आप सहज ही अनुभव कर सकते हैं। आइये, कुछ पल के लिए मौन धारण कर, अपने घर के या पड़ोस के किसी भी विवाह में बंधे जोड़ी को जैसे कि माता-पिता, चाचा-चाची, मामा-मामी, मौसा-मौसी, भाई-भौजी, बेटा-बहु, बेटी-दमाद को देखें, आपको उन दोनों में कहीं न कहीं दिखने में, बोलने में, हाव-भाव में, उठने-बैठने में, चलने-फिरने में, होने-करने में, आचर-व्यवहार में, विचारों में, इत्यादि में भाई-बहन होने का लक्षण अर्थात् समानता मिल जायेगा। अतः यह समझ लेना चाहिए कि ईश्वर ने जिस पुरूष के लिए भी विवाह का पवित्र बंधन निर्धारित किया है, उसके लिए उसकी पसली से एक स्त्री को गढ़ चुका है, या गढ़ने वाला है; कहीं दूर अनजाने में ठीक उसी प्रकार से, जिस प्रकार से आदम के अनजाने में, उसकी गहरी नींद की अवस्था में, उसने आदम लिए हेवा को गढ़ा। और हेवा के अनजाने में, वह उसे आदम के पास ले गया- क्योंकि जब तक ईश्वर, हेवा को आदम के पास नहीं ले गया था, तब तक हेवा अकेलेपन में ही थी और उसे पता ही नहीं था कि उसके लायक उसके सदृश कोई है। ईश्वर ने मानव जाति की भलाई हेतु विवाह संस्कार का ठोस प्लानिंग कर मनुष्य के अकेलेपन को दूर कर दिया है।
प्रकाशित 24/06/2020
पवित्र आत्मा का संदेश और विवाह के वक्त मनुष्य का करार -
जब ईश्वर, हेवा को आदम के पास ले कर जा रहा था, तो हेवा को कुछ भी पता नहीं था कि प्रभु उसे कहाँ ले कर जा रहा है। जब प्रभु, हेवा को आदम के पास ले कर पहुँचा, तब हेवा को पता चला कि वह अकेली नहीं है; और दूसरा भी कोई है, जो उसके सदृश्य है। और जब आदम नींद से जागा, तो उसे भी पता चला कि वह अकेला नहीं है; और दूसरा भी कोई है, जो उसके सदृश्य है। ज्ञात हो कि आदम को तमाम जीव-जन्तुओं को नाम देने के क्रम के अपने लायक सुयोग्य सहयोगी नहीं मिला था। लेकिन हेवा को देखने के साथ ही आदम अनायास बोल उठा; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
इस पर मनुष्य बोल उठा,“यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम ’नारी’ होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गई है।“ उत्पति ग्रंथ 2 : 23
यहाँ यह चर्चा करना जरूरी है कि आदम कैसे जान गया कि उसके सामने, जिसे प्रभु ले कर आया है, वह उसके हड्डी से बनी है! इस बात को समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि आदम, नींद में जाने के पहले क्या कर रहा था। क्या आप बतला सकते हैं कि हेवा को गढ़ने के लिए, आदम से पसली निकालने के लिए जब प्रभु ने आदम को गहरी नींद में सुला दिया, उस गहरी नींद में जाने से पहले अदम क्या कर रहा था? आदम नींद में जाने के पहले सब जीव-जन्तुओं का नाम दे कर समाप्त किया था; और प्रभु उतने सारे जीव-जन्तुओं के बीच आदम को बिल्कुल अकेला देख रहा था - कौन पिता अपने बेटे को अकेला छोड़ सकता है? प्रभु की उपस्थिति तो है, फिर भी मनुष्य अकेला है क्योंकि आज तक किसी ने ईश्वर को नहीं देखा; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है:
किसी ने कभी ईश्वर को नहीं देखा ;
पिता की गोद में रहने वाले
एकलौते, ईश्वर, ने उसे प्रकट किया है। योहन 1 : 18
प्रभु अदृश्य हैं और मनुष्य का सृष्टिकर्ता पिता! एक ऐसा पिता, जो मनुष्य को अकेला नहीं देख सकता है। इसलिए प्रभु ने परिवार, कुटुंब, समुदाय और समाज देकर मानव जाति का अकेलापन दूर कर दिया हैं। महान कार्य किए हैं, प्रभु ने मावन जाति के लिए; लेकिन क्या मानव जाति यह समझना चाहता है?
जब कोई बेहोशी से जागता है, तो उसे पता नहीं चलता है कि उसे क्या हुआ था; और वह उसी काम को करने की कोशिश करता है, जिसे वह बेहोशी के पहले कर रहा होता है। आदम तो नींद में अर्थात बेहोशी में जाने से पहले, तमाम जीव-जन्तुओं को नाम देने के क्रम में था। जब वह नामंकरण समाप्त कर चुका, तब प्रभु ने उसे नींद में अर्थात बेहोशी में डाला था, ताकि वह आदम को बिना दर्द दिए ऑपरेशन करे। इसलिए अदम, बिल्कुल अनजान था कि प्रभु ने उसकी पसली से स्त्री को गढ़ा है। नींद से जागने पर आदम हठात् अपने सामने स्त्री रूपी जीव को देख कर यह कहते हुए उसे नाम देता है; जेसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है
इस पर मनुष्य बोल उठा,“यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम ’नारी’ होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गई है।“ उत्पति ग्रंथ 2 : 23
इसका अर्थ यह है कि आदम, हेवा को देखते ही समझ गया कि यह “जीव“ तो है, किन्तु कोई जन्तु नहीं है, जानवर नही है, बल्कि उसके समान दिखने वाली एक मनुष्य है। सवाल यह है कि आदम कैसे जान गया कि जिस स्त्री को वह अपने समक्ष देख रहा है, वह उसकी पसली हड्डी से बनी है? जैसा कि वह अपने समक्ष स्त्री को देख कर कहता है- यह मेरे हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। यह सूचना उसे पवित्र आत्मा से प्राप्त हुई; और देखते ही देखते ईश्वर ने उसका अकेलापन दूर कर दिया। आदम, अपने अकेलेपन को दूर होता देख कर प्रसन्नता से प्रभु का गुणगान करते हुए अपने सदृश्य उस जीव का नाम नारी रखते हुए उसे अपने लिये उपयुक्त सहयोगी पा कर अपना लिया- यह मुझसे निकाली गई है औेर आज मुझे वापस प्राप्त हो गई है। और इस प्रकार सृष्टि का पहला विवाह का पवित्र बंधन संपन्न हो गया। अपने विवाह के दौरान आदम ने प्रभु की स्तुति करते हुए स्वीकार किया कि यह स्त्री, मेरे हड्डियों की हड्डी है, और मेरे मांस का मांस। जिसका अर्थ है- जैसा मैं हूँ, मेरे सामने उपस्थित यह “स्त्री“ बिल्कुल वैसी ही है; कोई अंतर नहीं है; जिस पसली का मैं बना हूँ, उसी पसली की यह बनी है। इसलिए जिस प्रकार से मैं अपने-आप से प्यार और अपना ख्याल रखता हूँ ठीक वैसा ही प्यार मैं इससे करूँगा और ठीक वैसा ही ख्याल मैं इसका रखूँगा। इसलिए आदम की बोली में छुपा आदम विवाह का करार - मैं इससे प्रेम करूँगा, इसकी सेवा करूँगा और हर पल हर हाल में इसका साथ निभाऊँगा।
हेवा कुछ भी नहीं बोली! क्योंकि हेवा माने स्त्री; प्रभु के प्रेम, दया, क्षमा, शांति, सहनशीलता और धैर्य की प्रतिमूर्ति है। लेकिन हेवा, मौन रहते हुए भी बहुत कुछ बोल गई - उसने अपने सदृश्य मनुष्य को अपने सामने देखकर अपना अकेलापन दूर होता देख मन-ही-मन प्रभु को धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा - प्रभु मैं तुझे धन्यवाद देती हूँ कि जिस नर से निकाली गई हूँ, आज उसे प्राप्त हो गई हूँ अर्थात् हेवा के मन में छिपा अपने विवाह का करार- मैं इससे प्रेम करूँगी, इसकी सेवा करूँगी और जीवन भर इनका आदर करूँगी। और इस प्रकार आदम और हेवा के द्वारा प्रभु की प्रशंसा और प्रभु की उपस्थिति में करार के साथ ही, इस पृथ्वी पर पहला पवित्र विवाह का बंधन संपन्न हुआ। और इसके साथ ही प्रभु ने समस्त मानव जाति के लिए पृथ्वी पर पवित्र विवाह संस्कार की स्थापनाकर दी। यहाँ यह कहना उचित ही है कि बिना विवाह से पहले स्त्री-पुरुष का एक साथ रहना अनुचित है और प्रभु के नजर में पाप क्योंकि प्रभु ने मानवजाति के लिए विवाह संस्कार की स्थापना की है- पृथ्वी के किसी भी कोने में चले जाईये, विवाह के बंधन को हर जाति, समुदाय, तबका मान्यता देता है; और देना उचित है।
आज पवित्र विवाह संस्कार में मनुष्य का करार और करार का अर्थ
पुरूष का करार -
आज पुरूष और स्त्री प्रभु की परम पावन उपस्थिति में एवं समाज के समक्ष विवाह का करार कुछ इस तरह करते हैं -
“मैं आपसे प्रेम करूँगा, आपकी सेवा करूँगा और हर पल हर हाल में आपका साथ निभाऊँगा।“
पुरूष के करार का अर्थ -
आज का पुरूष भी अपने करार में वही बोलता है, जो आदम अपने करार में बोला -
आज का पुरूष भी अपने करार में वही बोलता है, जो आदम अपने करार में बोला -
इस पर मनुष्य बोल उठा,“यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम ’नारी’ होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गई है।“ उत्पति ग्रंथ 2 : 23
और आज इस पावन क्षणों में मुझे प्राप्त हुई है, इसलिए मैं आपसे प्रेम करूँगा आपकी सेवा करूँगा और जीवन भर आपका साथ निभाऊँगा।
स्त्री का करार -
“मैं आपसे प्रेम करूँगी आपकी सेवा करूँगी और जीवन भर आपका साथ निभाऊँगी।“
स्त्री के करार का अर्थ -
आज की स्त्री अपने करार में वही बोलती है, जिसे हेवा मन-ही-मन अपने करार में बोली -
प्रभु! मैं तुझे धन्यवाद देती हूँ कि जिस नर से निकाली गई हूँ, आज उस नर को प्राप्त हो गई हूँ इसलिए मैं आपसे प्रेम करूँगी आपकी सेवा करूँगी और जीवन भर आपका आदर करूँगी। और इस कारण स्त्री अपने माथे पर अपने विवाह का चिह्न सिंदूर के रूप में लगाती है ताकि वह विवाहिता, किसी भी परपुरूष के लिए पाप का कारण न बने।
अगले भाग में पढ़िये
पवित्र विवाह संस्कार का असर और महत्व
To be continued ……..
आमीन।
ईश्वर की महिमा में जारी.......
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!