प्रकाशित 28/05/2020
ईसा मसीह एक लिविंग लेजेंड है; लिविंग स्टैंडर्ड हैं; जीवन जीने का मापदंड है; मानव जीवन का पैमाना हैं; एक पवित्र जीवन शैली हैं। ऐसी जीवनशैली हैं, जिससे प्रेरणा पाकर (जोर जबरदस्ती से नहीं) कोई भी व्यक्ति इस संसार में शांतिमय और पवित्र जीवन जी सकता है; और इस संसार के अंत में स्वर्ग में अनंत शांति का हकदार बन सकता है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उनसे कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन में हूं। मुझ से हो कर गए बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता। संत योहन 14 : 6
हम सबको ईश्वर को बहुत धन्यवाद देना चाहिए कि ईसा मसीह ने ऐसा अद्भुत एवं सुंदर जीवन शैली जी कर, संसार को इसी जीवन शैली के मापदंड के अनुसार पवित्र जीवन जीने का न्योता दिया है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।" संत मत्ती 16 : 24
ईसा मसीह ने इस जीवनशैली को जीने के लिए बहुत आत्मत्याग किए हैं। और दूसरों का क्रूस (पाप का बोझ) अपने उपर लिए हैं और लेना चाहते हैं, उन्हें उनके पापों से मुक्त करने के लिए। पहला शब्द, आत्मत्याग सुनने में बहुत कठिन और तकलीफदेह लगता है लेकिन वास्तव में ईसा मसीह ने आत्मत्याग करने का एक बहुत ही नयाब और आसान तरीका- उपवास-प्रस्तुत कर दिए हैं। उपवास का अर्थ होता है जानबूझकर किसी चीज की कमी कर देना; जीवन में यदि असत्य (पाप) की कमी हो जाए, तो इससे ज्यादा लाभकारी और क्या हो सकती है! और दूसरा शब्द, क्रूस है जो मनुष्य के पाप का चिन्ह है क्योंकि जब मनुष्य की इच्छा ईश्वर की इच्छा को काटती है, तो क्रूस तैयार होता है। हम मनुष्यों को अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए ईसा मसीह को अपना क्रूस देना अर्थात प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की आवश्यकता है। इस जीवनशैली को जी कर ईसा मसीह ने जताया है कि कैसे बड़ी आसानी से मनुष्य उपवास और प्रार्थन की निरंतरता के द्वारा अपने मानवीय कमजोरियों पर विजय ध्वज फहरा कर, शैतान के हाथों से अपने शरीर का कंट्रोल अपने हाथों में लेकर, सत्य को समर्पित जीवन की ओर अग्रसर हो सकता है। शैतान (असत्य) इस जीवन शैली का बहुत बड़ा बाधक और चुनौती है। ईसा मसीह ने इस जीवनशैली को जी कर दिखाएं हैं कि कैसे शैतान को इस जीवनशैली को जी कर पछाड़ा और निकाला जाता है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
बाद में शिष्यों ने एकांत में ईसा के पास आकर पूछा, "हम लोग उसे क्यों नहीं निकाल सके?" ईसा ने उनसे कहा, "अपने विश्वास की कमी के कारण। मैं तुमसे कहता हूं- यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, "यहां से वहां तक हट जा, तो वह हट जाएगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा। परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती।" संत मत्ती 17 : 19-21
ईसा मसीह ने इस जीवनशैली को जी कर यह दिखाया है कि इस जीवनशैली को जीने वाले को सिर्फ और सिर्फ ईश्वर से डरना चाहिए। ईश्वर से डरने वाला पाप नहीं करता है। इस जीवन शैली में पाप के लिए, असत्य के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि कोई शैतान से डरेगा, तो वह उससे कैसे लड़ेगा? डर तो हार का कारण है। ईश्वर से हम जरुर हार जाएं, शैतान से हमें नहीं हारना चाहिए। इस जीवनशैली को जीने वालों के लिए, ईश्वर का डर छोड़कर बाकी सब तरह का डर वर्जित है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
उन से नहीं डरो, जो शरीर को मार डालते हैं, किंतु आत्मा को नहीं मार सकते; बल्कि उससे डरो, जो शरीर और आत्मा, दोनों का नरक में सर्वनाश कर सकता है। संत मत्ती 10 : 28
इस जीवन शैली को जीने में ईश्वरीय शक्ति और मदद मिलती रहती है; क्योंकि यह जीवन शैली मनुष्य को असत्य से सत्य की ओर धीरे-धीरे ऊपर उठाता है। इस जीवनशैली में मनुष्य असत्य में घटता जाता है और सत्य में बढ़ता जाता है। सत्य ईश्वर हैं। जीवनशैली को जीने वाले मनुष्य की आत्मा में असत्य घटता जाता है; और सत्य बढ़ता जाता है। इस प्रकार से इस जीवनशैली को जीने वाले के शरीर की मंदिर की आत्मा रूपी वेदी में ईश्वर (सत्य) सुसज्जित होकर निरंतर शोभायमान होते ही जाते है; और शैतान (असत्य/पाप) के लिए बिल्कुल जगह नहीं रह जाता है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 30
ईसा मसीह ने इस जीवनशैली जी कर यह दिखा दिया है कि इस जीवनशैली जीने वाला अपनी पूरी क्षमता से ईश्वर से और अपने पड़ोसियों से प्यार करता है; जिसके कारण उसके और उसके इर्द-गिर्द ईश्वरीय प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय का माहौल होता है। दूसरे शब्दों में, ईसा मसीह की इस पवित्र जीवनशैली जीने वाला अपनी पूरी क्षमता से इस जीवनशैली के अनुसार जीवन जीता है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
उसने उत्तर दिया "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे ह्रदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने सामान प्यार करो।" संत लूकस 10 : 27
ईसा मसीह ने इस जीवनशैली को जी कर दिखलाया है कि यह जीवनशैली जीने वाला अपनी आत्मा में ईश्वर को सजाता है; और ईश्वर उस से प्रसन्न होकर उसकी शरीर की तमाम आवश्यकताओं (रोटी कपड़ा मकान) की पूर्ति हेतु उत्तम संसाधनों को प्राप्त करने में निश्चित ही उसकी मदद करते हैं। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
खेतों की घास आज भर है और कल चूल्हे में झोंक दी जाएगी। उसे भी यदि ईश्वर इस प्रकार से सजाता है, तो अल्पविश्वासियों! वह तुम्हें क्यों नहीं पहनाएगा? इसलिए खाने-पीने की खोज में लगे रहकर चिंता मत करो। इन सब चीजों की खोज में संसार के लोग लगे रहते हैं। तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें इनकी जरूरत है। इसलिए उसके राज्य की खोज में लगे रहो। ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जाएंगी। संत लूकस 12 : 28-31
यही कारण है कि ईसा मसीह की जीवन शैली को जीने वाला व्यक्ति संसार की ख्वाहिश नहीं करता है; वह नश्वर चीजों की प्राप्ति में अपना शक्ति और बहुमूल्य समय व्यर्थ नहीं करता है। लड़ाई झगड़ा तो पड़ोसी प्रेम के कत्ल का कारण है - क्या जब कोई चोरी करता है, तो वह अपने पड़ोसी के साथ का अपना प्रेम और सौहार्द का कत्ल नहीं कर देता है? जब कोई पड़ोसी प्रेम और सौहार्द का कत्ल करता है, वह ईश्वर को आघात पहुंचाता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है। इसलिए इस जीवनशैली में ईर्ष्या द्वेष घमंड पाखंड दिखावा लड़ाई झगड़ा मनमुटाव........ इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उत्तर दिया, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे अनुयायी लड़ते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परंतु मेरा राज्य यहां का नहीं है।" संत योहन 18 : 36
ईसा मसीह ने यह जीवन शैली जी कर यह दर्शाया है कि इसके द्वारा इस संसार में ईश्वर के राज्य- प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय के राज्य- की स्थापना की जानी चाहिए जिसके लिए प्रार्थना (पश्चाताप/दया याचना) निहायत ही जरूरी है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
जब तुम वेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहे हो और तुम्हें वहां याद आए कि मेरे भाई को मुझसे कोई शिकायत है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़कर पहले अपने भाई से मेल करने जाओ और तब आकर अपनी भेंट चढ़ाओ। संत मत्ती 5 : 23-24
उपरोक्त वचन एक ऐसी जीवनशैली की ओर इशारा करता है जिसमें पूजन पद्धति की अपेक्षा शुद्धता और पवित्रता की प्राप्ति का महत्व बहुत ज्यादा है। आस्था के कारण से पूजन पद्धति में सम्मिलित होने की मनाही तो नहीं है, बल्कि थोड़ा-सा भी आपवित्रता के साथ पूजन पद्धति में भाग लेने वाले से ईश्वर बिल्कुल प्रसन्न नहीं होते हैं। यदि ईश्वर को प्रसन्न करना है, तो उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप/दया याचना) की निरंतरता के द्वारा पवित्रता की प्राप्ति निहायत ही जरूरी है। और यह जीवन शैली सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी लाभकारी है। ईसा मसीह ने इस जीवनशैली को जी कर यह दर्शा दिया है कि जो इस जीवनशैली को जीता है उसके साथ ईश्वर होता है; और वह हर पल ईश्वर के अनुसार पवित्र जीवन जीता है; पाप से परे एक बहुत ही सुंदर, अद्भुत एवं पवित्र जीवन जो ईश्वरीय आनंद से भरा है।
ईसा मसीह की जीवन शैली में प्रार्थना का महत्व बहुत ज्यादा है और प्रार्थना का पहला अर्थ है- किसी प्रकार की अशुद्धता नहीं करना और दूसरा अर्थ है- अशुद्ध होने पर सच्चा पश्चाताप/दया याचना करना। प्रार्थना के पहले अर्थ यानी किसी प्रकार का अशुद्ध एवं अपवित्र कार्य नहीं करने के लिए इस जीवन शैली को जीने वाले लोगों को ईश्वर की संहित/विधान/नियम-कानून/आदेशों का पालन करना निहायत ही जरूरी है। जो ईश्वर के आदेशों का पालन करता है वह ईश्वर के साथ संयुक्त रहता है; ईश्वर प्रेम है; इसलिए वह प्रेम से संयुक्त और इस तरह वह प्रेम में दृढ़ बना रहता है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ़ बना रहता हूं। संत योहन 15 : 10
इस जीवनशैली को जी कर ईसा मसीह ने यह साबित कर दिया कि जो भी व्यक्ति इस जीवनशैली को जीता है, वह इस संसार में सिर्फ और सिर्फ अपने एकमात्र सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को प्रिय लगने वाला कार्य ही करता है; और इस तरह से वह अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के साथ जीवन जीता है, तो उसे जीवन में किसी बात की कमी नहीं होती है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
जिसने मुझ को भेजा, वह मेरे साथ है उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा; क्योंकि मैं सदा वही करता हूं, जो उसे अच्छा लगता है। संत योहन 8 : 29
जो इस संसार में ईसा मसीह की पवित्र जीवन शैली को अपनाकर अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के साथ जीवन जीता है, वह ईसा मसीह के साथ जीवन जीता है; क्योंकि ईसा मसीह इस संसार में ईश्वर के साथ जीवन जिए हैं,; और इस संसार के अंत में स्वर्ग में ईश्वर के साथ निवास करते हैं। वे चाहते हैं कि हर व्यक्ति इस जीवनशैली को अपना कर अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के साथ इस संसार में और इस संसार के अंत में स्वर्ग में निवास करें। जैसा कि ईसा मसीह की पवित्र इच्छा धर्मग्रंथ में लिखा है :
सब-के-सब एक हो जाएं। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह सब एक हो जाएं, जिससे संसार यह विश्वास करें कि तूने मुझे भेजा। संत योहन 17 : 21
इस जीवनशैली को जीने वाला हर व्यक्ति ईसा मसीह के पवित्र वचनों को सुनकर उसे अपने हृदय में अंकित कर जीवनभर पालन करता है; क्योंकि ईसा मसीह का वचन, ईश्वर का वचन जीवनदाई वचन है; उसका पालन मनुष्य की आत्मा को पाप की मृत्यु से बचाती है; उसका पालन मनुष्य की आत्मा को पाप में दफनाए जाने से बचाता है; उसका पालन असत्य और असत्य के मालिक, शैतान के हर प्रपंच से बचाता है; और मनुष्यों को ईश्वर का रिश्तेदार बनाता है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा की माता और भाई उनसे मिलने आए, किंतु भीड़ के कारण उनके पास नहीं पहुंच सके। लोगों ने उनसे कहा, "आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आपसे मिलना चाहते हैं।" उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी माता और मेरे भाई वही हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं।" संत लूकस 8 : 19-21
ईसा मसीह की जीवन शैली के अनुसार जीवन जीने वालों को बिना ईश्वर को देखे, विश्वास करना सिखलाती है क्योंकि इस जीवन शैली को जीने वाले लोगों के हृदय में स्वयं ईश्वर शोभायमान होते हैं; और उनके साथ जीवन व्यतीत करते हैं। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उस से कहा, "क्या तुम इसलिए विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य है वे, जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं!' संत योहन 20 : 29
ईसा मसीह की इस जीवनशैली को जीने वाले, अपने शरीर के बजाय अपनी आत्मा की चिंता करते हैं; वे जानते हैं की कोई भी व्यक्ति अपनी उम्र एक पल भी ज्यादा नहीं बढ़ा सकते हैं, जबकि इस जीवन शैली के द्वारा आत्मा की उम्र अनंत काल तक के लिए बढ़ाई जा सकती है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है
क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा। संत मत्ती 16 : 25
मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है? संत मत्ती 16 : 26
इस जीवनशैली को जीने वाले लोग ईसा मसीह के समान अपने हृदय को छोटे बच्चों के हृदय के सामान निर्मल बनाने में सफल हो जाते हैं। जिस प्रकार से छोटे बच्चों के हृदय में उनके पाप का कोई कलंक नहीं होता है ठीक उसी प्रकार से इस जीवनशैली को जी कर मनुष्य अपने पाप के कलंको से मुक्त हो जाता है; और छोटे बालकों के समान मासूम हो जाता है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
उस समय शिष्य, ईसा के पास आ कर बोले, "स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?" ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूं- यदि तुम फिर छोटे बालकों- जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। इसलिए जो अपने को इस बालक जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है। संत मत्ती 18 : 1-5
ईसा मसीह की पवित्र जीवनशैली को जीने वाले लोग दूसरों पर किसी प्रकार का दोष नहीं लगाते; चुगलखोरी नहीं करते हैं। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
दोष नहीं लगाओ जिससे तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाए; क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा। संत मत्ती 7 : 1-2
लेकिन हां! इस जीवन शैली को जीने वाले जरूर ईसा मसीह की तरह असत्य से घृणा करते हैं; और असत्य की सफाई और धुलाई में ईसा मसीह और ईश्वर का हाथ बंटाते हैं, ताकि सत्य के राज्य का विस्तार हो सके; प्रेम के राज्य का विस्तार हो सके। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने मंदिर में प्रवेश किया और वहां से सब बेचने और खरीदने वालों को बाहर निकाल दिया। उन्होंने सराफों की मेजें और कबूतर बेचने वालों की चौकियां उलट दी और उनसे कहा, "लिखा है- मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा, परंतु तुम लोग उसे लोगों का अड्डा बनाते हो।" संत मत्ती 21 : 12-13
क्या हमें इस जीवन शैली के द्वारा अपने शरीर रूपी मंदिर की आत्मा रूपी वेदी में डेरा जमाए असत्य की दुकानदारी को नहीं उलट देना चाहिए। क्या इस जीवनशैली से दूर जाकर यूदस ने ₹30 (तीस चांदी के सिक्कों) में अपने हृदय की वेदी से ईसा मसीह (सत्य/प्रेम) की बिक्री और असत्य की खरीदारी नहीं की?
............ यहां से ईसा मसीह की जीवन शैली की चर्चा आप स्वयं करें ............
उपसंहार
ईसा की पवित्र जीवनशैली से यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य का सारा जीवन ही आध्यात्मिक है, सांसारिक कुछ भी नहीं; जीवन का दूसरा नाम ही प्रार्थना है। इसलिए मनुष्य को अपना समस्त जीवन अपनी आत्मा की चिंता में ही व्यस्त कर देना चाहिए। जिस प्रकार से हम अपने जीवन को दो भागों में बांटते हैं - सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन- वह सरासर गलत है। मनुष्य का एक ही जीवन है; जिसे वह ईसा मसीह की जीवन शैली के अनुसार जी कर, अपने शरीर और आत्मा दोनों के लिए ईश्वर से वरदान हासिल कर सकता है। यदि कोई सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन के लिए अलग-अलग समय बांट रखा है, तो क्या ऐसा करना ईसा मसीह की पवित्र जीवनशैली के नियम अनुसार गलत नहीं है? क्या ईसा मसीह इस जीवनशैली के अनुसार अपने जीवन जीने के दौरान, अपना हर कार्य ईश्वर को प्रिय लगने के लिए नहीं किये हैं? क्या दो नवों पर एक साथ सवार व्यक्ति, डूब नहीं जायेगा? जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन-दोनों की सेवा नहीं कर सकते। संत मत्ती 6 : 24
इस जीवनशैली को जी कर ईसा मसीह ने दर्शाया है कि जब कोई भी व्यक्ति इस जीवनशैली के अनुसार बड़ी आसानी से जीवन जी कर ईश्वर को प्रसन्न करना शुरू कर सकता है, तो ईश्वर उसे इस संसार में जीने के लिए उत्तम से उत्तम संसाधनों से उसकी हर कार्य/दिनचर्या में मदद करते हैं; और उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देते हैं।
जीवन का दूसरा नाम है प्रार्थना है क्योंकि हम मनुष्य ईश्वर की महिमा करने के लिए बनाए गए हैं; निरंतर इस संसार में, और अनंत काल तक स्वर्ग में। इसलिए उपवास और प्रार्थना मनुष्य की आत्मा को निरंतरता के साथ ईश्वर की महिमा करने की क्षमता प्रदान करती है- शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से- जैसा कि माता मरियम की आत्मा ईश्वर की निरंतर महिमा करती है। जैसा कि धर्मग्रंथ में लिखा है :
तब मरियम बोल उठी,
"मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,
मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनंद मनाता है;
क्योंकि उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है।
अब सब पीढ़ियां मुझे धन्य कहेंगी;
क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मेरे लिए महान् कार्य किए हैं।
पवित्र है उसका नाम!
उसकी कृपा उसके श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहती है।
उसने अपना बाहुबल प्रदर्शित किया है,
उसने घमंडियों को तितर-बितर कर दिया है।
उसने शक्तिशालीयों को उनके आसनों से गिरा दिया
और दीनों को महान् बना दिया है।
उसने दरिद्रों को संपन्न किया
और धनियों को खाली हाथ लौटा दिया है।
इब्राहीम और उनके वंश के प्रति
अपनी चिरस्थाई दया को स्मरण कर,
उसने हमारे पूर्वजों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार
अपने दास इस्राएल की सुधि ली है।" लूकस 1 : 46-55
आईए, हम सब ईसा मसीह की पवित्र जीवनशैली को जी कर, उपवास के द्वारा अपने शरीर पर लगाम लगाएं और आत्मा को ईश्वर की निरंतर महिमा में व्यस्त कर दें।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!