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हमारे लाईफ-स्टाइल का दर्पण

प्रकाशित 21/07/2023 - 25/07/2023


21/09/2023


टेढ़ा मेढ़ा चौड़ा राह मानव आत्मा के लिए घातक है। यह मानव आत्मा को पूरी तरह से हौले हौले पथभ्रष्ट कर तबाह और बर्बाद कर देने वाला राह है। यही निर्वासन की राह है, जहां मनुष्य सत्य से स्वयं निर्वासित होकर असत्य के टेढ़े मेढ़े चौड़े राह में भटकता रहता है। आदम हेवा अदन वाटिका से निर्जन प्रदेश में अपनी संसारिक वासनाओं के कारण निर्वासित हुए। कितना ही बड़ा था आदम हेवा के निर्वासन का कारण!! देखने सुनने में तो बहुत मामूली-सा टेढ़े मेढ़े रास्ते पर वे निकल पड़े थे, लेकिन उनका निर्वासन मामूली नहीं था- उनके निर्वासन का दण्ड सारी मानव जाति भोग रही है। काश! आदम हेवा शैतान को परास्त करना जानते। काश! आदम हेवा ईश्वर की आज्ञा का पालन करते, तो शैतान पछाड़ दिया जाता। काश!ऐसा होता तो हम सब मानवजाति अदन वाटिका के भीतर ही पैदा होते!! जरा सोचिए कि जब हमारा शत्रु, शैतान, अदन वाटिका के भीतर छल सकता है, तो अदन वाटिका के बाहर, हम सब जिनकी सृष्टि हुई है, कितनी आसानी से छले जा सकते हैं!! हम सब के शत्रु, शैतान, के छलावे से बचाव का सिर्फ और सिर्फ एक ही उपाय है -


परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21


उड़ाऊं पुत्र की तरह प्रेम की वाटिका से निकल कर दूर दूर तक निर्जन प्रदेश में भटक रहे हम मनुष्यों से योहन पश्चात के द्वारा निर्वसन से घर वापसी का ऐलान करते हैं। चाहे हम प्रेम की वाटिका से निर्जन प्रदेश में एक फीट दूर या सौ फीट दूर या बहुत ज्यादा दूर दूर क्यों ना निर्वासित हैं गये हैं, हमें निर्जन प्रदेश की कंकड़ीली पथरीली सूखा ग्रस्त कंटीली झाड़ झंकाड़ बबूल की नोकीली झाड़ियों से अपने बहुमूल्य जीवन को बर्बाद करने के बजाय, योहन की घर वापसी का ऐलान जल्द कबूल करना चाहिए-


निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश


ईश्वर के वचन का पालन नहीं करने की वजह से प्रेम की वाटिका से निर्वासित मनुष्यों की आत्मिक स्थिति का जायजा प्रभु लेते हैं। निर्जन प्रदेश के बाहर दिन-ब-दिन लोग प्रेम की वाटिका से ज्यादा दूर होते चले जा रहे। प्रेम की वाटिका से उनकी दूरी निरंतर बढ़ती जा रही है। हम मनुष्यों का आत्मिक जायज़ ले कर हम सब के समक्ष ईसा मसीह एक दर्पण पेश करते हैं जिसमें हम अपने अपने आत्मिक स्थिति का दर्शन कर सकते हैं। उस दर्पण में हम देख सकते हैं कि


- हमारी आत्मा में शत्रुओं, शैतानों, का बोल बाला कितना है कि ईश्वर का वचन उस पर पड़ते ही, शत्रुओं द्वारा सफाचट कर दिया जाता है।


- हमारी आत्मा में शत्रुओं, शैतानों, का बोल बाला कितना है कि ईर्ष्या द्वेष लड़ाई झगड़ा क्रोध वासना व्यभिचार घमंड पाखंड दिखावा ने हमारी आत्मा को निर्जन प्रदेश की कंकड़ीली पथरीली भूमि-सा कर दिया है; कि प्रेम दया क्षमा करूणा सहनशीलता धैर्य के भाव तो उमड़ते हैं, लेकिन शीघ्र ही या देर सबेर बिलुप्त हो ही जाते हैं!!!


- हमारी आत्मा में शत्रुओं, शैतानों, का बोल बाला कितना है कि उसमें शैतानी हरकतें निर्जन प्रदेश की झाड़ झंकाड़ बबूल की कंटीली झाड़ियों से भर गया है, जो प्रेम दया क्षमा करूणा सहनशीलता धैर्य रुपी शानदार पेड़ पौधों को फलने-फूलने की जगह नहीं देते हैं!!!


- या फिर हमरा आत्मा बिल्कुल प्रेम की वाटिका में है जहां जीवन का वृक्ष तो है, लेकिन हम ईश्वर के आदेश का पालन निरंतरता से करते हुए उसका फल नहीं खाते हैं जिस कारण प्रेम दया क्षमा करूणा सहनशीलता धैर्य रुपी शानदार पेड़ पौधों फल-फूल रहें हैं जिसकी छांव से दूसरे भी आनंदित होते हैं!!! जो ईश्वर में रहता है, और जिसमें ईश्वर रहता है, वह बहुत सारा शानदार फल उत्पन्न करता है।


सुनो! कोई बोलने वाला बीज बोने निकला। बोते बोते कुछ बीच रास्ते के किनारे गिरे और आकाश के पंछियों ने आकर उन्हें चुग लिया। कुछ बीच पथरीली भूमि पर गिरे, जहां उन्हें अधिक मिट्टी नहीं मिली। वे जल्द ही उग गए क्योंकि उनकी मिट्टी गहरी नहीं थी। सूरज चढ़ने पर वे झुलस गए और जल ना होने के कारण सुख गए। कुछ बीच कांटो में गिरे और कांटो ने बढ़ कर उन्हें दबा दिया, इसलिए वे फल नहीं लाए। कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे। वे उग कर फले-फूले और तीस गुना साठ गुना या सौ गुना फल लाये।
अंत में उन्होंने कहा, "जिसके सुनने के कान हो, वह सुन ले!" संत मारकुस 4 : 3-9


हमें ईश्वर की महिमा करने के लिए ईश्वर के वचन को सुनकर प्रेम का फल उत्पन्न करने के लिए, निर्जन प्रदेश में शैतान को परास्त कर प्रेम की वाटिका में करना जरूरी है; निर्जन प्रदेश में प्रेम का फल कतई उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। जिस रफ्तार हम निर्जन प्रदेश से प्रेम की वाटिका की ओर बढ़ेंगे, उसी रफ्तार से ईश्वर की महिमा बढ़ती चली जाएगी।


यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10


क्योंकि


उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7


25/07/2023


बीज बोने वाले का दृष्टांत संत मारकुस 4 : 3-9 * में ईसा मसीह ने *आत्मिक दर्पण प्रस्तुत किए। हम अपने दिन की शुरुआत अकसर दर्पण में अपना शक्ल देख कर करते हैं और दिन में कई बार दर्पण देखते हैं। लेकिन शायद ही हम आत्मिक दर्पण में अपनी आत्मा का शक्ल देख कर, हमें अपने सदृश्य अपनी महिमा के लिए गढ़ने वाले सृष्टिकर्ता ईश्वर की निरंतरता से महिमा के लिए अपनी आत्मा को सवांरते हैं!‌ क्योंकि लिखा है-


प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं है और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। नबी इसायाह का ग्रंथ 55 : 8


ईश्वर ने हमें अपनी महिमा के लिए हमें बिलकुल अपने सदृश्य आत्मा प्रदान किए हैं। अब हमारा यह कर्तव्य है कि हम आत्मिक दर्पण में अपनी आत्मा का प्रतिबिंब देखकर उसे ईश्वर के सदृश्य संवारे। क्योंकि लिखा है-


उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7


हम मनुष्य सांसारिक दर्पण देख देख कर आपसी होड़ (घमंड पाखंड दिखावा ईष्र्या द्वेष मनमुटाव कानाफूसी.......), और संसारिक वासना व्याभिचार नशापान जैसे टेढ़े मेढ़े चौड़े रास्ते में भटक कर अपनी आत्मा को ईश्वर के सदृश्य नहीं बख्शते हैं। यही कारण है कि योहन हमें आत्मिक दर्पण देखने का आह्वान करते हुए करते हैं-


निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश


आत्मिक दर्पण देखने का तरीका बताते हुए प्रभु ईसा मसीह कहते हैं-


परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21


जितना ज्यादा है हम आत्मिक दर्पण देखेंगे, उसी अनुपात में हम ईश्वर के सदृश्य अपनी आत्मा को संवार कर उनकी महिमा बढ़ाएंगे।


यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!