प्रकाशित 13/07/2023
पेत्रुस और ईसा मसीह के बीच हुए वार्तालाप को ध्यान से पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पेत्रुस जिस दृष्टिकोण से अपनी बात ईसा मसीह के सामने समक्ष रख रहें हैं, वह मानवीय तौर पर बिल्कुल सही है। हमारे बीच भी यदि कोई अपनी मौत की बात करे, तो क्या हम उसे नहीं रोकेंगे? पेत्रुस भी तो यही कर रहे थे!!
उस समय से ईसा मसीह अपने शिष्यों को स्पष्ट शब्दों में यह समझाने लगे कि मानव पुत्र को दुख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीन दिन के बाद भी उठना होगा। पेत्रुस ईसा को अलग ले जाकर फटकारने लगा। संत मारकुस 8 : 31-32
क्या कर रहे हैं पेत्रुस? अपने गुरु, अपने प्रभु की मौत की कथा से दुखित हो गये हैं और इस तरह की बातें नहीं सुनना चाहते हैं। मगर, पेत्रुस की संसारिकता की अच्छाई में ही बुराई छिपी हुई हैं!!! हम मनुष्यों को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि हमारी अच्छाई में ही हमारा शत्रु, शैतान हमारी एड़ी काट कर हमें टेढ़े मेढ़े रास्ते पर आसानी से चलायमान करने की क्षमता रखता है जैसा कि उसने पेत्रुस के साथ किया है अतः ईसा मसीह को उसे डांटना पड़ा-
किन्तु ईसा ने मुड़कर अपने शिष्यों की ओर देखा, और पेत्रुस को डांटते हुए कहा, "हट जाओ शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो। संत मारकुस 8 : 33
हम मनुष्यों की सांसारिक सोच-विचार, सांसारिक प्रेम- शैतान का मनुष्य में प्रवेश का रास्ता आसान बनाती है। इन सब बातों को पेत्रुस महान बखूबी समझ समझ गए इसलिए हम मनुष्यों को सलाह देते हैं -
आप संयम रखें, और जागते रहे! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचारता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाएं। संत पेत्रुस का पहला पत्र 5 : 8
संयम और जागने शब्दों से उनका तात्पर्य शत्रु, शैतान को शिकस्त देने की तैयारी से है, जो उपवास और प्रार्थना का पर्यायवाची है क्योंकि स्वयं ईसा मसीह, हमलावर शत्रु, शैतान को पछाड़ने का तरकीब हम सभी लोगों को सिखलाते हुए कहते हैं -
परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21
इसलिए हम सभी मनुष्यों की निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना का उत्साह अपने आप में जगाने की जरूरत है, ताकि हर वक्त हम ईश्वर के अधीन रहते हुए ईश्वर की छत्रछाया में हमलावर शैतान को ईश्वर से शक्ति प्राप्त कर पछाड़ने में कामयाब हो सकें। ईश्वर के अधीन रहें बिना, ईश्वर की छत्रछाया के बिना, निर्मम शैतान को हराना असंभव है; इसलिए याकूब लिखते हैं -
आप लोग ईश्वर के अधीन रहें। शैतान का सामना करें और वह आपके पास से भाग जाएगा। संत यकूब का पत्र 4 : 7
जब कोई संयम धारण करता है और जागता रहता है या कहिए उपवास और प्रार्थना उत्साह से करता है, वह टेढ़े मेढ़े रास्ते को छोड़ प्रज्ञा प्राप्ति की अग्रसर होता है। जीवन में हम मनुष्यों को शैतान को परास्त करने के लिए प्रज्ञा की प्राप्ति जरूरी है क्योंकि प्रज्ञा ठीक से जानती है कि ईश्वर को क्या अच्छा लगता है और ईश्वर को क्या अच्छा नहीं लगता है -
प्रज्ञा को अपने पवित्र स्वर्ग से उतरने दे। उसे अपने महिमामय सिंहासन से भेज, जिससे वह मेरे साथ रहकर क्रियाशील हो और मैं जानू कि तुझे क्या प्रिय है; क्योंकि वह सब कुछ जानती और समझती है। वह सावधानी से मेरा पथ प्रदर्शन करेगी और अपनी महिमा से मेरी रक्षा करेगी। प्रज्ञा ग्रंथ 9 : 10-11
टेढ़े मेढे रास्ते का उपवास और परहेज निरंतरता से करने वाले प्रज्ञा प्राप्त करेंगे। उन्हें प्रज्ञा, ईश्वर के सीधे पथ पर चलायमान होने में मदद कर ईश्वर के दर्शन कराएगी क्योंकि प्रज्ञा को अच्छी तरह से मालूम है कि ईश्वर को क्या अच्छा लगता है और क्या अच्छा नहीं लगता है। प्रज्ञा के बिना ईश्वर को खुश करना असंभव है। इसलिए हम प्रत्येक जन को प्रज्ञा प्राप्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए। प्रज्ञा विहिन व्यक्ति का आचरण भले ही संसार को अच्छा लगे, लेकिन ईसा वैसे लोगों के लिए कहते हैं -
तुम लोग तो अपने ही पिता-जैसा आचरण करते हो। संत योहन 8 : 41 वचनांश
विचारने वाली बात यह है कि हमारा संसार का आचरण भले ही लोगों को अच्छा लगता हो! क्या वह ईश्वर को प्रिय है? क्या पेत्रुस का उपरोक्त वर्णित संसारिक आचरण ईसा को प्रिय लगा?
जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जाएगा। संत मत्ती 23 : 12 वचनांश
इसलिए योहन का आव्हान है -
निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश
क्योंकि
उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7
इसलिए हम जिस अनुपात में हमारा संसार को प्रिय लगने और ईश्वर को अप्रिय लगने वाला आचरण कम होगा, ठीक उसी अनुपात में ईश्वर की महिमा बढ़ेगी; इसलिए योहन कहते हैं-
यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!