प्रकाशित 11/07/2023
इस संसार में जंगली जीव जंतुओं में एक ऐसा जीव है, जो कभी सीधा चलना जानता ही नहीं है; वह हमेशा टेढ़ा मेढ़ा चाल ही चलता है- क्या आप उस जीव का नाम जानते हैं?
ईश्वर ने जिन जंगली जीव जंतुओं को बनाया था, उसमें सांप सबसे धूर्त था। उसने स्त्री से कहा, "क्या ईश्वर ने सचमुच तुमको मना किया है कि वाटिका के किसी वृक्ष का फल मत खाना?" उत्पत्ति ग्रंथ 3 :1
इसी टेढ़े मेढ़े चाल वाले धूर्त सांप का रूप धारण कर, ईश्वर का शत्रु, शैतान, उत्पत्ति के समय से ही मानव जीवन के सीधे (सत्य के) रास्ते को टेढ़े मेढ़े (असत्यमय) करने का अथक प्रयास शुरू कर दिया। यही कारण है कि ईश्वर ने उसके और मनुष्य के बीच शत्रुता उत्पन्न किया है, ताकि मनुष्य पीढ़ी दर पीढ़ी उसे अपना शत्रु माने और उसे युद्ध में परास्त कर इस मायावी लोक में ईश्वर की महिमा सिद्ध कर अनंत काल तक के लिए ईश्वर की महिमा करने का टिकट कटाए। इसलिए लिखा है-
प्रभु ईश्वर ने स्त्री से कहा, "तुमने क्या किया है?" और उसने उत्तर दिया, "सांप ने मुझको बहका दिया है और मैंने खा लिया।" तब ईश्वर ने सांप से कहा, "चूंकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खाएगा। मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूंगा। वह तेरा सर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा।" उत्पत्ति ग्रंथ 3 :13-15
चूंकि शैतान ने ईश्वर को अपना शत्रु मानने के कारण पहले इंसान (हेवा) को बहकाया और वह बहक गयी इसलिए ईश्वर ने दोनों के बीच वंश दर वंश घोर शत्रुता उत्पन्न कर दिया, ताकि ईश्वर के कारण हम मनुष्यों को अपना शत्रु मानने वाले शैतान को ठीक से पहचान कर हम उसे अपने जीवन में बार-बर (जब जब वह हमारी एड़ी को काटकर हमारे जीवन के सीधे रास्ते को टेढ़ा मेढ़ा करने का प्रयास करें) परास्त करें और अपना रुख सीधा स्वर्ग की ओर कर दें। यही कारण है कि योहन अदन वाटिका अर्थात प्रेम की वाटिका को निर्जन प्रदेश बनाने वाले शैतान के विरुद्ध हम मानव जाति को स्मरण दिलाते हुए कहते हैं-
निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश
उनके कहने का अर्थ है कि हम मनुष्यों को शैतान के बहकावे में आकर उसके (सांप के) टेढ़े मेढ़े रास्ते का अनुसरण नहीं करना है, बल्कि उसके बहकावे (धूर्तता) को पहचान, उसे परास्त कर ईश्वर और हमारे बीच की खाई को तुरंत समाप्त कर देना है। उसे परास्त करने वाले ईसा मसीह हम सबको उसे परास्त करने का गूढ़ रहस्य सिखलाते हुए कहते हैं-
परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21
टेढ़ी-मेढ़ी चाल वाली सर्प की यह जाति, शैतान, ने आदम हेवा के जीवन की राह को टेढ़ा मेढ़ा कर दिया, पेत्रुस के भी जीवन की राह को कई बार टेढ़ा मेढ़ा किया, ईसा मसीह के जीवन की राह को टेढ़ा मेढ़ा करने का प्रयास किया, यूदस के जीवन की राह को टेढ़ा मेढ़ा कर बर्बाद कर दिया........ क्योंकि इस शैतान का चाल ही टेढ़ी-मेढ़ी है इसलिए वह हर मनुष्य का चाल यह टेढ़ा मेढ़ा कर देना चाहता है। यदि इसे हराना है, तो निरंतरता से जीवन भर टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास शुरू कर दे। क्योंकि लिखा है -
उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7
उनकी महिमा करने के लिए टेढ़े-मेढ़े लंबे रास्ते को छोड़, सीधा सपाट छोटे रास्ते पर चलने का उत्साह अपने जीवन में उत्पन्न करना जरूरी है -
जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जाएगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जाएगा। संत मत्ती 23 : 12
क्योंकि
योहान बपतिस्ता के समय से आज तक लोग स्वर्ग राज्य के लिए बहुत प्रयत्न कर रहे हैं और जिनमें में उत्साह है, वह उस पर अधिकार प्राप्त करते हैं। संत मत्ती 11 : 12
इसलिए
आप संयम रखें, और जागते रहे! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचारता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाएं। संत पेत्रुस का पहला पत्र 5 : 8
और याकूब भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता से टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास और परहेज कर, ईश्वर की अधीनता प्राप्त कर शैतान को आसानी से परास्त कर सकते हैं-
आप लोग ईश्वर के अधीन रहें। शैतान का सामना करें और वह आपके पास से भाग जाएगा। संत यकूब का पत्र 4 : 7
लेकिन जो मनुष्य टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास परहेज करने के बजाय उसका मजा लेता है, वह शैतान को ही अपना माई बाप मानकर उसके पीछे उसके टेढ़े मेढ़े रास्ते पर निकल जाता है और ईश्वर और उसके बीच की खाई गहरी होती जाती है-
धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है। संत मत्ती 18 : 7 वचनांश
यही कारण है कि योहन टेढ़े मेढ़े (शैतानी) रास्ते को जीवन में घटाने और सीधे (ईश्वरीय) रास्ते को जीवन में बढ़ाने की शिक्षा देते हुए करते हैं-
यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!