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लाईफ-स्टाइल और मां-बाप

प्रकाशित 09/07/2023


यह वही योहन हैं जिन के विषय में ईसा मसीह कहते हैं-


मैं तुम लोगों से यह कहता हूं- मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई पैदा नहीं हुआ। फिर भी, स्वर्ग राज में जो सबसे छोटा है, वह योहन से बड़ा है। संत मत्ती 11 : 11


उपरोक्त वचन बात को प्रमाणित करता है कि मनुष्य अपने सांसारिक जीवन काल में संत नहीं हो सकता है। वह इस संसार में इसलिए पैदा किया गया है कि वह अपने संसारिक जीवन में संत बनने हेतु जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास और परहेज कर संत बनने की दिशा में अग्रसर हो जाए।


टेढ़े मेढ़े रास्ते को सीधा करने का आह्वान कर ईश्वर का मार्ग तैयार करने वाले योहन भी इस संसारिक जीवन में मनुष्य के बीच सबसे बड़े हैं, लेकिन उस वक्त वे स्वर्ग में सबसे छोटे संत के बराबर भी नहीं हैं। उन्होंने इस संसार में हमारे शत्रु, शैतान को बार-बार शिकस्त दे कर अपने जीवन का रास्ता का रुख सीधा स्वर्ग की ओर रखा; इस प्रकार वे मरनोपरांत स्वर्ग पहुंचकर संत का दर्जा प्राप्त किए हैं।


यदि हमें भी, योहन की तरह , इस संसार में मनुष्य के बीच बड़ा होना है, तो योहन की तरह शैतान को शिकस्त देकर अपने जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्ते को सीधा करना होगा; इसलिए तो ईसा मसीह करते हैं -


जो तुम लोगों में से सबसे बड़ा है, वह तुम्हारा सेवक बने। संत मत्ती 23 : 11


हमलोगों के बीच में बड़ा वही है, जो सबसे छोटा है; और छोटा वह है जिसने हमारे शत्रु , घमंड को परास्त किया है, पाखंड को परास्त किया है, दिखावा को परास्त किया है, लालच को परास्त किया है, क्रोध को परास्त किया है.......... नाना प्रकार की बुराईयों को परास्त किया है और निरंतरता से परास्त करने के लिए संघर्षरत है! वह अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के लिए अपने जीवन के असत्यमय रास्तों को सत्य परिणत करने के लिए प्रतिबद्ध और प्रयत्नशील है। ऐसे लोगों को स्वर्ग में सबसे छोटे संत का दर्जा देने का एलान करते हुए प्रभु कहते हैं -


जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जाएगा। संत मत्ती 23 : 12 वचनांश


लेकिन, जो अपने को इस संसार की संसारिक वासनाओं के कारण बड़ा मानता है, उसके जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों के कारण प्रभु कहते हैं-


जो अपने को बड़ा मानता है वह छोटा बनाया जाएगा। संत मत्ती 23 : 12 वचनांश


बताइए भला! ईश्वर हम मनुष्यों के बीच जिन्हें उनके टेढ़े मेढ़े चाल के कारण छोटा घोषित करेंगे, वे संतों का दर्जा कैसे प्राप्त करेगा? यदि हम गिरजा जाते हैं, धार्मिक अनुष्ठानों मे भाग लेते हैं, नोबिना करते हैं, आराधनालय जाते हैं....... फिर भी दीन हीन नहीं (छोटे) बनते हैं, तो क्या ईश्वर हमें मनुष्यों के बीच में बड़ा मानेगा? यह सवाल अपने आप से पूछना बहुत जरूरी है क्योंकि ईसा मसीह कहते हैं-


योहान बपतिस्ता के समय से आज तक लोग स्वर्ग राज्य के लिए बहुत प्रयत्न कर रहे हैं और जिनमें में उत्साह है, वह उस पर अधिकार प्राप्त करते हैं। संत मत्ती 11 : 12


किस बात का उत्साह? औरों से छोटा होने का उत्साह!! सेवक बनने का उत्साह!! स्वामी नहीं बनने का उत्साह!! जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्ते को सीधा करने का उत्साह! जीवन के सीधे रास्ते को निरंतर टेढ़े मेढ़े रास्ते करने का उत्साही, निर्मम शत्रु, शैतान, को बार-बार शिकस्त देने का उत्साह!! ऐसे उत्साह के कारण ही कोई निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना में लग सकता है। निरंतरता से उपवास और प्रार्थना करने का उत्साह!! क्योंकि ईसा मसीह कहते हैं -


परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21


उस वक्त तक पेत्रुस भी शत्रु को शिकस्त देने की तरकीब को नहीं समझ पाए थे, नहीं तो ईसा मसीह को उसे डांटने की क्या जरूरत पड़ती?


किन्तु ईसा ने मुड़कर अपने शिष्यों की ओर देखा, और पेत्रुस को डांटते हुए कहा, "हट जाओ शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो। संत मारकुस 8 : 33


बाद में पेत्रुस शैतान को शिकस्त देने की तरकीब को समझ पाए और अपने जीवन में लागू किए और उसी अनुभव के आधार पर वे कहते हैं-


आप संयम रखें, और जागते रहे! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचारता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाएं। संत पेत्रुस का पहला पत्र 5 : 8


और याकूब भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जो ईश्वर के अधीन है, वह ईश्वर की नजर में मनुष्यों के बीच सबसे छोटा है; जिसका निर्मम शत्रु, शैतान भी भय खाता है -


आप लोग ईश्वर के अधीन रहें। शैतान का सामना करें और वह आपके पास से भाग जाएगा। संत यकूब का पत्र 4 : 7


बताइए भला! कि लम्बा रास्ता कौन सा है - टेढ़ा मेढ़ा रास्ता या सीधा रास्ता? लंबा रास्ता स्वर्ग तक नहीं जाता है; वह मनुष्यों को नरक में सदा के लिए विलीन करने वाला रास्ता है; इसलिए योहन लम्बे रास्ते को छोटा बनने का आह्वान करते हुए कहते हैं-


निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश


जबकि इस मायावी लोक के बड़े बड़े लोगों (घमंडि पाखंडी दिखावा क्रोध लालच व्यभिचार नशेड़ियों... इत्यादि इत्यादि) को ईसा मसीह धिक्कारते हुए कहते हैं -


धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है। संत मत्ती 18 : 7 वचनांश


इस मायावी लोक में ईश्वर ने हमें अपने शत्रु, शैतान, को परास्त कर उनकी महिमा सिद्ध करने के लिए भेजा है, ताकि हम अनंत काल तक के लिए ईश्वर की महिमा के लिए इस संसार में दीन हीन (छोटे) घोषित किए जाएं; इसलिए लिखा है-


उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7


इसलिए हम जिस अनुपात में दीन हीन (छोटे) होंगे, ठीक उसी अनुपात में ईश्वर की महिमा बढ़ेगी; इसलिए योहन कहते हैं-


यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!