प्रकाशित 07/07/2023
सांसारिक वासनाओं में घिर कर, ईश्वर की सत्य के राह को छोड़कर, टेढ़े मेढ़े रास्ते पर चलने वाले लोग अपने जन्मदाता माता-पिता से ज्यादा मानव जीवन को टेढ़े मेढ़े रास्ते पर घसीटने वाले हमारे शत्रु, शैतान से ही ज्यादा प्रेम करने लगते हैं। यही कारण है कि ईसा मसीह कहते हैं-
सांप के बच्चों! तुम बुरे हो कर अच्छी बातें कैसे कह सकते हो? जो हृदय में भरा है, वही तो मुंह से बाहर आता है। अच्छा मनुष्य अपने अच्छे भंडार से अच्छी चीजें निकालता है, और बुरा मनुष्य अपने बुरे भंडार से बुरी चीजें। संत मत्ती 12 : 34-35
हमारा यह शत्रु, शैतान, हमारे अच्छे विचारों को पलटने का निरंतर प्रयास करता है। जब वह हमारे मन के विचारों को अपने अनुसार (असत्य में) बदल पाता है, तब हमारे शरीर की इन्द्रियां उन बदले हुए विचारों के अनुसार हरकत करने लगती है। इस प्रकार हम अपने माता पिता भाई बहनों रिश्तेदार नातेदारों से ज्यादा अपने शत्रु को अपना सब कुछ समझने लगते हैं, तो परिणाम स्वरूप पारिवारिक अशांति, पारिवारिक टूट, बात बंदी, परस्पर बैर, मनमुटाव, देख नहीं सहना, पक्षपात, वैमनस्य, टीका टिप्पणी, असहनशीलता, अधैर्य, कटुता, अविश्वास इत्यादि इत्यादि स्वत: फलने-फूलने लगता हैं और जीवन में महसूस किया जाता है।
उड़ाऊं पुत्र के परिवार की पारिवारिक अशांति, टूट एवं मतभेद, हमारे शत्रु, शैतान, के घातक हमले का जीवंत उदाहरण है। उड़ाऊं पुत्र शत्रु, शैतान, को ही अपने सारे मन से अपनी सारी बुद्धि से और अपनी सारी आत्मा से, अपना माता पिता मान लिया- इतना कि उसके अपने जन्मदाता पिता के प्रति उसके मन में थोड़ा भी प्रेम, दया और संवेदना नहीं बचा और वह अपने उम्र दराज पिता को छोड़कर जबरन संपत्ति का बंटवारा करा कर परदेश चला गया। यही कारण है कि ईसा मसीह कहते हैं -
जो अपने पिता या माता को मुझ से अधिक प्यार करता है। वह मेरे योग्य नहीं, जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है वह मेरे योग्य नहीं। संत मत्ती 10 : 37
हमारा निर्मम शत्रु, शैतान मानव जाति को लगातार फाड़ खाने में फिराक में रहता है। वह किस रूप (ईष्र्या द्वेष क्रोध व्यभिचार लालच घमंड ........ इत्यादि) में किसमे प्रवेश कर जाए, हम नहीं समझ पाएंगे जब तक कि उससे लड़ने के लिए हम निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना के द्वारा अपने आप को उससे युद्ध के लिए तैयार नहीं करेंगे!! वह तो ईसा मसीह के प्रिय शिष्य पेत्रुस पर भी हावी हो सका था; इसलिए तो ईसा मसीह को उसे डांटना पड़ा था क्योंकि शैतान पेत्रुस की आड़ ले कर ईसा मसीह पर हमला कर रहा था-
किन्तु ईसा ने मुड़कर अपने शिष्यों की ओर देखा, और पेत्रुस को डांटते हुए कहा, "हट जाओ शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो। संत मारकुस 8 : 33
जरा सोचिए! कि शैतान बड़ी आसानी से ईसा मसीह के बगल में बैठे पेत्रुस उसके मन पर हावी हो कर, ना सिर्फ पेत्रुस के जीवन की राह को टेढ़ा मेढ़ा किया, बल्कि अपने प्रभु ईश्वर की भी राह को टेढ़ा मेढ़ा करने का प्रयास किया!! पेत्रुस ने भली-भांति शैतान के हमले का अनुभव किया है; इसलिए वे कहते हैं -
आप संयम रखें, और जागते रहे! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचारता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाएं। संत पेत्रुस का पहला पत्र 5 : 8
ईश्वर में ढृढता की बात, याकूब अपने पत्र में करते हुए यह बतलाना चाहते हैं कि शैतान को शिकस्त दिया जा सकता है, बर्शते हम टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास करने का निश्चय कर ले और ईश्वर के सत्य के रास्ते पर चलना शुरू कर दें क्योंकि सत्य और असत्य के रास्ते पर एक साथ नहीं चला जा सकता है-
आप लोग ईश्वर के अधीन रहें। शैतान का सामना करें और वह आपके पास से भाग जाएगा। संत यकूब का पत्र 4 : 7
इस मायावी लोक में ईश्वर के अधीन वही रह सकता है, जिसने टेढ़े मेढ़े रास्ते का उपवास करने का ठान लिया है। ईश्वर ऐसे ही अपने अजीज व्यक्तियों की, अपने मित्रों की रक्षा, फाड़ खाने को उतारु शत्रु, शैतान, से करते हैं। जिसने भी इस मायावी लोक में अपने को लुटा दिया, समझो उसने शैतान को अपना माई बाप बना लिया। इसलिए ईसा मसीह बतला रहे हैं कि
परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती। संत मत्ती 17 : 21
और योहन धार्मिकता का आह्वान करते हैं-
निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश
जबकि इस मायावी लोक में फिदा लोगों को ईसा मसीह धिक्कारते हुए कहते हैं -
धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है। संत मत्ती 18 : 7 वचनांश
इसलिए हम सबको यह आकलन करने की जरूरत है कि हम इस मायावी लोक के कौन कौन सी मायाजालों में कितना फंस गए हैं क्योंकि
उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7
इसलिए हमारे जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों का जिस अनुपात में उपवास होगा, ईश्वर की महिमा उसी अनुपात में बढ़ेगी।
यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!