प्रकाशित 04/07/2023
यह वही योहन हैं जिन्होंने मानव जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों को सीधा करने का आह्वान दे कर हम मनुष्यों को अपने और ईश्वर के बीच की खाई को पाटने काम, जीवन भर करने का न्योता देते हैं। वे मनुष्यों को अपने जीवन में गर्भावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक ईश्वर में ढृढ़ रहने का आह्वान है। इसका अर्थ यह हुआ कि ढृढ़ीकरण संस्कार वह धार्मिक प्रक्रिया है, जो माता के गर्भ से शुरू होकर आखरी सांस तक जारी रहनी चाहिए क्योंकि मानव शरीर और आत्मा दोनों ही ईश्वर की महिमा के लिए रची गई है- शरीर जब तक कि मिट्टी में नहीं मिल जाता है और आत्मा अनंत काल तक। इसलिए जीवन के हर अवस्था में ढृढ़ीकरण संस्कार ग्रहण करते हुए हम मनुष्यों को ईश्वर में बने रहना चाहिए क्योंकि यह किसी को यह नहीं पता कि उसकी अंतिम सांस का वक्त क्या है -
उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता-न तो स्वर्ग के दूत और न पुत्र। केवल पिता ही जानता है। संत मत्ती 24 : 36
उस समय दो पुरुष खेत में होंगे-एक उठा लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियां चक्की पीसती होंगी- एक उठा ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी। संत मत्ती 24 : 40-41
जो ईश्वर में ढृढ़ पाया जाएगा / जाएगी, वह ईश्वर की अनंत कालीन महिमा के लिए उठा लिया जाएगा / जाएगी। अतः मानव जीवन के तमाम अवस्थाओं गर्भावस्था, शिशु अवस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, अधेड़ अवस्था और वृद्धावस्था में निरंतरता के साथ ढृढ़ीकरण संस्कार ग्रहण करते रहना जरूरी है, ताकि ईश्वर और हमारे बीच किसी प्रकार का थोड़ा भी दूरी ना हो।
कलीसिया में मात्र एक बार दी जाने वाली ढृढ़ीकरण संस्कार का मानव जीवन के प्रत्येक अवस्था में बहुत महत्व है, जो इस प्रकार है-
शिशु अवस्था -
१. जो धार्मिक शिक्षा तू ने ईश्वर की महिमा में अपनी माता के गर्भ में प्राप्त किया है, उस पर कायम रहो, जिससे तुम ईश्वर में ढृढ़ बने रहो।
२. किसी गर्भवती महिला के परिवेश में जब प्रवेश करो, तो वहां किसी प्रकार का अधर्म मत करो क्योंकि गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहा बच्चा सब कुछ सुनता और समझता है; उसे ईश्वर में ढृढ़ करना तुम्हारा कर्तव्य है। यही तो योहन का आह्वान भी है -
निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो। संत लूकस 3 : 4 वचनांश
शिशु अवस्था से युवावस्था -
जो बच्चा गर्भावस्था में सब कुछ सुनता और सब कुछ जानता है, उसके तो अब सब के सब इंद्रियां पूरी तरह से खुले हैं इसलिए उसे ईश्वर में ढृढ़ करना उसके इर्द-गर्द आने जाने वाले तमाम लोगों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों से लेकर जाने अनजाने लोगों का कर्तव्य होता है।
३. जो सत्य शिक्षा तू ने ईश्वर की महिमा में अपने शिशु अवस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था और युवावस्था में प्राप्त किया है, उस पर निरंतर कायम रहो, जिससे तुम सदा ईश्वर में ढृढ़ बने रहो।
४. किसी शिशु बालक किशोर किशोर या युवा के संपर्क में आने पर किसी प्रकार का अधर्म या असत्य का उदाहरण और नमूना पेश मत करो क्योंकि शिशु, बालक बालिकाओं, किशोर किशोरियों या युवाक युवतियों का मन तुरंत विचलित हो सकता है; वे जल्द ही असत्य के टेढ़े मेढ़े रास्ते में भटक सकते हैं। स्मरण रहे कि ईश्वर में उन्हें ढृढ़ करना तुम्हारा कर्तव्य है-
जो मुझ पर विश्वास करने वाले उन नन्हों में से एक के लिए भी पाप का कारण बनता है, उसके लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाट बांधा जाता और वह समुद्र में डूबा दिया जाता। संत मत्ती 18 : 6
युवावस्था से वृद्धावस्था -
५. तुम्हारे जीवन में आने जाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए पाप का कारण मत बनो क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह गर्भावस्था से लेकर जीवन के किसी अवस्था में क्यों ना हो, ईश्वर में ढृढ़ करना तुम्हारा कर्तव्य है-
धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है। संत मत्ती 18 : 7 वचनांश
६. धार्मिकता में व्यस्त रहो, सत्य में चलते रहो, ताकि तुम अंतिम समय ईश्वर में ढृढ़ पाए जाओ। अर्थात निरंतरता के साथ ढृढ़ीकरण संस्कार स्वयं ग्रहण करते रहो क्योंकि ईसा मसीह कहते हैं -
जागते रहो और प्रार्थना करते रहो, जिससे तुम परीक्षा में ना पड़ो। आत्मा तो ततपर है परंतु शरीर दुर्बल। संत मत्ती 26 : 41
हलांकि, कलीसिया मात्र एक ही बार ढृढ़ीकरण संस्कार देती है, लेकिन उसका संपूर्ण तात्पर्य यह है कि हम अपने जीवन के प्रत्येक पल में स्वयं ढृढकरण संस्कार ग्रहण करते हुए ईश्वर की मजबूती में आगे निरंतरता के साथ बढ़ते जाएं क्योंकि हम मनुष्यों की सृष्टि के पीछे ईश्वर का सिर्फ एक मकसद है-
उन सबों को, जो मेरे कहलाते हैं, जिनकी सृष्टि मैंने अपनी महिमा के लिए की है, जिन्हें मैंने गढ़ा और बनाया है। नबी इसायाह का ग्रंथ 43 : 7
यही कारण है कि योहन मानव जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्ते सीधे करने और ईश्वर और मनुष्यों के बीच की खाई को घटाने और ईश्वर की महिमा बढ़ाने की बात करते हुए कहते हैं-
यह उचित है कि वे बढ़ते जाएं और मैं घटता जाऊं। संत योहन 3 : 10
हमारे जीवन का टेढ़ा मेढ़ा रास्ता जैसे-जैसे सीधा होगा, ईश्वर की महिमा बढ़ेगी।
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!