प्रकाशित 07/04/2023
आप जरुर कभी ना कभी पिकनिक गये होगें। वह स्थान कैसा था? यदि आपको कभी पिकनिक जाना हो, तो कैसे स्थान में जाना पसंद करेंगे? जरूर कोई मरूभूमि या निर्जन स्थान, जहां पानी का दूर-दूर तक नामोनिशान न हो, पिकनिक मनाना पसंद नहीं करेगा। इसका अर्थ है कि सांसारिक पिकनिक के लिए पानी का होना निहायत ही जरूरी है। पिछली व्यारी में जो संपन्न हुआ, वह पहला आध्यात्मिक पिकनिक था, जिसे प्रभु ने संजीवन जलधारा के पास मनाया।
पहले धोया-
"यदि मैं तुम्हारे पैर नहीं धोऊंगा, तो तुम्हारा मेरे साथ कोई संबंध नहीं रह जाएगा।" संत योहन 13 : 8
फिर खाया और पिया -
उन्होंने रोटी ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, "यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो"। इसी तरह उन्होंने भोजन के बाद यह कहते हुए प्याला दिया, "यह प्याला मेरे रक्त का नूतन विधान है यह तुम्हारे लिए बहाया जा रहा है"। संत लूकस 22.: 19-20
इस तरह से प्रभु ने पहले धोया, फिर खिलाया पिलाया और इस तरह से प्रथम आध्यात्मिक पिकनिक को संजीवन जल की धारा के पास संपन्न कर दिया। उन्होंने इस पिकनिक को उनकी स्मृति में मनाने का आदेश दिया है। यदि हमें उनकी स्मृति में यह आध्यात्मिक पिकनिक मनाना है, तो यह निश्चित करना जरूरी है कि यह पापस्वीकार रुपी संजीवन जल की धारा के पास मनाया जाए।
इसलिए यदि मैं- तुम्हारे प्रभु और गुरु- ने तुम्हारे पैर धोये हैं, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिए। मैंने तुम्हें उदाहरण दिया है, जिससे जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया है, वैसा ही तुम भी किया करो। संत योहन 13 : 14-15
प्रभु! संजीवन जल की धारा के पास आध्यात्मिक जमावड़े (पवित्र कलीसिया) की बात कर रहे हैं, जहां लोग एक दूसरे से अपने अपने गुनाहों के लिए माफी मांगे, अपने गुनाहों की संजीवन जल की धारा में धुलाई कराएं अर्थात ईसा मसीह के कंधे पर से अपने पापों (क्रूस) का वजन कम करें और तब प्रभु भोज में सम्मिलित हो जाएं। इससे बिल्कुल स्पष्ट है कि प्रभु हमारे पाप धो कर हमारे
--> मेल-मिलाप की बातें कर रहे हैं।
--> प्रेम और शांति की बातें कर रहे हैं।
--> सयंम और धैर्य की बातें कर रहे हैं।
--> दया और क्षमा की बातें कर रहे हैं।
--> करुणा और सहनशीलता की बातें कर रहे हैं।
--> दीनताई की बातें कर रहे हैं।
प्रभु ने पिछली व्यारी में दीनताई का उदाहरण प्रस्तुत किया है और भविष्य में पिछली ब्यारी के तर्ज पर, उनकी स्मृति में संजीवन जल की धारा के पास आध्यात्मिक पिकनिक की व्यवस्था करने और उस में बार-बार सम्मिलित होने का आदेश दिए हैं। उस आध्यात्मिक पिकनिक के जमावड़े में मानव के बीच का संसारिक रिश्ता आड़े नहीं हो; ना कोई बड़ा हो और ना हीं कोई छोटा; क्योंकि यदि कोई अपने आप को बड़ा कहेगा, तो वह अपने से छोटे के विरुद्ध पाप कर उससे मेल मिलाप कैसे कर सकेगा? उसके पैर कैसे धो सकेगा? हमें ध्यान रखना होगा कि हम सब-के-सब तो एकमात्र महानतम ईश्वर की महिमा के लिए गढ़े गए हैं। इसलिए प्रभु कहते हैं -
मैं तुमसे कहता हूं- सेवक अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता और ना भेजा हुआ उसे से, जिसने उसे भेजा। यदि तुम ये बातें समझ कर उसके अनुसार आचरण करोगे, तो धन्य होगे। संत योहन 13 : 16
तो उनकी स्मृति में संजीवन जल की धारा के पास आध्यात्मिक पिकनिक की व्यवस्था और उसमें सम्मिलित होना, दीन हीन बनने की प्रक्रिया है जिसमें समय लगता है; क्योंकि यदि कोई बड़ा है, तो वह सिर्फ ईश्वर है; और ईश्वर की नजर में वही बड़ा है, जो दीन-हीन है।
धन्य है वह, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है। संत मत्ती 5 : 3
आमीन।
ईश्वर की महिमा में जारी.....
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!