डर और विश्वास

लोग सत्य में निडर, जबकि असत्य में डरपोक

प्रकाशित 26/05/2020


जो सत्य में होता है, वह बिल्कुल निडर होता है; असत्य तो लोगों को डरपोक बनाता है। योहन बपतिस्ता अपने जीवन काल में ही पूर्णतः सत्य को समर्पित हो गए थे। जो पूरी का सत्य में समर्पित होता है वह सत्य का कार्यकर्ता होता है; वह सत्य का प्रेरित होता है; वह ईश्वर की अप्रत्यक्ष एकमात्र धार्मिक कलीसिया का मजबूत सदस्य होता है। वैसे व्यक्ति का आचरण, ईसा मसीह के असत्य से घृणा करने के आचरण से बिल्कुल मेल खाता है; और वह असत्य देखकर, ईश्वर की कृपा से उसके सफाई में लग जाता है। यही कारण है कि असत्य की सफाई में, असत्य की धुलाई में वह बिल्कुल निडर होता है; जैसे कि योहान बपतिस्ता ने अपने जीवन काल में अपने राजा हेरोद की असत्य की धुलाई में अपने प्राण जाने की भी परवाह नहीं किए। ज्ञात हो कि राजा हेरोद अपने भाई की पत्नी के साथ व्यभिचार कर रहा था, इसलिए योहान बपतिस्ता ने असत्य की धुलाई करने के लिए अपने राजा के दरबार में ही, अपने राजा के विरुद्ध आवाज उठाई; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


हेरोद ने अपने भाई फिलिप की पत्नी हरोदियस के कारण योहन को गिरफ्तार किया और बंदी गृह में बांधकर रखा था; क्योंकि हेरोद ने हरोदियस से विवाह किया था और योहन ने हेरोद से कहा था, "अपने भाई की पत्नी को रखना आपके लिए उचित नहीं है।" संत मरकुस 6 : 17-18


योहन जानता था कि राजा उसे गिरफ्तार करेगा, फिर भी सत्य के प्रति उसकी निष्ठा और समर्पण ने उसे राजा के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित कर दिया। योहन सत्य का सच्चा प्रेरित है। ईसा मसीह के शिष्य, अनुयायी और प्रेरित कहे जाने वाले लोग, ईसा मसीह के पकड़े जाने के बाद से डर के मारे एक कमरे में बंद थे। उनके पास इतना ज्यादा डर क्यों था? इसलिए कि वे धर्म का मर्म नहीं जानते थे! सत्य का मर्म और मार्ग नहीं जानते थे! वे सत्य करना तो चाहते थे, लेकिन असत्य उन पर हावी हो जाती थी। वे उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) के द्वारा असत्य को पूरी तरह से पछाड़ना नहीं सीखे थे। वे उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) की निरंतरता के मर्म को ठीक से नहीं समझ पाए थे। वे यह नहीं समझ पाए थे कि असत्य की जाति (शैतान की जाति) सिर्फ और सिर्फ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) की निरंतरता के द्वारा ही निकाली जा सकती है। वे यह नहीं समझ पाए थे कि दूसरों का असत्य निकालने से पहले, अपने अंदर का असत्य निकालना बेहद ही जरूरी है। वे कहते थे कि वे विश्वास करते हैं, लेकिन विश्वास की प्रक्रिया के द्वारा वे प्रेम की पराकाष्ठा को नहीं छू पाए थे। वे यह नहीं समझ पाए थे कि प्रेम ही ईश्वर है। वे यह नहीं समझ पाए थे कि सत्य ही ईश्वर है। वे यह नहीं समझ पाए थे कि वचन ही ईश्वर। वे यह नहीं समझ पाए थे कि जिसने अपने विश्वास की प्रक्रिया के द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को छू लिया, उसने अपने शरीर रुपी मंदिर की आत्मा रूपी वेदी पर सत्य को सुसज्जित कर शोभायमान कर लिया।‌ जिसने सत्य को अपने हृदय में शोभायमान कर लिया है, उसके पास ईश्वर अदृश्य रूप में विद्यमान होते हैं; जिसने प्रेम को अपने हृदय में शोभायमान कर लिया है, उसके पास ईश्वर अदृश्य रूप में विद्यमान होते हैं; जिसने वचन को अपने ह्रदय में शोभायमान कर लिया है, उसके पास ईश्वर अदृश्य रूप में विद्यमान होते हैं। वे यह नहीं जानते थे कि जिसके पास ईश्वर अदृश्य रूप में विराजमान है, उसके हर काम में ईश्वर का साथ होता है; और वह हर काम अपना समझ कर नहीं, बल्कि ईश्वर का समझकर पूरी तरह से निडर होकर निभाता है। इन्हीं अज्ञानता के कारण ही ईसा मसीह के शिष्य, आनुयायी और प्रेरित कहे जाने वाले लोग ईसा के पकड़े जाने पर उनसे दूर भागकर डर के मारे कमरे में बंद थे। ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने का संदेश इधर-उधर से मिलने के बावजूद भी वे कमरे में बंद थे और इन्हीं सब बातों की चर्चा कर रहे थे। इसी बीच ईसा मसीह उनके बीच उपस्थित हो गए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गए। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शांति मिले!" परंतु वे बिस्मित और भयभीत होकर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं। संत लूकस 24 : 36-37


बताइए भला! अभी-अभी 36 से 40 घंटा पहले ही तो उन्होंने अपने गुरु ईसा मसीह को दफन किया था और वे उनके पुनर्जीवित होने की चर्चा सुनकर चर्चा भी कर ही रहे थे; और अब ईसा स्वयं उनके समक्ष हैं, तो वे उन्हें पहचानने के बदले उन्हें भूत-प्रेत समझ रहे हैं। ईसा मसीह के साथ इतना लंबा समय बिताने के बाद भी वे भूत-प्रेत पर अपने विश्वास से छुटकारा नहीं पाए थे। अनावश्यक डर भय से मुक्त नहीं हो पाए थे। वे अपने ही अंदर के असत्य को निकाल नहीं पाए थे, जो उनके डर और भय का कारण था। वे असत्य को पूरी तरह से छोड़ कर, सत्य में पूर्णत: समर्पित नहीं हो पाए थे। वे ईसा मसीह के वचनों पर मनन-चिंतन कर भावी जीवन के लिए अपने आप को तैयार नहीं कर पाए थे। शिष्यों और प्रेरितों के असत्यमय हालात देखकर ईसा मसीह को कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि वे उनके सहज ही सत्य से असत्य में ढल जाने के स्वभाव से वाकिफ थे। फिर भी ईसा मसीह ने अपने शिष्यों, अनुयायियों और प्रेरितों से ही उनके डर और भय का कारण जानना चाहे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने उनसे कहा, "तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में संदेह क्यों होता है? संत लूकस 24 : 38-39


ऐसा कह कर ईसा मसीह अपने शिष्यों को अपनी आवाज (वचन) सुना कर उनके वचनों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके शिष्य और प्रेरित कहे जाने वाले लोग वचनों का मर्म समझें और वचन का दिल से पालन कर सत्य में समर्पित हो जाएं। ईसा मसीह उन्हें समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि वचन ईश्वर है; और जो वचन का पालन करता है, उसे किसी बात का डर, भय और घबराहट नहीं होता है क्योंकि वचन का पालन करने वाले के साथ वचन होता है; ईश्वर होता है; जैसा कि लिखा है :


आदि में शब्द था,
शब्द ईश्वर के साथ था
और शब्द ईश्वर था।
उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ
और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ।
शब्द ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया।
हमने उसकी महिमा देखी।
वह पिता के एकलौते की महिमा-जैसी है-
अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण। संत योहन 1 : 1-3 और 14


यही कारण है कि पुनर्जीवित ईसा मसीह वचन बोलकर अपने शिष्यों, अनुयायियों और प्रेरित कहे जाने वाले लोगों को वचन का मर्म समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि वचन का मर्म समझने वाला न ही डरता है, न ही घबराता है और न ही भयभीत होता है। हम सब जो वचन! वचन! कहते रहते हैं, प्रभु! प्रभु! कहते रहते हैं, ईसा मसीह के अनुयायी कहलाते हैं और प्रेरित भी कहे जाते हैं - क्या घबराते हैं? क्या डरते हैं? क्या भयभीत होते हैं? यदि हां, तो सिर्फ मुंह में वचन है, दिल में नहीं!! दिल में वचन हो डर भय और घबराहट कैसा? दिल में वचन की कमी और वचन के मर्म की अज्ञानता के कारण ही ईसा मसीह को यह प्रमाण देना पड़ा कि वे (वचन के धनी) वहां पर उनके बीच उपस्थित हैं; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


"मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूं। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़ मांस नहीं होता।" उन्होंने यह कह कर उनको अपने हाथ और पैर दिखाए। जब इस पर भी शिष्यों को आनंद के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वह आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, "क्या यहां तुम्हारे पास खाने को कुछ है?" उन्होंने ईसा को भूनी मछली का एक टुकड़ा दिया। उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया। संत लूकस 24 : 39-43


इस प्रकार से ईसा मसीह अपने पुनर्जीवित होने का प्रमाण दिए हैं, वचन के अमरत्व का प्रमाण दिए हैं ताकि हम सब अविश्वास से विश्वास की ओर उपवास और प्रार्थना की पवित्र प्रक्रिया के द्वारा वचन को, जो ईश्वर है, ह्रदय गमन कर लें। यही कारण है कि पुनर्जीवित ईसा मसीह ने भूनी मछली का टुकड़ा उनके सामने खाने के बाद, उन्हें अपने वचनों का स्मरण कराए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने उन से कहा, "मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है।" तब उन्होंने उनके मन का अंधकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रंथ का मर्म समझाया और उन से कहा, "ऐसा ही लिखा है कि मसीह दु:ख भोगेंग, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे और उनके नाम पर यरूशलेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चाताप का उपदेश दिया जाएगा। तुम इन बातों के साक्षी हो। देखो, मेरे पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की है, उसे मैं तुम्हारे पास भेजूंगा। इसलिए तुम लोग शहर में तब तक बने रहो, जब तक ऊपर की शक्ति से संपन्न न हो जाओ। संत लूकस 24 : 49


ईसा मसीह ने धर्मग्रंथ मे लिखे अनुसार अपने शिष्यों को वचन का मर्म समझाएं और इस प्रकार से धर्मग्रंथ और उसमें निहित वचन के संदर्भ में उनके मन के अंधकार को दूर कर दिए ताकि वे वचन के मर्म को समझते हुए वचन (ईश्वर) के विरुद्ध पाप करने के लिए और भविष्य में वचन (ईश्वर) के विरुद्ध पाप से बचने के लिए उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) करें, जब तक कि उनकी आत्मा, पवित्र आत्मा की तरह पवित्र और शुद्ध नहीं हो जाती है; सत्य से नहीं भर जाती है; पवित्र आत्मा से नहीं भर जाती है; ईश्वरीय शक्ति से नहीं भर जाती है; ईश्वर के वचन और उसके मर्म की समझ से नहीं भर जाती है।


जिस दिन शिष्य वचन के मर्म को पूरी तरह से समझ कर वचन को उपवास और प्रार्थना के द्वारा हृदय गमन कर लिए, वे ईश्वर की सहायता से योहन बपतिस्ता की तरह निडर होकर लोगों के बीच पापक्षमा के लिए पश्चाताप का उपदेश देने लगे। जैसा कि धर्मग्रंथ में योहन बपतिस्ता के उपदेश के बारे लिखा है :


पश्चाताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। संत योहन 3 : 2


पश्चाताप के द्वारा ही शिष्यों ने ईश्वर की शांति को प्राप्त किया और उनका डर भय और घबराहट सब समाप्त हो गया; और वे निडर हो गए। ईश्वर के अनुयाई, शिष्य और प्रेरित सिर्फ और सिर्फ वे हैं, जो खुद उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा मुक्ति प्राप्त कर शुद्ध और पवित्र जीवन व्यतीत करते हैं और ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया के सहभागी बन कर योहन बपतिस्ता की तरह बिल्कुल निडर होकर दूसरों को भी पश्चाताप के द्वारा पापक्षमा की शिक्षा देते हैं और इस तरह से ईश्वर के राज्य का विस्तार करते हैं, सत्य के राज्य का विस्तार करते हैं और दूसरों के हृदय में वचन का मर्म अंकित करते हैं। स्मरण रहे कि असत्य देखकर चुप रहने वाला व्यक्ति असत्य का सहभागी होता है। इसलिए दूसरों के असत्य की धुलाई से पहले, उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा अपने असत्य की सफाई निहायत ही जरूरी है।


अगले भाग में पढ़िये
वचन और उसका मर्म
To be continued ……..


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!