प्रकाशित 25/05/2020
ईसा मसीह 3 दिन बाद नहीं, बल्कि तीसरे दिन जी उठे थे। आइए, ईसा मसीह की मृत्यु और पुनर्जीवित होने तक के समय को घंटों में हिसाब लगाते हैं। ईसा मसीह की मृत्यु के संबंध में धर्म ग्रंथ में इस प्रकार लिखा हुआ है :
अब लगभग दोपहर हो रहा था। सूर्य के छिप जाने से तीसरे पहर तक सारे प्रदेश में अंधकार छाया रहा। मंदिर का पर्दा बीच से फट कर दो टुकड़े हो गया। ईसा ने ऊंचे स्वर से पुकार कर कहा, "पिता! मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंपता हूं", और यह कह कर उन्होंने प्राण त्याग दिए। संत लूकस 23 : 44-46
गुड फ्राइडे के दिन ईसा मसीह की मृत्यु धर्म ग्रंथ के उपरोक्त कथन के अनुसार लगभग 3 बजे के आसपास हुई। ईसा के पुनर्जीवित होने के संबंध में धर्म ग्रंथ में लिखा है :
सप्ताह के प्रथम दिन, पौ फटते ही, वे तैयार किए हुए सुगंधित द्रव्य ले कर कब्र के पास गयीं। उन्होंने पत्थर को कब्र के अलग लुढ़काया हुआ पाया। किंतु भीतर जाने पर उन्हें प्रभु ईसा का शव नहीं मिला। वे इस पर आश्चर्य कर ही रही थीं कि उजले वस्त्र पहने दो पुरुष उनके पास आ कर खड़े हो गए। स्त्रियों ने भयभीत हो कर धरती की ओर सिर झुका लिया। उन पुरुषों ने उन से कहा, "आप लोग जीवित को मृतकों में क्यों ढूंढती हैं? वे यहां नहीं हैं- वे जी उठे हैं। गलीलिया में रहते समय उन्होंने आप लोगों से जो कहा था, वह याद कीजिए। उन्होंने यह कहा था कि मानव पुत्र को पापियों के हवाले कर दिया जाना होगा, क्रूस पर चढ़ाया जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा।" तब स्त्रियों को ईसा का यह कथन याद आया। संत लूकस 24 : 1-8
सप्ताह के प्रथम दिन पौ फटते ही यानी रविवार को बडे़ तड़के लगभग 4 - 5 बजे के आसपास ईसा मसीह कब्र में नहीं पाये गये; और स्वर्गदूतों ने स्त्रियों को बताया कि वे जी उठे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि ईसा मसीह अपनी मृत्यु के 72 घंटों के बाद नहीं, बल्कि सिर्फ 36 से 40 घंटे के बीच पुनर्जीवित हो गए। इस समय का हिसाब लगाने का मेरा एक खास मकसद है, जो चर्चा में आगे स्पष्ट हो जायेगा। अव्वल तो ईसा मसीह अपनी मृत्यु और पुनर्जीवित होने का संदेश गलीलिया में रहते समय लोगों को बार-बार दिए थे, लेकिन उन्होंने सुना, मगर न ही इस पर मनन चिंतन किया और न ही इसे ईसा मसीह से साफ-साफ समझना ही चाहा। यदि वे यह समझते, तो स्त्रियों को कब्र में ईसा मसीह का शव नहीं मिलने पर किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं होता; और स्वर्गदूतों को आ कर उन्हें इस बात को नहीं याद दिलाना पड़ता। वचन को सुनकर सही समय पर उसका पालन करने की तैयारी नहीं करना, लोगों के भय का कारण होता है; जैसा कि इन स्त्रियों के साथ हुआ। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सब लोगों को ईसा मसीह के वचन पर समय रहते मनन-चिंतन करना चाहिए, ताकि उचित समय में उसका पालन हो सके। उन स्त्रियों ने ऐसा नहीं किया और आश्चर्य और भय का शिकार हुईं; और शायद हम सब ऐसा ही करते हैं। इस संबंध में धर्म ग्रंथ में लिखा है :
कब्र से लौट कर मरियम मगदलेना योहन्ना, और याकूब की माता मरियम ने यह सब ग्यारहों और दूसरे शिष्यों को भी बताया। जो अन्य नारियां उनके साथी थीं, उन्होंने भी प्रेरितों से यही कहा; परंतु उन्होंने इन सब बातों को प्रलाप ही समझा और स्त्रियों पर विश्वास नहीं किया। संत लूकस 24 : 9-11
चूंकि ईसा मसीह की मृत्यु और पुनर्जीवित होने के वचन को बार-बार सुनकर भी शिष्यो, प्रेरितों और अन्य लोगों ने न ही मनन चिंतन कर स्वयं ही समझना चाहा और न ही वचन देने वाले ईसा मसीह से ही समझना चाहा जिसका परिणाम यह हुआ की उन्हें ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने का संदेश बकवास लगने लगा, अफवाह लगने लगा; और उन्होंने अपने विश्वास की कमी को झलका दिया। ईश्वर का वचन सुनना, लेकिन उस पर विश्वास नहीं करना अविश्वास है; और अविश्वास पाप का कारण होता है। शिष्यों ने विश्वास नहीं कर पाप किया। यहां तक कि पेत्रुस भी ईसा मसीह के जी उठने की घटना से आश्चर्यचकित हो गया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
फिर भी पेत्रुस उठ कर दौड़ते हुए कब्र के पास पहुंचा। उसने झुक कर देखा कि पट्टियों के अतिरिक्त वहां कुछ भी नहीं है और वह इस प्रकार आश्चर्यचकित हो कर चला गया। संत लूकस 24 : 12
जिस दिन ईसा मसीह जी उठे, उसी दिन उन्होंने एम्माउस जाने वाले अपने दो शिष्यों को दर्शन दिए। उस दर्शन का संबंध में धर्म ग्रंथ में लिखा है :
उसी दिन दो शिष्य इन सब घटनाओं पर बातें करते हुए एम्माउस नामक गांव जा रहे थे। वह यरूशलेम से कोई चार कोस दूर है। वे आपस में बातचीत और विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि ईसा स्वयं आ कर उनके साथ हो लिए, परंतु शिष्यों की आंखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं। संत लूकस 24 : 13-16
एक कोस लगभग 3 किलोमीटर के बराबर होता है। इस हिसाब से यरूशलेम से एम्माउस की दूरी लगभग 12 किलोमीटर है। इसी बीच ईसा मसीह, जिन्हें उनके शिष्यों ने मात्र 36 से 40 घंटा पहले कब्र में दफन किया था, रास्ते में उनके बीच तीसरे राहगीर के रुप में आ कर, साथ साथ चलने लगे। यदि दो राहगीरों के बीच कोई तीसरा राहगीर आ जाए, तो वे जरूर एक दूसरे का चेहरा देख कर या आवाज सुनकर पहचानने का प्रयास करेंगे- कि भाई यह कौन आ गया! लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिन्हें शिष्यों ने 36 से 40 घंटा पहले दफन किया था, उन्हें वे पहचान ही नहीं पाए!! जानते हैं क्यों शिष्य अपने गुरु को नहीं पहचान नहीं पाए। ईसा अपने शिष्यों के संसारिक स्वभाव से वाकिफ थे, सत्य से तुरंत असत्य में चले जाने के स्वभाव से वाकिफ थे, विश्वास से तुरंत अविश्वास में चले जाने के स्वभाव से वाकिफ थे, धर्म से तुरंत अधर्म में चले जाने के स्वभाव से वाकिफ थे; क्या हमारा भी स्वभाव ऐसा तो नहीं? जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
देखो! वह घड़ी आ रही है, आ ही गई है, जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और अपना अपना रास्ता ले कर मुझे अकेला छोड़ दोगे। फिर भी मैं अकेला नहीं हूं, क्योंकि पिता मेरे साथ हैं। संत योहन 16 : 32
जो पिता के साथ है, वह तो ईश्वर के साथ है; वह तो सत्य के साथ है; और वह तो ईश्वर के विश्वास में जीता है। यही कारण है कि जब शिष्य ईसा मसीह से जुदा हो गए, तो वे पिता ईश्वर से भी दूर हो गए और पाप में तितर-बितर हो गए; असत्य में तितर-बितर हो गया। यदि कोई असत्य में लथपथ हो, तो सत्य की पहचान कैसे कर सकता है? बड़े अफसोस की बात यह है कि पाप में तितर-बितर होने के कारण, असत्य में तितर-बितर होने के कारण शिष्य, ईसा मसीह को मात्र 36 से 40 घंटे के बाद देख कर नहीं पहचान पाए; ईसा मसीह की बोली सुनकर भी उन्हें नहीं पहचान पाए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उन से कहा, "आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?" वे रुक गए। उनके मुख मलिन थे। लूकस 24 : 17
एक बहुत प्रचलित कहावत ही है - बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला। जिसका नजर ही बुरा हो, वह अच्छा कैसे देख सकता है? जिसका नजरिया ही असत्य का हो, वह सत्य कैसे देख सकता है? जिसका नजरिया ही अविश्वास का हो, उसका नजरिया विश्वास कैसे कर सकता है? मात्र 36 से 40 घंटे में ही शिष्य, ईश्वर और ईसा मसीह से बहुत दूर अपना नजर और नजरिया पूरी तरह बदल दिए। वे ईसा मसीह को अपने पाप के कारण से, मुख मलिन होने के कारण से और नजर बुरे होने के कारण से नहीं पहचान पाए। क्या हम एक दूसरे में ईसा मसीह को पहचानते हैं? यदि आपका जवाब हां है, तो फिर एक सवाल अपने आपसे पूछिए कि क्या हम दूसरों को ईसा मसीह की आज्ञा के अनुसार बिल्कुल अपने समान प्यार करते हैं? यदि ईसा मसीह को दूसरों में देखना है, तो अपना नजरिया बदलना पड़ेगा; उवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा असत्य को पूरी तरह से छोड़कर सत्य में पूर्णतः समर्पित हो जाना होगा; ऐसा नहीं करने पर कोई भी व्यक्ति दूसरों में ईसा मसीह को कभी नहीं देख सकता है!! चाहे वह उन प्रेरितों के समान अपने आप को अभिषिक्त और प्रेरित ही क्यों न समझे!!! अव्वल तो शिष्य, ईसा मसीह को नहीं पहचाने और दूसरा कि तीसरे राहगीर के साथ टेढ़ी बोली, दोषारोपण की बोली बोलना शुरु कर दिया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
उनमें से एक- क्लेओपस - ने उत्तर दिया, "यरूशलेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहां इन दिनों क्या-क्या हुआ है।" संत लूकस 24 : 18
बताइए भाई! एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी। फिर भी ईसा मसीह अपने ईश्वरीय स्वभाव के मुताबिक और अपने पवित्र संस्कार (प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय) का परिचय देते हुए बड़ी शालीनता के साथ उनसे पूछने लगे कि भाई! यरूशलेम में इन दिनों क्या हुआ है। और वे उन्हें अपने विषय में धर्म ग्रंथ में नबियों के लेख के आधार पर समझाने का प्रयास करते रहे, फिर भी शिष्यों की आंखें नहीं खुली और वे ईसा मसीह को 12 किलोमीटर के लंबे पैदल सफर के दौरान नहीं पहचान पाए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में इस संबंध में लिखा हुआ है :
ईसा ने उनसे कहा, "क्या हुआ है?" उन्होंने उत्तर दिया, "बात ईसा नाजरी की है। वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे। हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदंड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया। हम तो आशा करते थे कि वे ही इसराइल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है। यह सच है कि हम में से कुछ स्त्रियों ने हमें बड़े अचंभे में डाल दिया है। वे बड़े सवेरे कब्र के पास गईं और उन्हें ईसा का शव नहीं मिला। उन्होंने लौट कर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिए, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हैं। इस पर हमारे कुछ साथी कब्र के पास गए और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था; परंतु उन्होंने ईसा को नहीं देखा।
तब ईसा ने उनसे कहा, "निरबुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मंदमति हो! क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?" तब ईसा ने मूसा से लेकर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रंथ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया। संत लूकस 24 : 19-27
शिष्यों की आंखें मात्र 36 से 40 घंटे में इस कदर पाप में मदहोश हो गई थीं और उनका नजरिया इस कदर बदल गया था कि ईसा मसीह भी उनको नहीं समझा पाए कि वे जी उठे हैं; और अब भी वे तीसरे राहगीर के समान उनके साथ चले जा रहे हैं। शिष्य, ईसा मसीह के साथ रहते समय उनके औकात और सामर्थ्य से वाकिफ थे, जिसकी चर्चा भी वे कर रहे थे, लेकिन अफसोस कि वे 12 किलोमीटर पैदल सफर में समझ नहीं पाए कि पुनर्जीवित ईसा मसीह, तीसरे राहगीर के समान उनके साथ चल रहे हैं। हमारे जीवन रूपी राह पर न जाने कितनी बार तीसरे राहगीर के रूप में ईसा मसीह हमारे पास आए लेकिन उनके औकात और सामर्थ्य और उनके वचनों को सुनने-जानने के बावजूद हम उन्हें पहचान नहीं पाए क्योंकि हमारे भी मुख मलिन रहे हैं।। क्या हम अपनों से अच्छा और दूसरों से बुरा बर्ताव या अलग बर्ताव नहीं करते? क्या हम अपनों से अपना-सा और परायों से पराया-सा बर्ताव नहीं करते हैं? क्या हम रिश्ता देख-देख कर बर्ताव नहीं करते हैं? क्या हमरे बर्ताव में डबल ट्रिपल स्टैंडर्ड नहीं हैं? क्या हमारे बर्ताव में हमारा संसारिक स्वभाव जैसे स्वार्थ घमंड पाखंड दिखावा लालच ईर्ष्या द्वेष दोषारोपण मनमुटाव.......... इत्यादि की झलक नहीं है? उफ़! राह चलते ईसा मसीह के शिष्यों में तो इस प्रकार का बुरा बर्ताव साफ-साफ उनके बोली बचन में झलक रहा था !! दूसरी बात यह है कि ईसा मसीह को समझने के लिए सद्बुद्धि का इस्तेमाल करना जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं कर शिष्यों ने निर्बुद्ध होने का परिचय दिया। ईश्वर चाहते हैं कि हम अपना सब कुछ, जो ईश्वर से मिला है, ईश्वर की महिमा में लगा दें। तभी हम ईश्वर को पहचान पाएंगे, नहीं तो शिष्यों के तरह आधुनिक युग की बुद्धि होने के बावजूद, हम निर्बुद्ध / मंदमति ही कहलाए जाएंगे। क्या यह धर्म ग्रंथ में नहीं लिखा है :
उसने उत्तर दिया , "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे ह्रदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने सामान प्यार करो।" संत लूकस 10 : 27
क्या हम धर्म ग्रंथ में लिखे अनुसार ईश्वर से अपने सब कुछ से प्यार करते हैं? उनके साथ जीवन व्यतीत करने वाले शिष्य तो नहीं कर पाए क्योंकि ईश्वर और पड़ोसियों से ऐसा प्यार करने के लिए निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चताप) निहायत ही जरूरी है। जब शिष्य ईसा मसीह के साथ तकरीबन 12 किलोमीटर पैदल सफर तय कर एम्माउस को पहुंच गए तब तक सांझ ढल चुकी थी। इस दौरान ईसा मसीह के अथक प्रयत्न के बावजूद शिष्यों ने अपने मलिन मुख को साफ नहीं किया, ह्रदय को साफ नहीं किया, अपना नजरिया नहीं बदला; और इतने लंबे सफर में भी वे ईसा मसीह को नहीं पहचान पाए। इसलिए ईसा मसीह एक अनजाने तीसरे राहगीर के समान ही अपना सफर आगे तय करने के जैसा एक खास मकसद को पूरा करने के लिए अपना कदम उनसे आगे बढ़ाते हैं, मानो वे अपना रास्ता आगे नापना चाहते हों। उनका कदम आगे बढ़ाने का खास मकसद यही था कि ईसा मसीह अपने शिष्यों पर खुद को ईसा मसीह के सामान प्रकट करने के बजाए एक पीड़ित राहगीर के समान प्रकट कर यह जताना चाहते हैं कि अब आगे उनका अकेले का सफ़र कितना मुश्किल भरा है; गमगीन है; उबड़ खाबड़ से भरा है; और जंगली जीव जंतुओं और खूंखार जानवरों से भरे जंगल की राह को रात के अंधेरे में उन्हें अकेले ही पूरा करना है। ईसा मसीह के कदम जैसे ही आगे बढ़े, शिष्यों को इस बात का एहसास हुआ कि अब रात में कठिनाई और मुसीबत भरा सफर यह आदमी कैसे अकेले तय करेगा; और उनका दिल तीसरे राजगीर के लिए दया से भर आया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
इतने में वे उस गांव के पास पहुंच गए, जहां वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं। शिष्यों ने यह कह कर उनसे आग्रह किया, "हमारे साथ रह जाइए। सांझ हो रही है और नअब दिन ढल चुका है" और वह उनके साथ भीतर गए। संत लूकस 24 : 28-29
वाह! इंसान के मुख मलिन होने के बावजूद भी हम इंसानों में इंसानियत होती है, जिसे ईसा मसीह ने कदम बढ़ा कर अपने शिष्यों में निखारा। शिष्यों ने यह एहसास किया और तीसरे राहगीर के प्रति उनका दिल दया से द्रवित हो गया; और उन्होंने बहुत प्यार से तीसरे राहगीर को अपने यहां ठहरने का न्योता दिया जिससे धर्म ग्रंथ में लिखे अनुसार ईश्वर का यह वचन पूरा हुआ :
धन्य है वे, जो दयालु है! उन पर दया की जाएगी। संत मत्ती 5 : 7
ईसा मसीह तीसरे राहगीर के रूप में अपने शिष्यों का दया निखार कर और उनकी दया प्राप्त कर, उन्हें दया दिखाने के लिए उनके घर में प्रवेश किए; उन्हें क्षमा करने के लिए, उनके घर में प्रवेश किए; उन्हें असत्य के मझधार से निकालने के लिए, उनके साथ उनके घर गए; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठकर रोटी ली, आशीष की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दिया। इस पर शिष्यों की आंखें खुल गई और उन्होंने ईसा को पहचान लिया.......किंतु ईसा उनकी दृष्टि से ओझल हो गए। संत लूकस 24 : 30-31
ईसा मसीह ने रोटी खाने की अपनी स्टाइल्स से उन पर दयालुता दिखाते हुए अपने शिष्यों को बतला ही दिए कि वे कोई तीसरे राहगीर नहीं, ईसा मसीह ही हैं। इस प्रकार वे अपने जीवित होने का प्रमाण दिए कि प्रेम दया क्षमा शांति करुणा सहनशीलता धैर्य और न्याय कभी नहीं मरता है; सत्य कभी नहीं मरता है; जिसे पाने के लिए उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की निरंतरता की जरूरत है। शिष्य इन बातों को समझ कर पुनः उसी धार्मिकता को वापस पाने के लिए आनंद विभोर होकर तुरंत यरूशलेम वापस लौट गए। जो तीसरे राहगीर को रात में सफर करने से मना कर रहे थे, अब वे रातो-रात 12 किलोमीटर पैदल चलकर यरूशलेम लौट गए, ताकि बाकी शिष्यों के साथ इस अद्भुत आनंद को शेयर किया जाए और उपवास तथा प्रार्थना में जीवन व्यतीत कर आनंदमय, शांतिमय और निडर जीवन बिताया जा सके; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम लौट गए। वहां उन्होंने ग्यारहों को और उनके साथियों को एकत्र पाया, जो यह कह रहे थे, "प्रभु सचमुच जी उठे हैं और सिमोन को दिखाई दिए हैं।" तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया। संत लूकस 24 : 33-35
आइए, हम सब भी असत्य को पूरी तरह से छोड़ कर, सत्य में पूर्णतः समर्पित हो जाएं, ताकि जब भी इस जीवन रूपी राह में तीसरे राहगीर के रूप में ईसा मसीह आएं, तो हम उन्हें सहज ही पहचान लें।
अगले भाग में पढ़िये
लोग सत्य में निडर, जबकि असत्य में डरपोक
To be continued ……..
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!