डर और विश्वास

प्रभु के शिष्य कमरे में क्यों बंद हो गये?

प्रकाशित 24/05/2020


यदि किसी से डरना है, तो सिर्फ और सिर्फ ईश्वर से डरना है। ईश्वर से डरने वाला ईश्वर के विरुद्ध पाप नहीं करता है। प्रभु के शिष्य प्रभु को पकड़ने वाले लोगों और अधिकारियों के आतंक से डर कर मौका-ए-वारदात से भाग कर एक कमरे में बंद हो गए। उन्हें डरने की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्रभु अपने आप को माशालधारी भीड़ के हाथों सरेंडर करते हुए अपने शिष्यों को तो बचा ही चुके थे; जैसे कि धर्म ग्रंथ में इस संबंध में लिखा हुआ है :


ईसा ने उनसे फिर पूछा, "किसे ढूंढते हो?" वे बोले, "ईसा नाजरी को।" इस पर ईसा ने कहा, "मैं तुम लोगों से कह चुका हूं कि मैं वही हूं। यदि तुम मुझे ढूंढते हो, तो इन्हें जाने दो।" यह इसलिए हुआ कि यह कथन पूरा हो जाए- तूने मुझ को जिन्हें सौंपा, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया। योहन 18 : 7-9


अपने शिष्यों के सामने ही तो ईसा मसीह उन्हें बचा चुके थे और शिष्य हर प्रकार के सर्वनाश से बच चुके थे; इस बात का प्रमाण यह है कि मशालधारी भीड़ ने सिमोन पेत्रुस तक का भी कुछ नहीं बिगड़ा जबकि वह प्रधान याजक के नौकर का कान अपनी तलवार से उड़ा चुका था। इन सब के बावजूद भी शिष्य डर के मारे मौका ए वारदात से भाग कर एक कमरे में बंद हो गए। वे भूल गए कि उन्होंने ईसा मसीह का साथ कभी नहीं छोड़ने का वादा किया था! यह इस बात का प्रमाण है कि वे अपने विश्वास में ढृढ नहीं हो पाए थे। ईश्वर के विश्वास में ढृढ़ता का मतलब है, अपनी आत्मा को पवित्र आत्मा के सदृशय शुद्ध रखना; सत्य में पूर्णतः समर्पित हो जाना और अपनी आत्मा को सत्य से भर लेना। सत्य ही ईश्वर है। जो ईश्वर के विश्वास में ढृढ होता है, वह सिर्फ ईश्वर से डरता है। सवाल यह है कि ईसा मसीह के शिष्य क्यों डर गए? यह इसलिए कि वे ईसा मसीह के साथ बरसों जीवन व्यतीत करने के बावजूद ईश्वर में पूर्णतः ढृढ नहीं हो पाए थे; विश्वास में पक्का नहीं हो पाए थे, हालांकि उनका ईश्वर के विश्वास में ढृढ होने की पवित्र प्रक्रिया, उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) जारी था।


वे ईसा मसीह को मौका-ए-वारदात में अकेला छोड़, डर के मारे दूर भाग खड़े हुए थे और एक कमरे में बंद हो गए थे। ईश्वर से दूर जाना ही पाप है; प्रेम से अलग होना ही पाप है। शिष्य, ईसा मसीह के प्रेम से कैसे अलग हो गए? डरना भी पाप है; और डर का परिणाम भी पाप है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा हुआ है :


मैं तुम्हें बताता हूं कि किस से डरना चाहिए। उस से डरो, जिसे मारने के बाद नरक में डालने का अधिकार है। हां, मैं तुमसे कहता हूं, उसी से डरो। लूकस 12 : 5


क्या आपको ईश्वर को छोड़ किसी और बात का डर लगता है? ईसा मसीह के साथ कई बरसों तक जीवन व्यतीत करने के बावजूद यदि शिष्यों को इतना डर लगता था, तो यदि आप उपरोक्त सवाल का जवाब "न"में दे रहे हैं, तो एक बार इस सवाल पर पुनर्विचार उचित ‌होगा; अपने आप को धोखा देने से कहीं अच्छा है कि हर प्रकार के अनावश्यक डर से ऊपर उठा जाय। मैं जो इन बातों को लिख रहा हूं, यह साक्षी देता हूं कि मैं बर्ष 2007 से ही अपने तमाम तरह के डर से ऊपर उठने के लिए प्रयत्नशील हूं; और अब भी मेरे पास कुछ अनावश्यक डर हैं जिनसे उपर उठने के लिए मैं कार्य कर रहा हूं। शिष्यों को बंद कमरे में अपने अनावश्यक डर से ऊपर उठने का अच्छा मौका मिल गया। उस बंद कमरे में उन्होंने एहसास किया कि वहां पर ईसा मसीह नहीं है क्योंकि वे उन्हें मौका-ए-वारदात में अकेला छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं। उस बंद कमरे में उन्हें विश्वास में ढृढ़ होने की पवित्र प्रक्रिया, उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) को पुनर्स्थापित करने का सुंदर मौका मिल गया। वे प्रभु से दूर भागने के लिए सच्चा पश्चताप करने लगे; और बड़ी खेद के साथ अपनी आत्मा में लगे पाप के कलंको को टटोलने लगे।


आइए, हम सब भी प्रभु से दूर जाने के लिए, अब प्रभु के नजदीक आने की पवित्र प्रक्रिया, उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) को किसी एकांत में या कहिए एक बंद कमरे में शुरू करें और ईश्वर की शांति प्राप्त करें‌; ईश्वर हम सब जन के लिए ऐसा ही चाहते हैं; जैसा कि लिखा है :


वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आकर खड़े हो गए। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शांति मिले!" लूकस 24 : 36


यदि कोई ईश्वर की शांति पाना चाहता है, तो अपने आप को ईसा मसीह के शिष्यों की तरह कमरे में बंद कर ले यानी एकांत में चला जाए और अपने आप को पवित्र आत्मा के सदृशय पवित्र करने के लिए उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की पवित्र प्रक्रिया में डाल ले। स्मरण रहे कि असत्य को पूर्णतः छोड़ने और सत्य में पूर्णतः समर्पित होने की तमन्ना रखने वालों को ही ईश्वर की शांति निश्चित तौर पर प्राप्त होती है; किसी और के कहने पर कि "तुम्हें शांति मिले", ईश्वरीय शांति नहीं मिल सकती है। दूसरों को "तुम्हें शांति मिले" कह कर शांति देने वाले व्यक्तियों को खुद चिंतन करना चाहिए कि वे कितनी ईश्वरीय शांति में है; क्या वे हर प्रकार के डर भय और अशांति से बिल्कुल ऊपर उठ चुका है!! जैसा कि मैंने ऊपर वर्णन किया है, ईश्वरीय शांति कमाई जाती है; आईये ईश्वरीय शांति पाने के लिए मेहनत करें।


अगले भाग में पढ़िये
पुनर्जीवित ईसा को शिष्य क्यों नहीं पहचान पाए?
To be continued ……..


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!