प्रकाशित 23/05/2020
ईसा मसीह अपने शिष्यों को धार्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया में ढालने में सफल थे और शिष्य भी धार्मिकता की पवित्र प्रक्रिया के द्वारा ईश्वर का अभिषेक प्राप्त करने की ओर निरंतरता के साथ बढ़ रहे थे। ईसा मसीह जानते थे कि उनका इस संसार से जाने का समय आ गया है, लेकिन उनके शिष्य उस वक्त तक धार्मिकता की पूर्णतः को प्राप्त नहीं कर पाए थे; विश्वास की पूर्णतः को प्राप्त नहीं कर पाए थे। ईसा मसीह जानते थे कि उनके शिष्य उनकी उपस्थिति के कारण धार्मिकता की ओर आगे बढ़ रहे थे; और जब कभी भी उनके शिष्य डर या फिर सांसारिकता के कारण से टूट जाते थे, तो वे उन्हें ढाढस बंधा कर धार्मिकता की पवित्र प्रक्रिया में पुनर्स्थापित होने में मदद करते थे। धार्मिकता प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य और बिल्कुल ही व्यक्तिगत मामला है। यह किसी की जागीरदारी बपौती या ठेकेदारी नहीं। यह न ही खैरात में और न ही उधार में दी जा सकती है; और यह किसी पर थोपी भी नहीं जा सकती है। यही कारण है कि बहुत सारे शिष्यों ने ईसा मसीह का साथ छोड़ दिया और ईसा मसीह ने उनके साथ थोड़ा भी जोर जबरदस्ती नहीं किया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गए और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया। इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, "क्या तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?" योहन 6 : 66-67
बारहों में से एक, जिसका नाम यूदस था, ने लोभ-लालच में पड़ कर ईसा मसीह का साथ छोड़ दिया और ईसा मसीह को चंद पैसों में बेच दिया!! इस तरह वह ईसा मसीह से, धार्मिकता से, विश्वास से, ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन से जुदा हुआ और शैतान के अधर्मि संगठन का सदस्य बना। ऐसा कर वह बहुत बेचैन और अशांत हो गया; और वह आत्महत्या कर लिया। शैतान ऐसे ही तो चाहता है कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य न बने। शैतान यह ठीक से जानता है कि प्रत्येक मनुष्य धार्मिकता को प्राप्त करने के लिए बिल्कुल स्वतंत्र है; और ईश्वर किसी से जोर-जबर्दस्ती नहीं करते हैं। इसका शैतान भरपूरी से लाभ भी उठाता है क्योंकि हम सब ईश्वर के उपवास और प्रार्थना का वचन तो सुनते हैं लेकिन निरंतरता के साथ पालन ही नहीं करते हैं। जबकि ईश्वर की पवित्र इच्छा जरूर है कि प्रत्येक व्यक्ति धार्मिकता को प्राप्त करें। ईसा मसीह ने कभी किसी पर धार्मिकता थोपने का प्रयास नहीं किए; वे धार्मिकता प्राप्त करने की शिक्षा और मदद जरूर करते रहे। अंतिम समय में उनके सिर्फ ग्यारह शिष्य ही रह गए थे; और वे सब भी उस समय तक पूरी तरह से धार्मिकता को प्राप्त नहीं किए थे क्योंकि वे सब विश्वास में पूरी तरह से मजबूत नहीं हुए थे, हालांकि वे सभी ईसा मसीह की उपस्थिति में धार्मिकता की प्राप्ति में पूरी लगन से निरंतर प्रयासरत थे। अब तक तो शिष्य ईसा मसीह की उपस्थिति में धार्मिकता को प्राप्त करने की पवित्र प्रक्रिया में लगे हुए थे; लेकिन अब ईसा मसीह की अनुपस्थिति में धार्मिकता प्राप्त करने की पवित्र प्रक्रिया उनके समक्ष किसी भीषण चुनौती के समान आने वाली थी। ईसा मसीह अपने शिष्यों के स्वभाव (मानव स्वभाव) से बिल्कुल परिचित थे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
उस समय ईसा ने उनसे कहा, "इसी रात को तुम सब मेरे कारण विचलित हो जाओगे, क्योंकि यह लिखा है- मैं चरवाहे को मारूंगा और झुंड की भेड़ें तितर-बितर हो जाएंगी; किंतु अपने पुनरुत्थान के बाद मैं तुम लोगों से पहले गलीलिया जाऊंगा। इस पर पेत्रुस ने ईसा से कहा, "आपके कारण चाहे सभी विचलित हो जाएं, किंतु मैं कभी विचलित नहीं होऊंगा।" ईसा ने उसे उत्तर दिया, "मैं तुम से यह कहता हूं- इसी रात को, मुर्गे के बांग देने से पहले ही, तुम मुझे तीन बार अस्वीकार करोगे।" पेत्रुस ने उन से कहा, "मुझे आपके साथ चाहे मरना ही क्यों ना पड़े, मैं आपको कभी अस्वीकार नहीं करूंगा।" और सभी शिष्यों ने यही कहा। मती 26 : 31-35
ईसा मसीह ने अपने शिष्यों के विचलित होने की बात इसलिए नहीं कहे कि वे चाहते थे कि उनके शिष्य विचलित हो जाएं, धार्मिकता से अधार्मिकता की ओर चले जाएं, विश्वास से अविश्वास की ओर चले जाएं, सत्य से असत्य की ओर चले जाएं, बल्कि इसलिए कहे क्योंकि वे जानते थे कि उनके शिष्यों को ईसा की अनुपस्थिति में धार्मिकता की पूर्णतः को प्राप्त करना अभी बाकी था; विश्वास की पूर्णतः को अभी प्राप्त करना बाकी था; असत्य को पूरी तरह से छोड़ना अभी बाकी था; सत्य में पूर्णतः समर्पित होना अभी बाकी था; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा हुआ है :
ईसा ने उस से कहा, "क्या तुम इसलिए विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य है वे, जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं!' योहन 20 : 29
शिष्य तो ईसा मसीह की उपस्थिति और उनके चमत्कारों को देखकर उन पर विश्वास करते थे; अब उन्हें उनकी अनुपस्थिति में उन पर विश्वास करना सीखना था। शिष्यों का ईसा मसीह से अलग होने का वक्त आ ही गया, जब महायाजक तथा फरीसियों की पलटन मशाला और हथियार लिए ईसा को पकड़ने के लिए पहुंच गए। तब पेत्रुस अपने सांसारिक स्वभाव के मुताबिक मरने-मारने पर उतर हो गया जैसा कि अभी कुछ देर पहले वह ईसा मसीह से अपने सांसारिक स्वभाव के मुताबिक बातें कर रहा था; जैसा कि धर्म ग्रंथ में इस संदर्भ में लिखा है :
उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चला कर उसका दाहिना कान उड़ा दिया। उस नौकर का नाम मलखुस था। ईसा ने पेत्रुस से कहा, "तलवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे नहीं पिऊं?" संत योहन 18 : 10-11
पेत्रुस तलवार खींच कर अपने सांसारिक स्वभाव के मुताबिक अधर्म पर उतर आया। जिसने आज तक ईसा मसीह को किसी को भी थोड़ा भी दुख दर्द देते नहीं देखा था, बल्कि सिर्फ दूसरों का दुख-दर्द हरते देखा था, वह यह सब कुछ भूल कर तलवार भांजना शुरू कर दिया, जबकि लाठी-डंडों से लैस मशालधारी भीड़ के समक्ष ईसा मसीह बिल्कुल शांत खड़े थे; लेकिन ठीक इसके विपरीत पेत्रुस अधर्म का परिचय देते हुए तलवार भांज रहा था और प्रधानयजक के नौकर का कान भी काट चुका था। वह अपनी सांसारिक स्वभाव के नशे में मदहोश भूल गया था कि वह जिसके साथ था, उसका राज्य इस संसार का नहीं है। ईसा मसीह शिक्षा दिया करते थे कि ईश्वर के राज्य को सांसारिक तौर-तरीके से नहीं बसाया जा सकता है। ईश्वर का राज्य तो समर्पण और आत्मत्याग की खून और पसीने से सींच कर हासिल किया जाता है। जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :
ईसा ने उत्तर दिया, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे अनुयायी लड़ते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परंतु मेरा राज्य यहां का नहीं है।" योहन 18 : 36
ईसा मसीह का राज्य लड़ाई-झगड़ा लूट-खसोट, गंदी राजनीति, सत्ता हथियाने, अन्याय, अशांति....... इत्यादि का नहीं है इसलिए वे पेत्रुस को अपनी उपस्थिति का एहसास कराते हुए तलवार वापस म्यान में रख लेने को कहते हैं। और पेत्रुस ने तुरंत ईसा मसीह का वचन सुनकर उनकी उपस्थिति का एहसास करते हुए उनके वचन का पालन किया और अपनी तलवार, जो उसके अपने क्रोध, ईर्ष्या द्वेष लड़ाई झगड़ा मनमुटाव का प्रतीक था, को म्यान में वापस रख लिया; और अपने विश्वास के कारण से धार्मिकता की प्रक्रिया में फिर से लग गया। क्या हम सब को भी अपनी तलवार अपनी म्यान में नहीं रखनी चाहिए? क्या हमें अपना सब कुछ (असत्य) को ठंडे बस्ते में डालकर सत्य में पूर्णतः समर्पित नहीं हो जाना चाहिए, जैसा कि पेत्रुस उसी वक्त अपनी तलवार म्यान में रखकर (असत्य छोड़कर) सत्य में समर्पित हो गया!!
जब वे लोग ईसा को पकड़कर ले जा रहे थे, तो शिष्य, जिन्होंने उन्हें कभी नहीं छोड़ने का वादा किया था, डर के मारे विचलित हो कर इधर-उधर बिखर गए। पेत्रुस भी डर के मारे कहीं पर जा कर चुपचाप लोगों के बीच बैठ गया। जब लोगों ने उसे पहचान कर उसे ईसा मसीह का साथी बताया, तो वह डर के मारे ईसा मसीह को पहचानने से तीन बार साफ-साफ इंकार कर दिया कि वह तो उसे जानता तक नहीं! जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है;
पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुर्गे ने बांग दी। संत योहन 18 : 27
और प्रभु ने मुड़कर पेत्रुस की ओर देखा। तब पेत्रुस को याद आया कि प्रभु ने उस से कहा था कि आज मुर्गे के बांग देने से पहले ही तुम मुझे तीन बार अस्वीकार करोगे और वह बाहर निकल कर फूट-फूटकर रोया। संत लूकस 22 : 61-62
इस बार पेत्रुस, जिसका सानिध्य में वह निरंतर बना रहना चाहता था- उसके विषय में सफेद झूठ बोल दिया कि वह ईसा मसीह को नहीं जानता है। ऐसा कह कर पेत्रुस धार्मिकता से अधार्मिकता, विश्वास से अविश्वास, सत्य से असत्य में खिसक गया था। लेकिन ईसा मसीह जानते हैं कि पेत्रुस ईश्वर की अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का मजबूत सदस्य बनने के लिए सदा प्रयत्नशील और तत्पर रहता है इसलिए उन्होंने पेत्रुस को उस दशा में छोड़ने के बजाय उसकी ओर मुड़कर देखे और मुस्कुरा दिए। ईसा मसीह का अपने तकलीफ के वक्त भी अपनी तकलीफ से ज्यादा अपने शिष्य (जो ईश्वर से प्रेम के कारण सत्य में समर्पित होने के लिए निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना में लगा होता है) से इतना प्यार था कि वे यह कभी नहीं चाहते हैं कि उनके शिष्य धार्मिकता को छोड़ दें, सत्य को छोड़ दें, विश्वास में कमजोर पड़ जाएं, ईश्वर को छोड़ दें। उनका मुड़ कर देखना और मुस्कुराना पेत्रुस के लिए कृपा की बारिश थी, आशीषों की बारिश थी, जिसे पाकर वह सच्चा पश्चाताप करते हुए अपने अविश्वास, अधार्मिकता, असत्य और पाप के लिए फूट-फूट कर रोया और अविश्वास से विश्वास की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, असत्य से सत्य की ओर, शैतान के अपवित्र संगठन से ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन की ओर वापस हो गया; और ईश्वर और ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में चार हो गया जिसका साक्षी स्वयं ईसा मसीह है। कोई किसी की धार्मिकता का साक्षी नहीं दे सकता है; सिर्फ ईश्वर ही जानते हैं और वे हर-किसी की धार्मिकता के साक्षी हैं।
अब ईसा मसीह के शिष्यों को उनके गुरु की अनुपस्थिति में चट्टान के समान धार्मिकता में मजबूत होकर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया का सहभागी बने रहने का प्रयास निरंतरता के साथ जारी रखना है; और यही मानव जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है!! यह विचार योग्य है कि हम सब इस चुनौती में किस पायदान पर स्टैंड करते हैं? इससे जाहिर होता है कि जब तक मनुष्य इस संसार में जीवित है, उसे उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की निरंतरता के साथ धार्मिकता को प्राप्त करते हुए ईश्वर का शिष्य बन कर अभिषेक प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए ताकि वह जीते जी इस संसार में ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक कलीसिया का सदस्य बन सके और मृत्यु के पश्चात स्वर्ग में संतों का दर्जा प्राप्त कर सकें। जो स्वर्ग में नहीं, वह संत नहीं!
अगले भाग में पढ़िये
प्रभु के शिष्य कमरे में क्यों बंद हो गये?
To be continued ……..
ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।
आमीन।
"न-अधर्म" ही धर्म है।"
झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!
भारत! तुम्हें शांति मिले!!
संपूर्ण विश्व को शांति!!