डर और विश्वास

सिर्फ ईश्वर से डरें

प्रकाशित 22/05/2020


ईश्वर को छोड़ किसी और प्रकार का डर- “विश्वास और धार्मिकता” का विनाश है। जो भी व्यक्ति अपनी धार्मिकता के कारण ईश्वर का अभिषेक प्राप्त कर ईश्वर में चार हो चुके होते हैं, उन्हें ईश्वर का संरक्षण प्राप्त होता है; वे इस संसार में किसी से नहीं डरते; वे तो सिर्फ ईश्वर से ही डरते हैं। ईश्वर का डर उन्हें ईश्वर के विरुद्ध पाप करने से रोकता है; इस प्रकार वे हर बात में ईश्वर को प्रसन्न रखने का ख्याल रखते हैं और ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ अंतरात्मा में चार बने रहते हैं। वे निरंतर विश्वास के कारण ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सुदृढ़ सदस्य बने रहते हैं। लेकिन जो लोग ईश्वर में चार नहीं होते हैं, वे संसार में नाना प्रकार के डर से ग्रसित रहते हैं। चोर को पुलिस का डर; झूठ बोलने वाले को पकड़े जाने का डर; अंधकार में गलत काम करने वाले को देख लिए जाने का डर; पकड़े जाने का डर, कामचोर को डांट फटकार सुनने का डर, बॉस का डर, बिन ब्याहे मां-बाप बनने का डर........., भूत पिचास का डर!!! क्या आपको डर लगता है? अव्वल तो डरना, पाप करना है और दूसरा कि डर लोगों से पाप भी करवाता है। पेंशन नहीं मिलने का डर, लोगों को घूस देने के लिए मजबूर करता है! चोर का डर, पुलिस को लीपापोती करने के लिए आफर देता है! प्रमोशन नहीं होने का डर, बॉस की चमचाई करने के लिए उकसाता आता है! बिन ब्याहे गर्भधारण का डर, शर्म उत्पन्न कर गर्भपात करने के लिए मजबूर करता है!......... ; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


उन से नहीं डरो, जो शरीर को मार डालते हैं, किंतु आत्मा को नहीं मार सकते; बल्कि उससे डरो, जो शरीर और आत्मा, दोनों का नरक में सर्वनाश कर सकता है। मती 10 : 28


भूत-प्रेत का डर ईसा मसीह के शिष्यों को इतना ज्यादा था कि वे विश्वास ही नहीं कर पाए कि ईसा मसीह पानी में चल सकते हैं; जबकि उन्हें विश्वास था कि भूत पानी में चल सकता है। भूत का डर, भूत पर विश्वास करने का प्रमाण है। जो भूत पर विश्वास करते हैं, वे ईश्वर पर कैसे विश्वास कर सकते हैं? ईसा मसीह के शिष्यों, जिसमें पेत्रुस भी शामिल था, भूत पर विश्वास करते थे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


नाव उस समय तक से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी। रात के चौथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आए। जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते देखा, तो वे बहुत घबरा गए और यह कहते हुए, "यह कोई प्रेत है", डर के मारे चिल्ला उठे। संत मत्ती 14 : 24-26


ईसा मसीह के शिष्यों को भूत-प्रेत का खौफ इस बात का प्रमाण है कि उपरोक्त घटना के वक्त वे पूरी तरह से अपनी धार्मिकता के कारण ईश्वर अभिषेक को प्राप्त कर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन के सदस्य नहीं बने थे। ईसा मसीह भी इस बात को जानते थे; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


ईसा ने तुरंत उन से कहा, "ढाढस रखो; मैं ही‌ हूं। डरो मत।" संत मत्ती 14 : 27


भूत के खौफ के कारण शिष्य ईश्वर के प्रति अपने अविश्वास की अभिव्यक्ति कर चुके थे और उनसे पाप हो चुका था। पाप तो वह अपवित्र एवं घटिया प्रक्रिया है, जो मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देता है। शिष्य, भूत पर विश्वास और ईश्वर में अपने अविश्वास के कारण ईश्वर से दूर जा चुके थे, लेकिन ईसा मसीह जानते हैं कि अविश्वास से विश्वास में आना एक लंबी प्रक्रिया है, असत्य से सत्य में वापस लौटना एक लंबी प्रक्रिया है- जिसे उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) के द्वारा पूर्ण किया जा सकता है। इसलिए ईसा मसीह ने अपने शिष्यों को ढाढस बंधाया। पेत्रुस की आंख ईसा मसीह की ढाढस बंधाने की आवाज को सुनकर-पहचान कर खुल गई और वह अविश्वास से विश्वास की ओर बढ़ने की प्रक्रिया, असत्य से सत्य की ओर बढ़ने की प्रक्रिया, सत्य में पूर्णतः समर्पित होने की प्रक्रिया में लगे होने के कारण अपनी आत्मा में क्षोभ से भर गया कि मैं कैसे विश्वास नहीं कर पाया कि ईसा मसीह पानी में चल सकते हैं!! मैं क्यों विश्वास किया कि भूत पानी में चल सकता है!! इसी सच्चा पश्चाताप की भावना से भरकर पेत्रुस ईसा मसीह पर अपने विश्वास को प्रकट करते हुए पानी में चल रहे ईसा के पास पहुंचने की और उनके सानिध्य पाने की अपनी आंतरिक तमन्ना जाहिर किया; जैसा कि धर्म ग्रंथ में लिखा है :


पेत्रुस ने उत्तर दिया ,"प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की आज्ञा दीजिए।" ईसा ने कहा, " आ जाओ।" पेत्रुस नाव से उतरा और पानी में चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा; किंतु वह प्रचंड वायु देखकर डर गया और डूबने लगा, तो चिल्ला उठा, "प्रभु! मुझे बचाइए।" ईसा ने तुरंत हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया और कहा, "अल्पविश्वासी तुम्हें संदेह क्यों हुआ? वे नाव पर चढ़े और वायु थम गई। जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दंडवत किया, "आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं।" संत मत्ती 14 : 28-33


मैं पहले के लेखों में भी यह उल्लेख कर चुका हूं कि विश्वास प्रेम की पराकाष्ठा को हासिल करने की पवित्र प्रक्रिया है। ईश्वर प्रेम है। अतः विश्वास अपनी आत्मा में ईश्वर को हासिल करने की पवित्र प्रक्रिया है। ईसा मसीह जो अभी तक पानी में चल रहे थे, पेत्रुस को अविश्वास से विश्वास की ओर बढ़ता देख उसको अपने पास चले आने के लिए कहते हैं। पेत्रुस, जो थोड़ी देर पहले भूत पर विश्वास कर रहा था, कि भूत पानी में चल सकता है, अब सच्चे पश्चाताप के कारण से अपने अविश्वास को विश्वास में बदल दिया और खुद ईसा मसीह का आदेश प्राप्त कर आव देखा न ताव, पानी में उतर गया; डूबा नहीं, बल्कि पानी में चलते हुए ईसा मसीह की ओर बढ़ने लगा। पानी में चलना पहाड़ के समान कठिन काम है; लेकिन जब हृदय में विश्वास के कारण प्रेम (ईश्वर) बढ़ता है, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं होता है क्योंकि तब करने वाला वह मनुष्य नहीं होता है, उसकी आत्मा में विराजमान प्रेम (ईश्वर) होता है। विश्वास के कारण कोई भी व्यक्ति पेत्रुस के समान ईश्वर और ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में चार हो सकता है। इसलिए पेत्रुस अकेला पानी में नहीं चल रहा है, बल्कि वह जिनके साथ चार था, उनके औकात से वह पानी में चल रहा था; ईश्वर के समर्थ से पानी में चल रहा था। लेकिन पेत्रुस कुछ ही पग पानी में चल पाया और कुछ ही पलों के बाद डूबने लगा। जानते हैं पेत्रुस क्यों‌ डूबने लगा? क्योंकि एक कहावत है, "नजर हटी दुर्घटना घटी।" पेत्रुस जब तक ईश्वर में अपना विश्वास रखा, वह अपनी आंख सामने उसकी तरफ पानी में चले आ रहे ईसा मसीह पर नज़र गड़ाए हुए था। फिर उसी वक्त उसकी नजर ईसा मसीह से हटकर अचानक आए आंधी और तूफान की ओर चली गई; जिसे देखकर वह डर गया। उसका विश्वास अविश्वास में बदल गया और वह पाप कर बैठा। ईश्वर को छोड़ किसी और से डरना पाप है। जो अभी-अभी अपने विश्वास के कारण ईश्वर में चार हो कर पानी में चल रहा था, वह ईश्वर से दूर हो गया और पानी में डूबने लगा। शैतान, ईश्वर के विश्वास में ढृढ हो रहे पेत्रुस के पास इस बार आंधी और तूफान के रूप में आया था और पेत्रुस ने ईश्वर पर से अपने विश्वास को हटाकर आंधी और तूफान की ओर ले गया और डर गया कि आंधी और तूफान उसे पानी में डूबा देगी। अपने डर के कारण पेत्रुस, ईश्वर के विरुद्ध पाप कर बैठा और ईश्वर से दूर हो गया। जो अभी-अभी ईश्वर में अपने विश्वास के कारण चार था, अब वह अपने अविश्वास के कारण अकेला हो गया और पानी में डूबने लगा। क्या आप बतला सकते हैं कि जब पेत्रुस पानी में डूब रहा था, उस वक्त वह ईसा मसीह से कितनी दूर था? जी हां! पेत्रुस ईसा मसीह से सिर्फ एक हाथ दूर, पानी में डूब रहा था। हम भी अनावश्यक संसारिक डर और अविश्वास के कारण ईश्वर के इर्द-गिर्द ही अपने पापों में डूबे रहते हैं। क्या हमें अल्पविश्वास से पूर्ण विश्वास की ओर नहीं बढ़ना चाहिए? क्या हमें असत्य से सत्य की ओर नहीं बढ़ना चाहिए? क्या हमें सत्य में पूर्णता समर्पित नहीं होना चाहिए? क्या हमें अपने विश्वास के दम पर प्रेम की पराकाष्ठा नहीं छूना चाहिए? क्या हमें निरंतरता के साथ उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) नहीं करना चाहिए?


ईसा मसीह जो अपने शिष्यों को अत्पविश्वास से पूर्ण विश्वास की ओर बढ़ने की शिक्षा दे रहे थे, प्रेम की पराकाष्ठा को छूने की शिक्षा दे रहे थे, उपवास और प्रार्थना (सच्चा पश्चाताप) की निरंतरता की आवश्यकता की शिक्षा दे रहे थे, ने पेत्रुस को डूबने नहीं दिए, बल्कि रे अल्पविश्वासी! कह कर डांटते हुए बचाए क्योंकि पेत्रुस बचने के लिए ईश्वर की दुहाई दे रहा था, जो इस बात का प्रमाण है कि वह अविश्वास से विश्वास की ओर बढ़ने की पवित्र प्रक्रिया में था। जो बचना चाहेगा, उसे बचा लिया जाएगा; और जो नहीं बचना चाहेगा, उसे छोड़ दिया जाएगा। क्या भला डाकू नहीं बचा लिया लिया गया और बुरा डाकू नहीं छोड़ दिया गया!!! विश्वास से प्रेम की पराकाष्ठा को छूआ जा सकता है जबकि अविश्वास शैतान की पराकाष्ठा की ओर ले जाता है; धर्म ग्रंथ में इस संदर्भ में ईसा मसीह का कथन इस प्रकार से दर्ज है :


बाद में शिष्यों ने एकांत में ईसा के पास आकर पूछा, "हम लोग उसे क्यों नहीं निकाल सके?" ईसा ने उनसे कहा, "अपने विश्वास की कमी के कारण। मैं तुमसे कहता हूं- यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, "यहां से वहां तक हट जा, तो वह हट जाएगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा। (परंतु प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती)।" संत मत्ती 17 : 19-21


शिष्य विश्वास के कारण से प्रेम की पराकाष्ठा को उस समय तक नहीं छू पाए थे और उनका विश्वास कभी विश्वास,तो कभी अविश्वास के समान फ्लिप फ्लॉप कर रहा था; बार-बार बदल रहा था। इसलिए विश्वास अपने अंदर के अविश्वास पर विजय पाने का पवित्र प्रक्रिया है; अपनी संसारिक कमजोरियों को चुन-चुन कर हटाने का पवित्र प्रक्रिया; अपने अंदर के असत्य से छुटकारा पाने की पवित्र प्रक्रिया है; अपनी आत्मा को कब्जा करने वाले शैतान से मुक्ति पाने की पवित्र प्रक्रिया है; और अपने शरीर रुपी मंदिर की वेदी पर ईश्वर को सुसज्जित कर शोभायमान करने की प्रक्रिया है। जो व्यक्ति अपने आप को विश्वास प्रक्रिया में डालता है, उसे अपने अविश्वास के कारण पाप में डूबने के वक्त ईश्वर की सहायता प्राप्त होती है, क्योंकि ईश्वर सदा वैसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द रह कर उसके पाप से उपर उठने का इंतजार करते हैं और वे प्रत्येक व्यक्ति के साथ चार हो जाना चाहते हैं; जो मनुष्य जाति लिए खुशखबरी है।


जो व्यक्ति अपने विश्वास के बल पर ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष धार्मिक संगठन का सदस्य होता है, उसे किसी बात का डर नहीं होता; वह सिर्फ ईश्वर से डरता है। वैसे व्यक्ति से दुष्टात्माएं भी डरती हैं। ऐसा व्यक्ति ईश्वर की कृपा से ईश्वर की इच्छा के अनुसार पहाड़ के समान कठिन से कठिन काम करने में बड़ी आसानी से सफलता प्राप्त करता है। पानी में चलने-चलाने की घटना के द्वारा ईसा मसीह ने विश्वास की पवित्र प्रक्रिया के द्वारा प्रेम की पराकाष्ठा को छूने में लगे अपने शिष्यों को अद्भुत शिक्षा दिया हैं, जिसे देखकर और समझकर उनके शिष्यों ने नाव पर उनका दंडवत किया। झंझावात का शांत हो जाना इस बात का प्रमाण है कि शिष्यों को उस वक्त अविश्वास से विश्वास में उठने के कारण शांति मिल गई। अब नाव में प्रत्येक शिष्य ईश्वर एवं ईसा मसीह के साथ पवित्र आत्मा में चार थे। जो ईश्वर की एकमात्र अप्रत्यक्ष पवित्र कलीसिया का सदस्य होता है या बनने की प्रक्रिया में होता है, उसे ईश्वर की शांति आनंद प्रेम सदा प्राप्त होता है और ईश्वर की कृपा उस पर सदा-सर्वदा बनी रहती है। क्या हम सिर्फ अपने मुंह से ईश्वर पर अपना विश्वास प्रकट करते‌ हैं, गा-बजा कर प्रकट करते हैं या फिर उपरोक्त उल्लेख के अनुसार विश्वास की पवित्र प्रक्रिया में अपने आप को डालकर अपने अंदर की अनावश्यक डर, अविश्वास, अल्पविश्वास, असत्य, कमजोरियां और दुष्टात्माओं पर विजय पाना चाहते हैं?


अगले भाग में पढ़िये
डर, विश्वास पर अघात है
To be continued ……..


ईश्वर की महिमा हो, ईश्वर को धन्यवाद।


आमीन।


"न-अधर्म" ही धर्म है।"


झारखण्ड! तुम्हें शांति मिले!!

भारत! तुम्हें शांति मिले!!

संपूर्ण विश्व को शांति!!